ज़िद्दी था वो।
मानता ही नहीं था।
Thar लेकर मेरे ऑफिस के बाहर तब तक इंतज़ार करता रहा, जब तक मैं बाहर नहीं आ गई।
ऑफिस से निकलते ही दूर खड़ी उसकी Thar पर मेरी नज़र पड़ी।
और फिर उस पर।
वो वहीं था।
जैसे उसे यक़ीन था कि चाहे मैं कितनी भी देर कर दूँ, आखिर बाहर तो आऊँगी ही।
मैंने आसपास देखा। ऑफिस के लोग अभी भी निकल रहे थे। एक पल को मन हुआ कि उसे इशारे से कह दूँ—जाओ यहाँ से।
मगर मेरे कदम उसकी तरफ़ ही बढ़ते चले गए।
और फिर वो मुझे अपने साथ ले गया—शहर से दूर, बहुत दूर।
“दस दिन से तड़प रहा था तुम्हें देखने के लिए…”
उसने मेरी तरफ़ देखते हुए कहा।
मैंने खिड़की की तरफ़ चेहरा कर लिया ताकि वो मेरी मुस्कान न देख पाए।
और मैं?
मुझे बस उसकी Thar में उसके पास में बैठे रहना अच्छा लग रहा था।
मैं बार-बार इधर-उधर देख रही थी कि कहीं कोई पहचान वाला मुझे देख न ले।
आख़िर जो नशा चोरी-छिपे किए गए इश्क़ में है, वो उसे जगज़ाहिर कर देने में कहाँ…
मैंने चुपके से उसका हाथ पकड़ लिया।
वो गाड़ी चलाता हुआ Expreessway पर निकल गया। कुछ देर बाद Thar एक ऐसी जगह जाकर रुकी, जिसे देखकर मैं कुछ पल के लिए अपनी ही दुनिया में खो गई।
दूर तक फैली हरियाली और उसके पार खड़ी ऊँची-ऊँची रिहायशी इमारतें।
मैं उन्हें देखती रही।
न जाने क्यों ऐसी ऊँची इमारतें देखकर मेरे भीतर हमेशा कुछ जाग जाता था।
एक पुराना सपना।
एक दिन मैं भी एक बड़ी Real Estate Company की मालकिन बनूँगी।
मैंने उस Society को देखते हुए मन-ही-मन सोचा—एक दिन मैं भी किसी ऐसी ही जगह खड़ी होकर पूरे गर्व से कहूँगी,
“ये Property… ये पूरी Housing Society मेरी है।”
उस पल मेरे पास में खड़ा वो मुझे देख रहा था।
और मैं अपने आने वाले कल को।
शायद हम दोनों उस शाम अलग-अलग चीज़ों से प्यार कर रहे थे—
वो मुझसे।
और मैं, उस पल, अपने एक पुराने ख़्वाब से।
मौसम अचानक और सुहाना हो गया था। हवा चलने लगी थी।
वो सिगरेट लेकर आया और मेरे पास खड़ा होकर पीने लगा।
उसकी नज़रें लगातार मुझ पर टिकी थीं।
एकटक।
जैसे उसने पलक भी झपकाई और मैं उसकी आँखों से ओझल हुई, तो कहीं चली जाऊँगी।
उसने दरवाज़ा खोला।
मैं उसे देखती रही।
उसके चेहरे के तीखे नैन-नक्श… उसका लंबा-चौड़ा शरीर… एकदम तराशा हुआ। शरीर पर अतिरिक्त वसा का नामोनिशान तक नहीं था। अपनी देह पर वो कितनी मेहनत करता था, यह उसे देखकर साफ़ समझ आता था।
और मैं जाने कब से चुपचाप उसका मुआयना किए जा रही थी।
उसने मुझे देखते पकड़ लिया।
“क्या?”
“कुछ नहीं।”
मैंने तुरंत दूसरी तरफ़ देख लिया।
उसके होंठों पर वो हल्की-सी मुस्कान आ गई जो मुझे और असहज कर देती थी—क्योंकि अब उसे पता था कि मैं उसे देख रही थी।
वो थोड़ा झुका।
इतना कि उसकी आवाज़ बाकी दुनिया से कटकर सिर्फ़ मुझ तक पहुँची।
“May I?”
