नमी

कुछ तो कमी है,
कुछ तो नमी है इन आँखों में।

तेरे चेहरे की वो हँसी
क्यों हँसी जैसी नहीं लगती?
यारों के बीच तेरा मुस्कुरा देना
क्यों मुस्कुराना नहीं लगता?

सब जानकर भी अनजान बनना तेरा,
क्यों अनजान होना नहीं लगता?

क्यों तुझे मेरी फ़िक्र
उस तरह नहीं,
जिस तरह मुझे तेरी है?

क्यों तुझे मैं दिखती नहीं
उस तरह,
जैसे मेरी हर नज़र में तू है?

क्यों मुझे तू लफ़्ज़-लफ़्ज़ याद है,
और तुझे मेरा वजूद तक
नज़र नहीं आता?

क्यों तेरे एक लफ़्ज़ से
मेरा पूरा दिन बदल जाता है,
और मेरी ख़ामोशी भी
तुझ तक पहुँच नहीं पाती?

क्यों मैं तेरी आँखों में
अपने लिए कुछ ढूँढती रहती हूँ,
जब हर बार खाली हाथ
लौटना ही होता है?

क्यों तेरा थोड़ा-सा पास आना
मुझे अपनापन लगता है,
और तेरा ज़रा-सा दूर जाना
मुझे इतना तन्हा कर जाता है?

क्यों तेरी कही हुई
हर छोटी-सी बात
मैं संभालकर रखती हूँ,
और मेरी अनकही बातें
तेरे लिए बातें भी नहीं?

क्यों तेरी परवाह मुझे हर पल है,
और मैं हर पल बस यही चाहती हूँ
कि कभी तुझे भी मेरी हो?

क्यों तेरा अपनापन
मुझे अपना-सा नहीं लगता?

क्या कभी मेरी कमी
तुझे भी महसूस होती है?

क्या कभी भीड़ में
तेरी नज़र मुझे ढूँढती है?

क्या कभी रात के किसी पहर
मेरी कोई बात याद आती है?

क्या कभी मेरी ख़ामोशी
तुझे बेचैन करती है,
या सिर्फ़ मैं ही हूँ
जो तेरी ख़ामोशी में भी
हज़ार मतलब ढूँढती हूँ?

क्यों मुझसे बिना पूछे,
मेरे दिल की सारी बातें
जाने बग़ैर,
तू सुकून से सो जाता है?

और क्यों मैं रातों को जागती हूँ,
इस दिल में हज़ार बातें लिए,
ये सोचते हुए—

कि जिन बातों ने मेरी नींद छीन ली,
उन्हें जान लेना भी
तुझे गवारा क्यों नहीं?

और अगर तुझे मेरी परवाह नहीं,
तो क्यों तेरा नाम आते ही
मैं आज भी ठहर जाती हूँ?

क्यों मैं हर बार
तेरी बेरुख़ी का कोई बहाना ढूँढ लेती हूँ,
जैसे सच मान लेने से
तू और दूर हो जाएगा?

क्यों मैं तेरी आँखों में
वो ढूँढती रहती हूँ
जो शायद वहाँ कभी था ही नहीं?

क्यों तेरे थोड़े-से अपनेपन को
मैंने इतना अपना मान लिया,
कि अब तेरी दूरी भी
मुझे अपनी-सी चुभती है?

शायद कुछ तो कमी है—

तेरे एहसास में,
या मेरी उम्मीद में।

तेरे अपनेपन में,
या मेरे तुझे अपना समझने में।

तेरी चाहत में,
या मेरी चाहत के बेहिसाब होने में।

पता नहीं कमी कहाँ है—
तुझमें,
मुझमें,
या हमारे बीच उस एहसास में
जिसे मैंने शायद
हमेशा “हम” समझा।

बस इतना जानती हूँ—

मेरी तरफ़ तो सब कुछ था,
फिर भी कुछ तो कमी है…

और मेरी आँखों में—
तेरी कमी की नमी है,
या बस नमी है।


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Author: Onesha

She is the funny one! Has flair for drama, loves to write when happy! You might hate her first story, but maybe you’ll like the next. She is the master of words, but believes actions speak louder than words. 1sha Rastogi, founder of 1shablog.com.

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