मृगतृष्णा
मैं तुम्हें तुम्हारे सच से मिलाने नहीं आई थी।
मैं आई थी तुमसे मिलने, तुम्हें जानने, तुम्हें पहचानने… कि तुम कौन हो, क्या हो, और किस नज़रिए से ज़िंदगी को देखते हो। तुम्हारे दिल में क्या है?
इतना हसीन चेहरा, भले कितना भी खूबसूरत क्यों न हो, होता तो इंसान ही है।
और इंसान क्या है? दिल और जिस्म।
शायद एक टूटा हुआ दिल।
हम कभी-कभी किसी से ऐसे बंध जाते हैं कि भूल जाते हैं कि यह दिल कभी हमारा अपना भी था। हम सब कुछ खो बैठते हैं—सिर्फ उस प्यार के चक्कर में, जो हमें वो रंगीन दुनिया दिखाता है जहाँ रातें दिन से भी खूबसूरत होती हैं। जिसका अहसास जिस्म के एक-एक pore पर होता है… कि बस चरम सुख हमें इसी से मिल सकता है।
पर जब बदले में वो प्यार, वो अहसास, या केवल वो एक छुअन दिल को तो क्या, रूह को भी नहीं मिल पाती, तो इंसान सुकून की तलाश में जीना शुरू कर देता है।
और यहीं से सिलसिला शुरू होता है एक नई कहानी का—खुद को ढूँढने की कहानी का।
एक ऐसी कहानी जो तुम्हें खुद से मिलाती है। तुम्हें बताती है कि तुम्हें क्या अच्छा लगता है, तुम क्यों जीते हो, और तुम क्या चाहते हो।
और जब भी तुम दोस्तों के साथ बैठते हो, तुम्हें उसकी याद आती है। किसी ने सही ही तो कहा है—
“एकतरफा प्यार की ताकत कोई नहीं जानता, इस पर सिर्फ उस टूटे हुए दिल का हक होता है।”
कई लोग प्यार पाकर भी खुश नहीं होते। वो मंज़र ज़्यादा दर्दनाक होता है। जब कोई प्यार करके तुम्हें छोड़ जाए, तुम्हारे साथ होकर भी खुद को अकेला महसूस करे, और तुम दिल-जान लगा दो उसके लिए, पर फिर भी वो किसी और को चुन ले।
कैसे बाहर आते हैं लोग इन सब से?
सच तो ये है कि लोग बाहर नहीं आते, वो अंदर जाते हैं—खुद को ढूँढने। कोई पहाड़ चढ़ता है, कोई ‘गुलज़ार’ बन जाता है, कोई यार बनता है तो कोई दारूबाज़ बन जाता है। प्यार के नाम पर बदनाम वो सब कुछ करने लगता है, जिससे वो अपने खोए हुए दिल को वापस ला पाए।
और फिर शुरू होती है एक और कहानी—किसी और के आने की। एक ऐसी दस्तक, जिस पर तुम्हें यकीन नहीं होता। वो तुम्हारे दिल को फिर से प्यार करने पर मजबूर कर देती है—वही प्यार जो तुम सोचते थे कि कभी कर ही नहीं पाओगे।
पर तुम भूल जाते हो… प्यार किया नहीं जाता, हो जाता है।
दिल फिर से बेकाबू हो जाता है। फिर से चल पड़ता है टूटने के लिए।
ऐसा ही एक ख्वाब मैंने भी देखा था—तुमसे दोस्ती करने का। दिल हवाई जहाज़ की speed से भाग रहा था और मैं पीछे छूटती जा रही थी। जाने कहाँ से सब कुछ ऐसा चल रहा था, मानो आसमान में बादल हों और वो पीछे छूट ही जाएँगे।
मंज़िल इतने करीब आ जाएगी कि मेरे होंठ तुम्हारे होंठों पर होंगे, मैंने सपने में तो क्या, भूले से भी नहीं सोचा था। मगर हवाई जहाज़ बना यह दिल ज़िद्दी था, और कुछ मेहरबानी महादेव की भी हो गई। जाने कैसे उन्होंने मुझे दे दिया तुम्हें—पूरा का पूरा।
मैंने तुम्हें कभी बिना कपड़ों के देखने की कोशिश भी नहीं की थी, पर तुम मेरे सामने थे… बिल्कुल निर्वस्त्र।
क्या सुंदर चीज़ थे तुम। हर जगह से चूम लूँ, जी भर के देख लूँ, आँखों में समेट लूँ… ये सोच पाती, इससे पहले तुम मेरे अंदर थे।
