तुम्हारी याद
पता नहीं
कैसे याद किसी की
इतनी ख़ामोशी से
इंसान के अंदर घर कर लेती है।
कभी धूप के नीचे
पेड़ों की छाँव में बैठी होती हूँ,
पत्ते हवा से हिलते हैं,
और न जाने क्यों
ऐसा लगता है
जैसे तुम मेरे बिल्कुल पास हो।
हवा जब मेरे हाथ से गुज़रती है,
तो एक पल के लिए
मैं अपनी उँगलियाँ बंद कर लेती हूँ—
जैसे तुमने थाम लिया हो।
फिर ख़ुद ही मुस्कुरा देती हूँ
अपनी इस नादानी पर।
तुम तो हो ही नहीं।
फिर भी
पता नहीं क्यों
तुम हर जगह हो।
मेरी सुबह की पहली ख़ामोशी में,
रात के आख़िरी ख़याल में,
किसी अनजाने गाने की एक पंक्ति में,
और उन लम्हों में
जब मुझे किसी से कुछ कहना होता है
और सबसे पहले
तुम याद आते हो।
मैं तुम्हें क्या Miss करती हूँ?
तुम्हें देखना?
तुमसे बात करना?
तुम्हारा मुस्कुराना?
या फिर वो तरीक़ा
जिससे तुम मुझे देखते थे—
जैसे उस एक नज़र में
मैं थोड़ी और ख़ूबसूरत,
थोड़ी और अपनी लगती थी।
शायद मैं
तुम्हारी आवाज़ Miss नहीं करती।
शायद मैं वो सुकून Miss करती हूँ
जो तुम्हारी आवाज़ सुनकर
मेरे अंदर उतर जाता था।
शायद तुम्हारा हाथ नहीं,
वो एहसास Miss करती हूँ
कि किसी ने मुझे
इतनी अपनायत से थामा था।
और शायद सबसे ज़्यादा
मैं तुम्हारा वो रूप miss करती हूँ
जिससे मैंने प्यार किया था।
तुम्हारा वो असली-सा रूप—
बिना किसी दिखावे के,
बिना किसी फ़ासले के।
वही तुम,
जिसे देखकर
मेरा दिल चुप हो जाता था।
कभी-कभी सोचती हूँ,
क्या तुम्हें भी मेरी याद आती होगी?
क्या कभी
तुम भी बिना किसी वजह के
रुक जाते होगे?
क्या कभी हवा
तुम्हें भी मेरी याद दिलाती होगी?
क्योंकि जब मैं तुम्हें
इतना याद करती हूँ,
तो दिल मानता ही नहीं
कि तुम्हें मेरी याद नहीं आती।
कितनी अजीब बात है न—
तुम मेरे साथ नहीं हो,
फिर भी मेरी ज़िंदगी के
कितने सारे छोटे-छोटे पल
अब भी तुम्हारे हैं।
मैं किसी को तुम्हारी जगह नहीं दे रही।
बस पता नहीं
दिल ने तुम्हारे लिए
एक जगह बना ली थी
और अब
वो जगह ख़ाली होकर भी
ख़ाली नहीं होती।
कभी लगता है
तुम वापस आ जाओ।
बस एक बार।
कुछ कहना भी नहीं।
बस मेरे सामने बैठो,
मुझे वैसे ही देखो
जैसे कभी देखते थे,
और मुझे एक पल के लिए
फिर से वो सब महसूस करने दो
जिसे मैं भूलने की कोशिश करती हूँ।
और फिर कभी लगता है—
शायद मुझे तुम्हारा नहीं,
तुम्हारी याद से बाहर आने का
इंतज़ार है।
उस दिन का
जब तुम्हारा नाम
मेरे दिल को इतना ज़ोर से न छू जाए।
जब हवा चले
और मैं तुम्हारा साया न ढूँढूँ।
जब किसी की मुस्कुराहट में
तुम्हारी मुस्कुराहट नज़र न आए।
जब तुम याद आओ
और मुझे तुम्हें पाने की
ज़रूरत महसूस न हो।
लेकिन आज?
आज मैं अभी भी
तुम्हें Miss करती हूँ।
बहुत।
इतना कि कभी-कभी
तुमसे बात करने के लिए
मैं ख़ुद से ही बातें करती हूँ।
तुम्हें कुछ बताना होता है
तो दिल में तुम्हारा नाम लेती हूँ।
तुम्हें कुछ दिखाना होता है
तो एक पल के लिए भूल जाती हूँ
कि तुम मेरे साथ नहीं हो।
और फिर याद आता है।
तुम नहीं हो।
और शायद
तुम्हारी कमी का सबसे गहरा हिस्सा
ये नहीं है कि तुम चले गए।
बल्कि ये है
कि मेरे अंदर का एक हिस्सा
अब भी तुम्हारे पास है।
वही हिस्सा
जो तुम्हारे साथ हँसता था,
तुम्हारा इंतज़ार करता था,
तुम्हारी एक छोटी-सी बात पर
पूरा दिन ख़ुश हो जाता था।
शायद इसी लिए
मैं अब तक इंतज़ार कर रही हूँ।
तुम्हारा नहीं।
न ही तुम्हारी वापसी का।
बस उस दिन का
जब मेरा दिल
तुम्हें याद करके
तुम तक पहुँचना बंद कर दे।
जब मैं तुम्हें
प्यार से याद कर सकूँ,
दर्द से नहीं।
और तब शायद
मैं मान पाऊँगी—
कि कुछ लोग
हमारी ज़िंदगी से चले जाते हैं,
पर हमारे अंदर से
बहुत देर बाद जाते हैं।
और तुम…
शायद अभी भी
मेरे अंदर कहीं
थोड़े से बाक़ी हो।
This is a poem written from my heart for someone I fell in love with and I miss dearly and now this person is no more a part of my life in ways I wanted him to be.
A tribute for Khyati and Pranav. ❤️
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