सही और ग़लत के पार
हम दोनों सो गए थे।
Trip का second-last दिन ख़त्म हो चुका था।
बस एक दिन और।
उसके बाद मुझे Japan के लिए निकलना था।
कमरे में अँधेरा था। पर्दे के एक कोने से बाहर की हल्की-सी रोशनी भीतर आ रही थी। Ananya मेरे पास सो रही थी। उसकी साँसें एक rhythm में चल रही थीं—धीमी, शांत, बेफ़िक्र।
मैं भी आँखें बंद किए लेटा रहा।
अजीब बात है, किसी सफ़र के ख़त्म होने का एहसास उसके आख़िरी दिन नहीं होता। उससे एक रात पहले होता है।
जब तुम्हें पता होता है कि कल जो कुछ भी करोगे, वह आख़िरी बार होगा।
आख़िरी breakfast।
आख़िरी बेवजह की walk।
आख़िरी बार उसका कहना—“जल्दी करो।”
आख़िरी बार बिना किसी वजह एक ही जगह पर होना।
और फिर—
अलग directions।
पता नहीं मैं कब सोया।
लेकिन रात में मेरी आँख खुल गई।
या शायद…
मैं पहली बार सच में जाग गया था।
मैं office में था।
वही seat। वही माहौल। वही office की चहल-पहल।
Boardroom। Laptop। ID card। Swipe machine की beep। Lunch table। Coffee machine के पास रखे paper cups। Cafeteria। Deadlines। Outlook notifications। Teams के messages। Meeting room के बाहर लगा छोटा-सा screen।
सब कुछ बिल्कुल वैसा ही था।
और वह भी थी।
Ananya।
और मैं भी।
मैं अपनी seat से उसे लगभग forty-five-degree angle पर देख रहा था। बिल्कुल वैसे ही जैसे न जाने कितनी बार real life में देखा था।
बस एक फ़र्क़ था।
आज नज़र मिलने पर मैंने नज़र नहीं हटाई।
उसने भी नहीं।
Office में लोग चलते जा रहे थे। किसी के हाथ में coffee थी, कोई laptop लेकर meeting room की तरफ़ भाग रहा था, किसी की call पर आवाज़ आ रही थी—
“Can we close this by EOD?”
सब कुछ चल रहा था।
लेकिन मुझे कुछ सुनाई नहीं दे रहा था।
सिर्फ़ वह।
उसने मुझे देखा। फिर अपना चश्मा उतारकर table पर रखा और उठकर मेरी तरफ़ चलने लगी।
मैं उसे देखता रहा।
एक second के लिए मैंने अपने laptop की black screen में ख़ुद को देखा।
Theek lag raha hoon?
मैंने बालों पर हाथ फेरा। Shirt सीधी की।
और फिर ख़ुद पर ही हँसी आ गई।
मैं भी उठ गया।
वह मेरी तरफ़ आ रही थी।
मैं उसकी तरफ़।
और पता नहीं कहाँ से अचानक हवा चलने लगी।
Desk पर पड़े papers हिलने लगे, फिर एक-एक कर हवा में उठते चले गए।
Reports। Printouts। Sticky notes। Meeting agendas।
जैसे office का हर वह काग़ज़, जिस पर किसी और की expectation लिखी थी, हवा में उड़ता जा रहा हो।
Deadlines उड़ गईं।
Escalations उड़ गईं।
Appraisals उड़ गए।
लोगों की नज़रें उड़ गईं।
और कुछ देर बाद वहाँ बस हम दोनों रह गए।
वह मेरे सामने आकर रुकी।
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
मुझे कोई pressure महसूस नहीं हो रहा था। Office का शोर नहीं। कोई anxiety नहीं। कोई calculation नहीं।
बस एक अजीब-सा…
सुकून।
वह सुकून जिसके लिए मेरे पास English का कोई ठीक word शायद कभी था ही नहीं।
Peace बहुत formal लगता था।
Comfort बहुत छोटा।
Ease बहुत साधारण।
सुकून ही था।
और उस सुकून के बीच मैं ख़ुद को देख रहा था।
मैं अच्छा लग रहा हूँ या नहीं। उसके सामने कैसा लग रहा हूँ। उसने मुझे notice किया या नहीं।
और मुझे पहली बार महसूस हुआ कि किसी एक इंसान के लिए अच्छा दिखना चाहना भी कितनी सीधी-सी खुशी हो सकती है।
Real life में मैंने इसे भी control किया था।
Why do I care?