तुम्हारी आँखें, तुम्हारा वो प्यार से मुझे उठाकर पलट देना, मेरे ऊपर आ जाना… जैसे मैंने उन चंद मिनटों में खो दिया खुद को। कर दिया खुद को तुम्हारे हवाले—पूरा का पूरा।
जिस जिस्म को रोक रखा था किसी के लिए, बहा दिया तुम्हारे लिए।
बहुत ही कीमती था वो पल, जिस पल मैंने सोचा था तुम्हें दे दूँगी सब कुछ—तन, मन, धन… और दे भी चुकी थी।
बस तुम ही थे दूर-दूर से। शायद कुछ सोच रहे थे।
प्यार में एक इंसान Everest पर होता है और कुछ धरातल पर। मैं समझ चुकी थी कि बर्फ़ में गहरा घुस चुकी हूँ, अब oxygen नहीं मिलेगी बचने के लिए। अब तो सीधा महादेव ही बचाएँगे।
महादेव तो नहीं आए। ना ही तुम आए।
और मैं झंडा लिए Everest पर खड़ी रही कि शायद तुम देख लो मेरे प्यार की ऊँचाई, या देख लो मेरे जज़्बातों की गहराई।
शायद डर था तुम्हें कि डूब ना जाओ तुम। इसीलिए तुमने मुझे casual ही रखा।
कहाँ मैं प्रेम की वारी, कहाँ तुम झोंकों से भारी—कि हवा भी चले तो पूरा तूफ़ान बन जाए।
खो ही दिया था खुद को। वापस आना नामुमकिन सा था। हर पल तुम्हारी याद आती रहती थी। तरस रही थी, बेबस थी। अमलतास के फूलों को पेड़ों से गिरता-झड़ता देख रही थी।
एक-एक दिन गुज़र रहा था इस आस में कि शायद महादेव कुछ बोलेंगे। असुरों तक को वरदान दिया, एक मुझ जैसी भोली सी लड़की की बात सुन लेते।
जब इतना दिया, तो उसके दिल में मेरे लिए थोड़ी जगह क्यों नहीं दी?
बस दोस्ती ही तो माँगी थी… ताकि उम्र भर उसे साथ रख सकती। जब मन करता देख सकती, जब मन करता बात कर सकती।
तुमने ज़्यादा दे दिया और छीन लिया। ना पूरा होने दिया, ना अधूरा रहने दिया।
ये आधा सा, अधूरा सा अपनापन मुझे समझ नहीं आया। ना आएगा।
और फिर शुरू हुई कहानी खुद को खोजने की।
मैंने तुमसे दूर जाकर ये जाना कि आज तक मुझे कभी किसी से प्यार असल में हुआ ही नहीं था। तुमने मेरे इस सोए हुए दिल में प्यार जगा के आग लगा दी।
मैंने जलाना शुरू कर दिया सारा संसार।वो मेरा सुकून था, और मैंने अपना सुकून खो बैठी थी।
पागल समझती थी लोगों को मैं, खुद पगलाने लगी। तुम्हारी तस्वीर देखकर या तुम्हारी बातें सोचकर मुस्कुराने लगी। याद करने लगी तुम्हारा हँसता हुआ चेहरा, जो दिल को एकदम से चीर जाता है।
लिखते-लिखते भी क्या करूँ… इसे प्यार कहूँ कि नहीं? या कुछ दिनों का पागलपन?
फिर से दिल किसी और के पीछे लग जाएगा। तब तक के लिए तुम ही सही।
वापस ना आना… कि कहीं ये दिल फिर से टूट जाए।
तुम्हें देखूँगी तो फिर से हवाई जहाज़ बन के बैठ जाएगा तुम्हें निहारने, और भूल जाएगा कि कितना रोया था, हारा था तुम्हारे प्यार में… तुम्हारी याद में… उन रातों में जब मुझे जवाब नहीं मिलते थे।
जब मैं कहती थी कुछ और, तुम नहीं सुनते थे।
जब मैं रोकती थी, तुम नहीं रुकते थे।
जब मैं पूछती थी, तुम झूठ बोलते थे कि तुम्हारी ज़िंदगी में कोई नहीं है।
छोड़ो… जाने दो।
फिर से अब प्यार नहीं होगा। तुमसे दोबारा अब कभी नहीं होगा।
क्योंकि जिससे मैं प्यार करती थी, वो तुम नहीं थे…
वो तुम्हारा बनाया गया एक रूप था, जो कभी असल में था ही नहीं।