मैंने उसकी आँखों में देखा।
फिर नज़रें झुका लीं।
उसने मेरी seat belt खोली।
एक क्षण के लिए मेरी साँस जैसे वहीं अटक गई।
उसने मुझे नीचे उतारा और अपनी बाँहों में भर लिया।
मैंने भी अपनी बाँहें उसके चारों ओर कसकर लपेट लीं।
अगले ही पल उसने मुझे और कसकर अपने सीने से लगा लिया।
मेरी उँगलियाँ उसके गले से धीरे-धीरे नीचे फिसलने लगीं।
उसके होंठ मेरी गर्दन को छूते हुए गालों तक आए। एक के बाद एक उसके चुंबन मेरी त्वचा पर उतरते रहे।
फिर मेरे होंठों के बिल्कुल पास आकर वो रुक गया।
मैंने सिर थोड़ा पीछे किया और उसे देखा।
वो मुझे देख रहा था।
उसकी आँखों में ठहरी प्यास जैसे मेरे होंठों पर आकर अटक गई थी।
मैंने धीरे से आगे बढ़कर उसके होंठ छुए…
और हमारे बीच बचा हुआ आख़िरी फ़ासला भी मिट गया।
दस दिनों की उसकी तड़प अब सिर्फ़ उसकी आँखों में नहीं थी।
मैं उसे अपने भीतर तक महसूस कर रही थी।
मेरी रूह उसकी बाँहों की क़ैद में जैसे उससे रिहाई भी माँग रही थी और उसी क़ैद में थोड़ा और ठहर भी जाना चाहती थी।
मगर उसकी मज़बूत बाँहें मुझे इस तरह थामे थीं, जैसे उसका ये दीवानापन आज मुझे पूरी तरह पागल कर देगा।
ऐसा जुनून…
मैंने पहले कभी महसूस नहीं किया था।
“बस कर ना…”
मैंने उसे रोकते हुए कहा।
शायद मैं उसे नहीं, खुद को रोक रही थी।
उसके बढ़ते आवेग को महसूस करके मैंने धीमे से उसे रोक दिया।
वो वहीं ठहर गया।
मगर उसकी बाँहों की पकड़ अब भी ढीली नहीं हुई थी।
“मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूँ…”
उसने मेरी आँखों में देखते हुए कहा।
“मुझे नहीं सुनना…”
मैंने तुरंत नज़रें फेर लीं।
क्योंकि कुछ बातें सुन लेने के बाद अनसुनी नहीं की जा सकतीं।
और शायद मुझे डर उसी बात का था।
उसने अपना चेहरा मेरे चेहरे के बिल्कुल पास ला दिया।
मैंने चेहरा दूसरी ओर घुमा लिया।
उसके होंठ मेरे गालों के पास थे और उसकी गर्म साँसें मेरी त्वचा को छू रही थीं।
उसके हाथ अब भी मेरी कमर को कसकर थामे हुए थे।
और उस एक पल में…
न वो मुझे जाने दे रहा था,
न मेरा दिल सचमुच वहाँ से जाना चाहता था।
“अच्छा, मुझे घर जाना है।”
कहते हुए मैंने खुद को छुड़ाया। उसने दोबारा अपनी तरफ मुझे खींचा।
जैसे मेरी खुशबू अपने मन में, अपने भीतर भर लेना चाहता हो। मेरे पिंक टॉप को उठाकर उसने अपने हाथ मेरी कमर पर रख दिए और धीरे-धीरे वो ऊपर जाने लगा।
“मुझे देर हो रही है,” कहकर मैंने उसे छुड़ाया।
गाड़ी धीरे-धीरे घर के रास्ते की ओर चलने लगी। उसका हाथ मेरे हाथों में।
मौसम बाहर रूमानी हो चला था।
बारिश की आहट होने लगी।
वो बीच-बीच में मेरी तरफ़ देखता और फिर वापस सड़क पर नज़रें टिका देता।
“क्या है?”
आख़िर मैंने पूछ ही लिया।
“कुछ नहीं।”
“तो बार-बार देख क्यों रहे हो?”
उसके होंठों पर हल्की-सी मुस्कान आ गई।
“देख भी नहीं सकता?”