It doesn’t matter.
She’s just a person.
Focus on work.
मैंने अपनी हर छोटी-सी feeling को courtroom में खड़ा करके उससे उसका justification माँगा था।
और जिस feeling के पास logical answer नहीं होता था, मैं उसे dismiss कर देता था।
Dream में कोई courtroom नहीं था।
बस वह थी।
मैं था।
और मेरे दिल को किसी argument की ज़रूरत नहीं थी।
वह मेरे पास आई।
और जैसे ही वह मेरी बाँहों में थी, office की दीवारें पीछे छूटने लगीं।
हम चल दिए।
Office के पार वाली किसी दुनिया में।
एक ऐसी दुनिया जहाँ उसे और मुझे रोकने वाला कोई नहीं था।
एक-दूसरे को जी भरकर देख लेने से भी नहीं।
शायद romance हमेशा किसी को छूने में नहीं होता।
कभी-कभी romance सिर्फ़ सामने वाले को बिना डरे देख पाने में होता है।
उसकी मुस्कुराहट।
उसका खिलखिलाना।
उसका मुझे यूँ देखते रहना।
जो कुछ किसी और के लिए मामूली था, वह मेरे लिए extraordinary लग रहा था।
अगले ही पल हम फिर अपनी desks पर थे।
Ananya अपने laptop में busy थी। उसके forehead पर वह छोटी-सी line आ गई थी जो तब आती थी जब वह किसी problem को solve करने की कोशिश करती थी।
मैंने phone उठाया।
उसका नाम खोला।
Type किया—
Look up.
Send.
उसके desk पर phone vibrate हुआ।
उसने screen देखी। Message पढ़ा। बिना समझे ऊपर देखा।
मैं उसे देख रहा था।
उसने आँखें थोड़ी छोटी करके मुझे देखा—
What?
मैंने बस smile किया।
उसने सिर हिलाया।
फिर उसके होंठों पर भी एक छोटी-सी smile आ गई।
बस।
इतना ही।
लेकिन मेरे भीतर जैसे कुछ हल्का हो गया।
काश ज़िंदगी के अच्छे moments को नापने का कोई scale होता। शायद तब हमें पता चलता कि खुशी अक्सर कितनी छोटी होती है।
एक message।
एक नज़र।
एक suppressed smile।
किसी का meeting room में जाते-जाते पलटकर तुम्हें देख लेना।
और तुम्हारा बिना कुछ कहे आँखों से कहना—
You’ll be fine.
उसकी meeting ख़राब गई।
Dream में भी।
वह meeting room से बाहर निकली और उसके चलने के ढंग से ही मुझे समझ आ गया।
चेहरा neutral। Shoulders थोड़े stiff। Laptop सीने के पास पकड़ा हुआ।
वह expression जो दुनिया से कहता है—
I’m fine.
और भीतर का इंसान धीरे से कहता है—
Please don’t ask.
वह अपनी chair पर आकर बैठ गई।
मैंने phone उठाया।
Coffee?
Typing…
फिर कुछ नहीं।
तीन dots आए।
ग़ायब हो गए।
फिर आए।
5 mins.
पाँच मिनट बाद हम coffee machine के पास खड़े थे।
“बोलना है?” मैंने पूछा।
“नहीं।”
“ठीक है।”
उसने मेरी तरफ़ देखा। “तुम पूछोगे नहीं?”
“नहीं।”
“Why?”
