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तारे

तुम्हारे नज़रिए से सोचती हूँ तो समझ नहीं आता तुम्हें कैसा लगा होगा।

मैं शायद ज़्यादा सोचती हूँ… इसलिए वही लिख रही हूँ जो दिल में है, जो बाहर आ ही नहीं पा रहा।

हर वक़्त तुम्हें देखने का मन करता है। तुम्हें अपनी बाँहों में भरकर सुलाने का मन करता है। तुम्हारे पूरे चेहरे पर अपने होंठ रखकर तुम्हें प्यार करने का मन करता है। पर तुमने कभी मुझे खुलकर अपना हक़ जताने ही नहीं दिया… जैसे तुम खुद नहीं चाहते थे कि कोई तुम्हें इतना प्यार करे।
मेरे अंदर मोहब्बत का समंदर था, और तुम पहाड़ जैसे — ऊँचे, ख़ामोश, दूर। मैं बस तुम्हारे क़रीब आना चाहती थी, मगर तुमने मुझे अपने दिल तक आने ही नहीं दिया।

तुम्हें देखते-देखते, तुमसे बात करते-करते आदत सी हो गई थी तुम्हारी। अब हालत ये है कि ना ठीक से सो पाती हूँ, ना जाग पाती हूँ। ये कैसी तलब लगा दी है तुमने… तुमसे बात किए बिना दिन नहीं कटता, और रातें इतनी लंबी लगती हैं कि हर पल बेचैनी से भरा रहता है।

बहुत मन था तुम्हारे साथ कहीं दूर पहाड़ों पर जाऊँ… खुले आसमान के नीचे ढेर सारे तारे देखूँ। शायद तुम्हारी बाँहों में सिर रखकर। तुम्हारी चमकती आँखों में वो सारे तारे देखूँ। तुम्हारी हँसी, तुम्हारी मुस्कुराहट बस यूँ ही देखती रहूँ।
तुम्हें कैसे बताऊँ कि तुम मुझे कितने अच्छे लगते हो… कभी-कभी मन करता था सब छोड़कर सीधे तुम्हारे पास आ जाऊँ, तुम्हारी कुर्सी पर बैठ जाऊँ, तुम्हें चूम लूँ… और बस तुम्हें देखती रहूँ। अपनी उँगलियाँ तुम्हारे चेहरे पर, तुम्हारे होंठों पर, तुम्हारी गर्दन पर, तुम्हारे टैटू पर फेरती रहूँ… और हर एहसास को अपने अंदर हमेशा के लिए रख लूँ।

पर तुम्हारे पास वक़्त ही कहाँ था मेरे लिए…
मैं डूब रही थी, और बस चाहती थी कि तुम एक बार आकर मुझे मुझसे बचा लो। बस एक रात… मेरे पास आँखें बंद करके सो जाओ। तुम्हारी साँसें महसूस करनी थीं मुझे। तुम्हारे बालों में उँगलियाँ फेरनी थीं। तुम्हें कसकर अपनी बाँहों में भरना था।
पर तुमने कभी मुझे वो पल जीने ही नहीं दिए।

पता नहीं तुम्हें किस बात का डर था।
मैं बस इतना चाहती थी कि जब मैं जाने लगूँ, तो तुम मुझे वापस खींच लो… और कहो कि कहीं मत जाओ। फिर हम बस एक-दूसरे में खोए रहें।
पर शायद कुछ ख़्वाब, ख़्वाब ही रहने के लिए होते हैं।

आज एक रूमानी सी reel देखी… तुम्हारी याद आ गई। बहुत मन हुआ तुम्हें भेज दूँ, फिर याद आया — अब वो हक़ नहीं रहा।

