क्यों सज़ा सी लगती है जिंदगी,
जब भी तुझे चाहने लगती हूँ,
तू कुछ और दूर हो जाता है…
मैं एक कदम तेरी तरफ बढ़ाऊं,
तो दरमियां फासले बढ़ जाते हैं,
मैं तेरा नाम दिल में संभालूं,
और तेरे लहजे बदल जाते हैं।
तेरी बेरुखी से शिकायत है मुझे,
मगर शिकायत भी करूं तो कैसे?
मेरे पास लफ़्ज़ तो बहुत थे,
पर तूने सुनने का मौका ही कहां दिया…
कभी खुद से पूछती हूँ—
आखिर क्या गलती की थी मैंने,
जिसकी सज़ा अब तक पूरी नहीं हुई?
कौनसा कर्ज़ है तेरा मुझ पर,
जिसका भुगतान अभी बाकी है?
कौनसी खता थी मेरी,
जो मेरी हर मोहब्बत से बड़ी हो गई?
क्यों तुझे मेरा प्यार नहीं दिखता?
तेरी कितनी ही गलतियों को
मैंने वक़्त के हवाले कर दिया,
तेरे दिए कितने ही दर्द को
मैंने मोहब्बत कह कर छुपा लिया।
तेरे कितने लफ़्ज़ चुभे थे मुझे,
फिर भी तुझे बुरा नहीं माना,
तू हर बार दिल तोड़ता रहा,
और मैंने हर बार तेरे टूटने का डर पाला।
तेरी हर खता भुला कर भी
तुझे चाहा मैंने,
फिर क्यों मेरी बस एक भूल
तेरी नज़रों में रह गई?
मैंने जो सौ बार तुझे माफ़ किया,
वो क्यों याद नहीं?
और जो एक बार मैं गलत हुई,
बस वही क्यों याद रह गया?
क्या मेरी एक गलती
मेरी सारी मोहब्बत से बड़ी थी?
क्यों मेरी भुलाई हुई तेरी हर खता में
तुझे मेरा निःस्वार्थ प्रेम नहीं दिखा?
क्यों मेरा हर बार लौट आना,
मेरा हर बार तुझे चुनना,
मेरा खुद से पहले तुझे रखना—
तुझे कभी प्यार नहीं लगा?
क्यों तू मुझे मेरी गलतियों के तराज़ू में तोलता रहा,
कभी मेरी मोहब्बत का वज़न भी रख कर देखता…
शायद तब तुझे पता चलता,
मैं गलत हो सकती थी,
मगर मेरा प्यार कभी गलत नहीं था।
क्यों तू मुझे प्यार भरी नज़रों से नहीं देखता?
कभी वैसे देखना मुझे
जैसे मैं तुझे देखती थी—
तेरी कमियों के पार,
तेरी गलतियों के पार,
तेरे गुस्से, तेरी खामोशी,
तेरी बेरुखी के भी पार…
शायद तब तुझे मैं दिख जाती।
मैंने तुझे चाहना कब का छोड़ दिया है…
हाँ, चाहना छोड़ दिया है—
पर दिल तुझे छोड़ नहीं पाया।
मैंने खुद को समझा लिया कि अब तेरा इंतज़ार नहीं करना,
पर मेरी नज़रें आज भी मेरी बात नहीं मानतीं…
हर भीड़ में तुझे ढूंढती हैं,
हर आहट पर ठहर जाती हैं,
और जब तू सामने होता है,
तो चुपके से यह देख लेती हैं—
शायद आज तेरी नज़र मुझ पर ठहर जाए…
शायद आज तुझे
मेरी आंखों में वो प्यार दिख जाए
जो लफ़्ज़ों में कभी कह नहीं पाई…
शायद आज तुझे वो लड़की याद आ जाए
जिसने तुझे तेरी गलतियों के साथ चाहा था…
शायद आज तू मुझे मेरी एक गलती से नहीं,
मेरी पूरी मोहब्बत से देखे…
पर आज भी मेरी उम्मीद हार गई।
दिल फिर चुप हो गया, और
नज़रें…
नज़रें फिर रो गईं।
क्योंकि आज फिर समझ आया—
मैं जिस मोहब्बत को अपनी पूरी दुनिया समझ कर
तेरी आंखों में ढूंढती रही,
वो मोहब्बत तेरी नज़रों तक कभी पहुंची ही नहीं…
इतना प्यार करने के बाद भी,
इतना टूट कर चाहने के बाद भी,
तेरी हर गलती भुला देने के बाद भी…
तुझे मेरा प्यार तो क्या—
मैं भी नहीं दिखती।
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