“Because तुमने कहा नहीं बोलना।”
वह कुछ seconds तक मुझे देखती रही। फिर coffee का sip लिया।
“Meeting बकवास थी।”
मैं हँस पड़ा।
वह भी।
और शायद बस इतना ही तो चाहिए था मुझे।
उसकी problems solve करना नहीं।
उसकी ज़िंदगी का hero बनना नहीं।
बस उसकी किसी stressful meeting के बाद वह होना, जिसके पास वह पाँच मिनट के लिए बिना explain किए आ सके।
क्या मैं इतनी simple-सी चीज़ चाहता था?
Apparently, yes.
फिर एक और दिन।
एक और meeting।
इस बार मेरी।
दो घंटे।
No breakfast।
एक ही point को सात तरीक़ों से discuss करने के बाद वापस पहले point पर पहुँच जाने वाली corporate meeting।
मैं बाहर निकला।
Phone देखा।
Ananya की reel।
मैंने play की।
कुछ stupid-सा था।
मैं ज़ोर से हँस दिया।
फिर मैंने ऊपर देखा।
वह दूर अपनी seat से मुझे देख रही थी।
उसके चेहरे पर वही expression था—
Mission accomplished.
और पता नहीं क्यों, उस dream में मुझे वह moment किसी romantic dinner से ज़्यादा intimate लगा।
किसी को पता होना कि तुम कब irritate हो।
किसी को पता होना कि तुम्हें किस बात पर हँसी आएगी।
किसी को बिना पूछे तुम्हारा mood थोड़ा हल्का कर देना आता हो।
Maybe love isn’t always about knowing someone’s deepest secrets.
Maybe sometimes it is knowing which stupid reel to send after a terrible meeting.
एक सुबह मैं office आया।
थोड़ा ज़्यादा dressed-up।
Dark shirt। Sleeves perfectly folded। Watch। Hair surprisingly cooperative।
मैं जान-बूझकर उसकी तरफ़ नहीं देख रहा था।
मुझे पता था वह देख रही है।
और मुझे यह भी पता था कि उसे पता है कि मुझे पता है।
मैंने laptop खोला और normal act करने लगा।
Phone vibrate हुआ।
Ananya:
Seriously?
मैंने reply किया—
What?
दूर से उसने मुझे देखा और अपना हाथ चेहरे के सामने fan की तरह हिलाया।
Hot.
मैं हँस पड़ा।
“पागल,” मैंने लगभग बिना आवाज़ के कहा।
उसने shoulders shrug किए और वापस laptop में देखने लगी।
मैंने भी अपनी screen की तरफ़ देखा।
Excel sheet खुली थी।
Numbers थे।
Columns थे।
Data था।
लेकिन मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था।
मैं बस मुस्कुरा रहा था।
कितना stupid।
कितना ordinary।
कितना…
alive.
हम cafeteria में थे।
कभी lunch share कर रहे थे। कभी वह मेरी plate से बिना पूछे कुछ उठा लेती। कभी मैं उसकी coffee taste करके चेहरा बना देता।
“ये coffee है?”
“तो क्या है?”
“Sugar syrup.”
“Give it back.”
कभी हम office building के नीचे सिर्फ़ दस मिनट की walk पर निकल जाते।
Work discuss करते।
और कभी work के नाम पर सब कुछ discuss करते except work।
कभी वह बोलती रहती।
मैं सुनता रहता।
कभी मैं किसी random thought को unnecessarily detail में explain करने लगता और वह बीच में रोक देती—
“Sugandh, point पे आओ।”
“Point यही है।”
“ये point नहीं है।”
“तुम समझ नहीं रही।”
“Unfortunately, मैं बहुत अच्छे से समझ रही हूँ।”
और फिर वह हँसती।
मैं उसे देखता।
शायद मैं इसी ज़िंदगी के सपने देखता था।
कोई grand love story नहीं।
कोई dramatic confession नहीं।
कोई दुनिया से लड़ाई नहीं।
बस…
daily life।
उसके साथ।
Random coffee।
Random walks।
Stressful meetings।
Lunch।
Deadlines।
Bad jokes।
Unnecessary texts।
एक-दूसरे को दूर से देखना।
और कभी-कभी सिर्फ़ यह जान लेना कि वह building में कहीं है।
I didn’t want extraordinary days with her.