सच बताना, नाराज़ हो क्या? या बस पीछा छुड़ाना चाहते थे? मेरे ज़हन में हर पल एक जंग चलती है, एक अजीब सा डर और घबराहट मुझे घेरे रखती है कि आख़िर मेरी ग़लती क्या थी? मैंने तो सिर्फ़ टूटकर चाहा था तुम्हें, क्या यही मेरा गुनाह था? जब मैंने कुछ ग़लत किया ही नहीं, तो फिर यह सज़ा, यह तन्हाई और यह बेरुख़ी सिर्फ़ मेरे हिस्से ही क्यों आई? हाँ, माना मैंने तुम्हें ब्लॉक कर दिया… पर तुम भी तो चुप होकर बैठ गए। तुम्हारी यह ख़ामोशी मेरे अंदर रोज़ एक चीख़ बनकर गूँजती है।

कभी सोचते हो मेरे बारे में?
इतने दिनों में क्या एक बार भी मेरी याद नहीं आई? क्या मैं कभी तुम्हारी ज़िंदगी में मायने रखती थी? क्या तुम्हें सच में मेरी परवाह थी?
शायद ये सवाल हमेशा सवाल ही रह जाएँगे।

तुम आगे बढ़ जाओगे… तुम्हारी शादी हो जाएगी… और मैं शायद यहीं अटकी रह जाऊँगी, उन्हीं अधूरे लम्हों में। बस इस इंतज़ार में कि कभी तो तुम्हारा थोड़ा सा वक़्त, थोड़ा सा दिल मुझे मिलेगा।

शायद तुमने मुझे कभी चाहा ही नहीं।
मैं परवाना बनकर उस मोहब्बत में जलती रही जो तुम्हें कभी हुई ही नहीं।
हाँ, मैंने तुम्हारी आँखों में वो आग महसूस की थी… मगर शायद वो मेरे लिए नहीं थी।

दिल कितना अजीब होता है ना… इंसान mature हो जाता है, मगर दिल वहीं का वहीं रह जाता है।
पता नहीं इस दर्द से कभी बाहर आ भी पाऊँगी या नहीं। इस एक महीने का हिसाब शायद अगले जनम में लूँगी। इतना तड़पाऊँगी तुम्हें कि तुम मुझे माँगो… और मैं फिर भी ना मिलूँ। तब शायद मेरे हर आँसू का हिसाब पूरा होगा।

माफ़ तो शायद एक दिन कर दूँगी तुम्हें…
पर तुम्हें भूलना कैसे सीखूँ, ये नहीं जानती।
काश कोई तरीका होता कि तुम्हें भूलना आसान हो जाता।

लोग कहते हैं वक़्त सब ठीक कर देता है। मैं भी उसी वक़्त का इंतज़ार कर रही हूँ… कि कब ये उम्मीद खत्म होगी कि एक दिन तुम वैसे लौटोगे जैसे मैंने तुम्हें चाहा था।
और अगर कभी तुम लौट भी आए… बस एक बार मेरा हाल पूछने… तो शायद मैं फिर पिघल जाऊँगी, फिर से तुम्हारी हो जाऊँगी, फिर सब कुछ हार जाने के लिए तैयार।

लेकिन अफ़सोस…
शायद तुम बहुत आगे बढ़ चुके हो।
और मैं वहीं खड़ी रह गई हूँ — उस दिन, उस जगह… तुम्हारे घर के बाहर… सिर्फ एक बार तुम्हें गले लगाने की उम्मीद में। इतनी दूर से सिर्फ तुम्हारा चेहरा देखने आई थी मैं… पता नहीं तुम समझ पाए थे या नहीं।

तुमसे दूर रहना मेरे लिए नामुमकिन था… फिर भी किसी तरह ज़िंदा हूँ। बस खुद से एक सवाल करती रहती हूँ — क्या मेरे प्यार में कोई कमी थी?

अगर मेरा प्यार सच था… तो एक दिन तुम्हें मेरी याद ज़रूर आएगी। तुम रोओगे भी…
मगर शायद तब तक मैं वहाँ नहीं रहूँगी।

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