मनोवेग
एक अव्यक्त मनोवेग थाजो उस रात के पश्चातमेरे भीतर निरंतर गूंजता रहा। सब कुछ सामान्य था—उसका सान्निध्य,उसका स्पर्श,उसकी सहज उपस्थिति भी।फिर भीमेरे अंतर्मन मेंएक अजीब-सी रिक्तता उतर आई थी,मानो किसी ने दीप तो जलाया हो,पर ऊष्मा देना भूल गया हो। मैं बहुत देर तकउस क्षण का अर्थ खोजती रही।क्या कमी थी?कौन-सा भावमेरे हृदय तक पहुँचने…