I wanted ordinary days to become extraordinary because she was in them.
और शायद यहीं कहीं मुझे समझ आया कि real life में मैं यह सब इतनी आसानी से feel क्यों नहीं कर पाता था।
क्योंकि emotions को control करते-करते मैंने उन्हें feel करना ही बंद कर दिया था।
मैं उसे maturity कहता था।
Self-control।
Mental peace।
Protecting my heart।
मुझे लगता था मैं ख़ुद को बहुत अच्छे से जानता हूँ।
मुझे पता है मुझे क्या चाहिए।
मुझे पता है मुझे किस बात से फ़र्क़ नहीं पड़ता।
मुझे पता है मैं कितना attach हो सकता हूँ।
कब रुकना है।
कब पीछे हट जाना है।
कब किसी को ख़ुद से दूर कर देना है।
मैंने अपने दिल के चारों तरफ़ boundaries नहीं बनाई थीं।
मैंने दीवारें बनाई थीं।
इतनी ऊँची कि एक वक़्त के बाद मुझे ख़ुद दिखाई देना बंद हो गया था कि उनके दूसरी तरफ़ क्या है।
I thought numbness was peace.
It wasn’t.
Peace lets you feel without drowning.
Numbness doesn’t let you feel at all.
और मैं डूबने के डर से पानी में उतरना ही भूल गया था।
कभी-कभी मैं Ananya को message type करता—
I miss you.
Screen पर उसे देखता रहता।
दो seconds।
तीन।
चार।
फिर backspace।
Backspace।
Backspace।
सब delete।
और उसकी जगह लिखता—
Lunch?
Send.
क्यों?
क्योंकि Lunch? safe था।
I miss you safe नहीं था।
किसी से मिलने की इच्छा रखना acceptable था।
यह मान लेना कि उससे मिलने की इच्छा क्यों है—नहीं।
Office था।
लोग थे।
समाज था।
दस्तूर था।
लाखों नज़रें थीं।
लोग क्या कहेंगे।
कौन क्या समझेगा।
किसने किसे कितनी देर देखा।
कौन किसके साथ coffee पर गया।
कौन lunch के बाद किसके साथ walk कर रहा था।
Office gossip किसी thought से भी तेज़ travel करती है।
तुम्हारे दिमाग़ में किसी के बारे में thought पूरा होने से पहले किसी और के दिमाग़ में तुम दोनों की पूरी कहानी बन चुकी होती है।
और फिर एक image होती है।
वह image जिसे बनाने में तुमने साल लगाए हैं।
Responsible।
Controlled।
Sorted।
Unaffected।
तुम उस image को बचाए रखते हो, क्योंकि कहीं न कहीं तुम्हें लगता है कि वही image तुम्हारे छोटे-से दिल को भी बचाए रखेगी।
So you stay the way you are.
Even when that isn’t who you are.
Rumi से मंसूब एक मशहूर ख़याल है—सही और ग़लत के ख़यालों के पार एक दुनिया है; वहाँ मिलेंगे।
मैं अक्सर सोचता था—
क्या पता वह दुनिया हो ही नहीं?
क्या पता हमने उसे सिर्फ़ इसलिए imagine किया हो क्योंकि इस दुनिया में अपने दिल की हर बात कहना मुमकिन नहीं?
लेकिन मेरे dream में वह दुनिया थी।
और हम उसमें थे।
मैं उसे across the room बिना डरे देख सकता था।
मैं उससे बात कर सकता था, बिना हर sentence को बोलने से पहले अपने भीतर edit किए।
मैं उसे अपने हर thought का access दे सकता था।
चाहे वह thought कितना ही छोटा हो।
कितना embarrassing।
कितना childish।
I saw this and thought of you.
