अजनबी
आज फिर तुम्हारी याद ने मुझे हर जगह से घेर लिया।
दारु भी पी ली तुम्हें भूलाने के लिए…
एक
दो
तीन
चार
दर्द बढ़ने लगा,
आंसू बहने लगे।
सोचा था शायद कुछ देर के लिए दिल हल्का हो जाएगा।
पर यादें शराब से नहीं धुलतीं।
वो और गहरी हो जाती हैं।
मैं आज तुम्हें भूलने गई थी,
लेकिन हर दीवार पर वही पहाड़ थे,
लंबे लंबे, ऊंचे ऊंचे पेड़।
लग रहा था जैसे कोई साज़िश है
तुम्हें भूलने न देने की।
बस तुम्हारी कमी थी।
ठंडी हवा का झोंका आया,
मैंने पलकें बंद कर लीं
इसी उम्मीद में कि
जब खोलूं… तो तुम हो।
जैसे ज़िंदगी ने तुम्हारा चेहरा हर मंज़र पर चिपका दिया हो।
मैं भागना चाहती थी तुमसे दूर,
पर जितना दूर जाती हूं, उतना तुम्हारे पास लौट आती हूं।
आज भी वही हुआ।
Gaana चल रहा था,
आंखों में आंसू थे,
और दिल बस एक ही बात कह रहा था —
“काश तुम यहां होते…”
काश मैं तुम्हारे पास भागकर आती,
तुम्हें ज़ोर से गले लगाती,
और इतना रोती कि शायद मेरा दिल हल्का हो जाता।
शायद तुम समझ पाते
कि कितनी लगन लग गई है तुमसे।
इतना वक्त बीत गया,
ज़िंदगी इतनी आगे बढ़ गई,
पर मेरा दिल वहीं अटका हुआ है — तुम पर।
और फिर…
मैं खड़ी थी 804 के बाहर।
दरवाज़े के उस पार तुम होगे?
या नहीं?
अंदर आऊं?
या चुपचाप लौट जाऊं?
क्या तुम पिछली बार की तरह गुस्सा हो जाओगे?
एक हल्की सी आहट हुई…
और मैं डर गई।
मैं वापस मुड़ गई।
पता नहीं कैसे बताऊं,
तुम्हारे बिना मन नहीं लगता।
कभी कभी लगता है
ज़िंदा रहना भी एक सज़ा है।
हर खुशी में दर्द है।
हर लफ्ज़ में दर्द है।
सांसों में भी दर्द है।
बस एक बार…
सिर्फ एक बार तुम वापस आ जाओ।
बात कर लो मुझसे।
गले लगा लो।
मुझे महसूस करने दो
कि तुम अब भी मेरे हो।
मेरे दिल की धड़कन पर अब भी तुम्हारा नाम लिखा है।
कभी कभी सोचती हूं —
क्या हम फिर से अजनबी बन सकते हैं?
फिर से शुरू कर सकते हैं?
इस बार बिना गलतियों के।
इस बार सिर्फ प्यार हो…
और साथ भी।
क्या मैंने बहुत ज़्यादा मांग लिया?
सिर्फ तुम्हें ही तो मांगा था।
कभी कभी दिल करता है
सब कुछ तुम्हारे नाम लिख दूं —
ये जीवन, ये सांसें, ये रातें, ये दर्द।
पर फिर एक सवाल सामने खड़ा हो जाता है —
तुम कभी वापस आओगे?
या मुझे तुम्हारे बिना जीना सीखना होगा?
सच कहूं,
अब मुझे नहीं पता।
बस इतना पता है —
आज भी दिल तुम्हें ही पुकारता है।
Please… वापस आ जाओ।
वापस आ जाओ।