मैं मुस्कुरा दी और शीशे की तरफ़ चेहरा कर लिया।
बाहर शाम धीरे-धीरे अपना रंग बदल रही थी।
सड़क के दोनों तरफ़ लगी लाइटें जलने लगी थीं। उनकी रोशनी कभी शीशे से गुज़रकर मेरे चेहरे पर पड़ती, कभी अगले ही पल पीछे छूट जाती।
हवा में अब पहले जैसी गर्मी नहीं थी।
मैंने शीशा थोड़ा नीचे किया।
ठंडी हवा का एक झोंका मेरे चेहरे से टकराया और चेहरे के पास छूटी कुछ लटें हवा में उड़ने लगीं।
मैंने हाथ बाहर निकाल कर बारिश महसूस की, मेरे हाथ बारिश में गीले होने लगे,
“क्या मस्त बीयर वाला मौसम और तू बगल में”
मैने हाथो के पानी से उसे छींटे मार दिये
“अच्छा, मुझे तुमसे कुछ कहना है।”
मैंने गर्दन हिला दी और शीशे से बाहर देखने लगी।
उसने मेरी ठुड्डी पकड़कर मेरा चेहरा अपनी तरफ घुमा लिया। मैंने उसका हाथ अपनी ठुड्डी से हटाया।
और अपने बाल खोल लिए।
हमारे पास से एक ठेका निकला।
मैंने उसे जाते हुए देखा।
“पी जाएँ?”
उसने इतनी जल्दी मेरी तरफ़ देखा कि मुझे हँसी आ गई।
“क्या?”
“कुछ नहीं,” वो मुस्कुराया। “आज तू मुझे surprise पे surprise दे रही है।”
वो खुश हो गया।
“मैं हर किसी के साथ नहीं पीता। You are very special to me”
“मैं दारू ही नहीं पीती।”
“सो, तू प्यार करती है मुझसे?”
मैंने कोई जवाब नहीं दिया।
Elephant के चार कैन लेकर आया।
गाड़ी चलने लगी।
एक खोलकर उसने मुझे दिया।
और एक खोलकर ड्राइव करते हुए पीने लगा।
“Cheers Baby”
दारू के नशे में मुझे उसे देखने की हिचकिचाहट कम हो गई।
बस जो मैं इतने समय से छिपा रही थी, उसे छिपाने की कोशिश थोड़ी कम हो गई थी।
मैं लगातार सीट पर सिर टिकाकर उसे देखने लगी।
मेरी आँखों में देखते हुए, मेरे माथे पर आई लट को हटाते हुए बोला, “क्या देख रही है?”
मैंने करीब जाकर उसके गालों पर होंठ रख दिए और वो मेरे पास आ गया।
गाड़ी रुक गई।
बीयर आधी हो गई।
ड्राइवर सीट पीछे हो गई।
मैं उसके ऊपर बैठी और उसने मेरे बाल पकड़ लिए।
होंठों पर होंठ।
एक हाथ में बीयर थी। बीयर मेरी गर्दन और पिंक टॉप पर गिर गई और मेरे वक्षों की ओर जाने लगी। बीयर का घाव गहराने लगा और चुंबन गहराने लगे। बीयर अब कैन से नहीं, मेरे तन से पीने लगा।
Side Blinds लग गए और उसने मुझे पीछे धकेल दिया। मैंने बीयर खत्म की।
और उसने मेरा गीला टॉप उतारकर मुझे अपनी बाँहों में भर लिया।
दो देह, दो जिस्म। हाथों में हाथ, उँगलियाँ फँसाए एक होने लगे। सारी दूरियाँ मिटने लगीं। बाहर बारिश तेज़ होने लगी।
गाड़ी के शीशे अंदर की गर्माहट से धुँधलाने लगे। चरम सुख की सीमा लाँघ मुझे वो इस दुनिया के पार ले गया। आँखें बंद होने लगीं। अब सिर्फ वो था और मैं थी और दोनों जिस्म उस बारिश की शाम एक होने लगे।
गाड़ी के स्पीकर पर एक गाना बज रहा था। उसके शब्द मेरे कानों में गूँजने लगे—
मेरे ऊपर बिखर गया पूरा का पूरा वो।
और मैं तेज़ होती बारिश, गहराती हुई शाम को देखते हुए उसके कंधों को चूमने लगी।
माही, मेरा नहीं, मेरा नहीं
तेरा बनके रहना..
एक शाम एक ज़िद्द के नाम..
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