You looked upset today.
You looked beautiful today.
I wanted to talk to you.
I missed you.
Stay for five more minutes.
Simple sentences.
Real life में impossible sentences.
You can trust a person and still be afraid of giving yourself to them.
Especially after that one heartbreak which took years to climb out of.
मैं उससे पहले भी लोगों के करीब रहा था।
मैं intimacy को जानता था।
Attraction को जानता था।
Bodies को जानता था।
लेकिन Ananya के साथ कुछ और था।
मेरा body उसके आसपास react करता था, yes.
लेकिन सिर्फ़ body नहीं।
Something much more inconvenient had started reacting.
My heart.
और यह plan का हिस्सा नहीं था।
मैं धीरे-धीरे उसके सामने खुल रहा था।
बिना महसूस किए।
एक दरवाज़ा।
फिर दूसरा।
फिर तीसरा।
और हर दरवाज़े के पीछे मुझे अपना ही कोई ऐसा version मिल रहा था जिसे मैं बरसों पहले lock करके भूल चुका था।
A boy who wanted to be chosen.
A man who wanted to be understood.
Someone who wanted to be missed.
Someone who wanted another person to notice when he was quiet.
Someone who wanted to say—
Don’t go yet.
मुझे लगता था मैं उस इंसान को बहुत पीछे छोड़ चुका हूँ।
Dream ने बताया—
नहीं।
वह वहीं था।
बस चुप था।
मैंने Ananya का हाथ पकड़ा।
“Come.”
“कहाँ?”
“पता नहीं।”
“Very convincing.”
“Trust me.”
उसने मुझे देखा।
फिर अपना हाथ मेरे हाथ में दे दिया।
मैं उसे अपने भीतर की किसी जगह ले गया।
मेरी safe place।
वहाँ कोई office नहीं था।
कोई Japan नहीं।
Trip का कोई last day नहीं।
कोई लोग नहीं।
कोई rules नहीं।
बस शांति थी।
मैं पलटा।
Ananya को देखा।
वह मुस्कुरा रही थी।
मैंने उसका हाथ थोड़ी और मज़बूती से पकड़ लिया।
और अगले ही second—
मेरा हाथ खाली था।
“Ananya?”
कोई जवाब नहीं।
मैं पलटा।
वह वहाँ नहीं थी।
“Ananya?”
Silence.
मैं चलने लगा।
फिर तेज़।
फिर भागने लगा।
“Ananya!”
दूर वह मुझे दिखाई दी।
मैं उसके पास गया।
हाथ बढ़ाया।
जैसे ही उसे छूने वाला था—
वह फिर दूर चली गई।
“Wait.”
वह और दूर।
“Please.”
और दूर।
मेरी breathing बढ़ने लगी।
Chest tight.
हाथ ठंडे।
मैंने phone निकाला।
उसका नाम।
Message.
Not delivered.
Call.
Nothing.
Profile.
Gone.
Blocked.
नहीं।
नहीं।
नहीं।
It’s happening again.
मेरी आँखों के सामने office गायब हो गया।
Coffee गायब।
Cafeteria गायब।
उसकी smile गायब।
और एक पुरानी दुनिया सामने आ गई।
Saba.
एक नाम जिसे मैंने अपने भीतर इतनी गहराई में दबा दिया था कि मुझे लगता था उसका अब मुझ पर कोई असर नहीं।
लेकिन कुछ चीज़ें ख़त्म नहीं होतीं।
हम बस उनके ऊपर नई ज़िंदगी बना लेते हैं।
Saba के लिए मेरी feelings कितनी intense थीं।
और उसके बाद ख़ुद को वापस जोड़ने में कितना वक़्त लगा था।
Kusha।
और न जाने कितने लोग।
कितनी conversations।
कितने distractions।
कितने साल।
मुझे लगता था मैं heal हो गया हूँ।
शायद मैं heal नहीं हुआ था।
शायद मैं बस efficient हो गया था।
Efficient at avoiding pain.
