manoveg
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मनोवेग

एक अव्यक्त मनोवेग था
जो उस रात के पश्चात
मेरे भीतर निरंतर गूंजता रहा।

सब कुछ सामान्य था—
उसका सान्निध्य,
उसका स्पर्श,
उसकी सहज उपस्थिति भी।
फिर भी
मेरे अंतर्मन में
एक अजीब-सी रिक्तता उतर आई थी,
मानो किसी ने दीप तो जलाया हो,
पर ऊष्मा देना भूल गया हो।

मैं बहुत देर तक
उस क्षण का अर्थ खोजती रही।
क्या कमी थी?
कौन-सा भाव
मेरे हृदय तक पहुँचने से रह गया?

अब समझ आती है—
मैं उस मिलन में
केवल देह का स्पर्श नहीं,
अपितु आत्मीयता का आलोक खोज रही थी।

ऐसा आलिंगन
जिसमें मन का कम्पन भी सुनाई दे,
ऐसी निकटता
जिसमें मौन भी आश्वस्त करे,
ऐसी दृष्टि
जो मुझे केवल चाहे नहीं,
मुझे ग्रहण भी करे।

पर उस रात्रि
मेरे भीतर का भावलोक
अत्यंत संवेदनशील हो उठा।
एक ओर आकर्षण था,
दूसरी ओर
अव्याख्येय भय।

और उसी भय ने
मुझसे वह करा दिया
जिसे आज भी स्मरण कर
मन द्रवित हो उठता है—
मैंने उसे स्वयं से दूर कर दिया।

अब कभी कोई गीत,
कोई धुन,
कोई क्षीण स्मृति
उसका आभास कराती है,
तो प्रतीत होता है
मैं उसे नहीं,
अपने ही उस कोमल अंश को खोज रही हूँ
जो उस एक क्षण में
अचानक अत्यंत जागृत हो उठा था।

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