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सज़ा

चाहत बस इतनी-सी है कि कभी **मेरी गलतियों से परे जाकर मेरे प्रेम को देखे**—उस समर्पण को समझे, उस क्षमा को महसूस करे, और उस निःस्वार्थ प्रेम को पहचाने जो आज भी **मेरे भीतर जीवित है।**

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नमी

कुछ तो कमी है,कुछ तो नमी है इन आँखों में। तेरे चेहरे की वो हँसीक्यों हँसी जैसी नहीं लगती?यारों के…