Efficient at leaving before being left.
Efficient at not asking questions whose answers could hurt.
Efficient at pretending that if something didn’t work out, it didn’t matter.
मैंने एक rule book बना ली थी।
Responsible heart की imaginary rule book।
Don’t get too attached.
Don’t expect.
Don’t demand.
Don’t confess too much.
Don’t let anyone become indispensable.
Always keep enough distance to walk away.
और मुझे लगता रहा—
See? I am protecting myself.
लेकिन किस चीज़ से?
Life से?
Whenever I feel too comfortable, something inside me prepares for loss.
हर खुशी के भीतर मैं उसके ख़त्म होने का rehearsal शुरू कर देता हूँ।
हर इंसान के करीब आते ही मेरा दिमाग़ exit door ढूँढ़ने लगता है।
Every stay secretly carries a what if she leaves?
और Ananya ने मेरे भीतर उस surface को scratch कर दिया था जिसे मैं concrete समझता था।
नीचे सब कुछ ज़िंदा था।
Fear.
Want.
Longing.
Anger.
Attachment.
Tenderness.
Jealousy.
Hope.
और उसी सबके बीच कहीं hurt भी।
मैं उससे hurt था।
मैं उससे ग़ुस्सा था।
मैं ख़ुद से ग़ुस्सा था।
मैं circumstances से ग़ुस्सा था।
और सबसे ज़्यादा इस बात से कि उसके पास मुझे affect करने की इतनी power आई कैसे?
मैंने तो decide किया था कि मैं दोबारा किसी को वह power नहीं दूँगा।
Then why did she have it?
Perhaps because the heart never signed the agreements the mind made on its behalf.
“Ananya!”
मैं फिर चिल्लाया।
कोई जवाब नहीं।
मेरी साँसें टूट रही थीं।
मैं भाग रहा था।
फिर अचानक—
सब रुक गया।
मैं अकेला खड़ा था।
और पहली बार मुझे उसके चले जाने से ज़्यादा अपनी हालत से डर लगा।
मैं इतना क्यों घबरा रहा था?
अगर मुझे फ़र्क़ नहीं पड़ता तो?
अगर मैं इतना controlled हूँ तो?
अगर मैं ख़ुद को इतना अच्छे से जानता हूँ तो?
Why was I terrified?
और dream ने मुझे कोई philosophical answer नहीं दिया।
बस एक बहुत simple-सा answer दिया—
Because you care.
बस।
इतना ही।
Because you care.
और शायद मैं इसी sentence से सालों से भाग रहा था।
मेरी आँख खुल गई।
कमरा अँधेरा था।
कुछ seconds तक मुझे समझ नहीं आया कि मैं कहाँ हूँ।
Office नहीं।
कोई cafeteria नहीं।
कोई हवा में उड़ते papers नहीं।
कोई blocked number नहीं।
मैं bed पर था।
Trip।
Second-last night।
Ananya मेरे पास थी।
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
वह सो रही थी।
मेरी breathing अब भी heavy थी।
मैंने आँखें बंद कीं।
दिल ज़ोर से धड़क रहा था।
मैंने उसे जगाया नहीं।
बस ceiling को देखता रहा।
कल हमारा last day था।
उसके बाद Japan।
और पता नहीं क्यों, उसी पल मुझे Kinnaur Kailash याद आ गया।
कुछ सफ़र photographs के लिए नहीं होते।
कुछ जगहों को तुम देखने नहीं जाते।
वह जगहें तुम्हें देखने के लिए बुलाती हैं।
Kinnaur Kailash मेरे लिए ऐसी ही जगह थी।
वहाँ पहुँचकर इंसान को अपनी औक़ात का पता चलता है।
पहाड़ के सामने तुम्हारी planning छोटी।
तुम्हारी ego छोटी।
तुम्हारा heartbreak छोटा।
तुम्हारे achievements छोटे।
तुम्हारी carefully constructed identity भी छोटी।
साँस चढ़ रही हो।
पैर जवाब दे रहे हों।
हवा पतली हो।
और सामने वह पहाड़ खड़ा हो—
हज़ारों सालों से।
तुमसे पहले भी।
तुम्हारे बाद भी।
तब एहसास होता है कि कितनी चीज़ों को हम बेवजह control करने की कोशिश करते रहते हैं।
लोग।
Outcomes।
Feelings।
Relationships।
Future।
ख़ुद को।
Maybe surrender losing control नहीं होता।
Maybe surrender finally accepting होता है कि control कभी था ही नहीं।
Kinnaur Kailash में मैंने Shiv को सिर्फ़ एक देवता की तरह नहीं सोचा था।
Shiv destruction भी हैं।
Creation भी।
Silence भी।
Tandav भी।
वैराग्य भी।
प्रेम भी।
और शायद इंसान भी ऐसा ही होता है।
हम अपने भीतर के सिर्फ़ convenient हिस्सों को स्वीकार करते हैं।
बाक़ी को suppress कर देते हैं।
मैं strong हूँ।
मैं practical हूँ।
मैं detached हूँ।
मैं ठीक हूँ।
लेकिन मैं डरा हुआ भी हूँ।
मैं attached भी हूँ।
मैं jealous भी हो सकता हूँ।
मैं किसी को miss भी कर सकता हूँ।
मैं किसी को रोकना भी चाहता हूँ।
मैं टूट भी सकता हूँ।
और शायद ख़ुद को जानने का मतलब अपने सिर्फ़ अच्छे, controlled versions को जान लेना नहीं होता।
ख़ुद को जानने का मतलब है अपने भीतर के हर रूप को देख पाना।
शिव भी।
शक्ति भी।
सृजन भी।
विनाश भी।
सत्य भी।
असत्य भी।
मैं bed से नहीं उठा।
बस आँखें बंद कीं और Kinnaur Kailash का वह आसमान याद किया।
वह ठंडी हवा।
वह पहाड़।
वह थकान।
वह छोटा-सा मैं।
और वह अनंत-सा कुछ।
Ananya मेरे पास सो रही थी।
कल क्या होगा, मुझे नहीं पता था।
Japan जाकर क्या होगा, नहीं पता था।
हम दोनों के बीच क्या था, उसका नाम भी मुझे नहीं पता था।
और पहली बार मुझे लगा—
शायद हर चीज़ का नाम होना ज़रूरी भी नहीं।
हर सवाल का जवाब नहीं होता।
हर feeling को solve नहीं किया जाता।
कुछ feelings बस feel की जाती हैं।
मैंने धीरे से आँखें बंद कर लीं।
और मन में वही शब्द लौट आए जो Kinnaur Kailash के सामने खड़े होकर कभी आए थे—
सर्व भी तू, सर्वस्व भी तू।
जीवन भी तू, मृत्यु भी तू।
दाता तू, विधाता तू।
देता तू, लेता तू।
सत्य तू, असत्य हम।
भगवान तू, मनुष्य हम।
शिव तू, सुंदर तू, शक्ति—सब कुछ तू।
भगवान तू, मैं कुछ नहीं।
मैं कुछ नहीं।
जीवन तू, मैं कुछ नहीं।
और शायद पहली बार मैं कुछ नहीं कहना मुझे छोटा नहीं कर रहा था।
मुझे आज़ाद कर रहा था।
क्योंकि अगर मैं सब कुछ control नहीं करता—
तो मुझे हर चीज़ से बचना भी नहीं था।
न दर्द से।
न खुशी से।
न Ananya से।
न ख़ुद से।
मैंने एक गहरी साँस ली।
उस रात मेरे भीतर कोई जवाब नहीं आया।
बस एक अजीब-सा सुकून था।
वैसा ही, जैसा सपने में उसके पास खड़े होने पर था।
और अँधेरे में, बिना आवाज़ किए, मेरे होंठ हिले—
ॐ नमः पार्वती पतये।
हर हर महादेव।
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