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अलविदा

आज बहुत दिनों बाद… मैंने फिर वो बंद पन्ने टटोले,
हमारी पुरानी chats के वो अधूरे किस्से खोले।

सोचा था वक़्त गुज़र गया, अब दिल नहीं धड़केगा,
मैं संभल गई हूँ, अब ये ज़ख्म दोबारा नहीं रिसेगा।

पर जैसे ही पहली लाइन पर नज़र गई, मैं फिर वहीं ठहर गई,
मैं भागती रही जिससे, आज फिर उसी मोड़ पर उतर गई।

सामने खड़ी थी वही पुरानी, नादान सी लड़की…
जो बस तुम्हारे एक reply के लिए पल-पल तड़पती थी,
तुम्हें online देखकर जो बेवजह मुस्कुराती थी,
और तुम्हारे एक मामूली से ‘Hi’ को दिन भर दोहराती थी।

मुझे उस लड़की पर आज बहुत प्यार आया…
और बहुत रोना भी,
उसे कहाँ पता था कि एक दिन सिर्फ यादें रह जाएँगी
और सब खोना भी।

वो थक जाएगी इस कदर कि सांस लेना भी भारी होगा,
उसे नहीं मालूम था कि ये इश्क सिर्फ उसी की बीमारी होगा।

तुमसे पहले भी मुसाफिर इस दिल के रास्ते से गुज़रे थे,
लोग आए, लोग गए, पर हम कभी इस तरह न बिखरे थे।
जाने क्यों तुम्हारे जाने के बाद, तुम्हारी कमी यहीं ठहर गई,
जैसे कोई आवारा उदासी घर ढूंढ रही थी… और उसे मेरी रूह मिल गई।

हँसती हूँ, काम करती हूँ, महफिलों में बैठती हूँ ज़माने की,
आदत डाल ली है मैंने खुद को हर पल मसरूफ़ दिखाने की।
पर न जाने कहाँ से अचानक कोई शाम, कोई धुन, कोई राह गुज़रती है,
और एक पल में बिखर जाती है इमारत मेरे संभल जाने की।

मैं थक गई हूँ तुमसे नहीं… तुम्हारी इस खामोश कमी से,
दिल के उस खाली कोने से,
आँखों की इस नमी से।

उस उम्मीद से… जो कम्बख्त रोज़ मरती है और रोज़ जी उठती है,
मैं रोज़ अपने दिल को समझाती हूँ,
ये तड़प रात होते ही क्यों उठती है?

उसे कहती हूँ—”बस कर, वो नहीं आएगा,
वो भूल चुका होगा,
उसकी दुनिया में तेरा ज़िक्र तक न होगा,
वो सो चुका होगा।”

दिल मान भी जाता है उजाले में मेरी कसम खाकर, पर रात होते ही… ये फिर घुटनों के बल तुम्हारे पास लौट जाता है।

मुझे तुमसे बस एक सवाल पूछना है, जो शायद कभी पूछ नहीं पाऊँगी,
इस घुटती हुई खामोशी को कभी लफ्ज़ नहीं दे पाऊँगी

क्या तुम्हें कभी खबर भी हुई थी… कि मैं तुमपर कितना मरने लगी थी?
नहीं, ‘प्यार’ तो बहुत छोटा और खोखला लफ्ज़ है, मैं तो तुम्हारे साये में खुद का वो हिस्सा जी रही थी,
जो पाकीज़ा था, जो सिर्फ मेरा था, जिसे मैं छुपा कर पी रही थी।
तुम गए… तो वो हिस्सा भी अपने साथ समेट ले गए।

आज वो locked folder खोलकर मैं बहुत देर तक रोई हूँ,
तुम्हारी तस्वीरों को सीने से लगाकर, मैं जागते हुए सोई हूँ।
पागलपन है ना? फोन की बेजान स्क्रीन को छाती से चिपकाए रखना, जैसे वो कांच का टुकड़ा नहीं, तुम्हारी धड़कन हो।
मन में बस एक ही हूक उठ रही थी— कि काश… बस एक बार तुम्हें देख पाती।

कुछ कहती नहीं, कोई गिला-शिकवा नहीं करती,
बस एक नज़र देख लेती, तो शायद इस तड़पते दिल को कुछ पल की राहत मिल जाती।

डर इस बात का नहीं कि तुम अब कभी लौट कर नहीं आओगे,
डर तो ये है कि तुम मुझे एक दिन इस मोड़ पर छोड़ जाओगे
जहाँ मुझे मानना पड़ेगा कि तुम तो बस एक राहगीर थे सफ़र के,
और मैं नासमझ थी जो तुम्हें अपनी पूरी कायनात समझ बैठी।

अगर ये सच निकला… कि तुम्हारे लिए मैं कुछ भी नहीं थी,
तो मेरा दिल नहीं टूटेगा, मेरा ‘भरोसा’ मर जाएगा।
और मैं नहीं जानती कि इन दोनों में से कौन सा ज़ख्म ज़्यादा गहरा घाव कर जाएगा।

अब बहुत रात हो गई है… सब सो गए हैं,
पर मेरे आंसू इस कोरे कागज़ पर शब्द बनकर खो गए हैं।
मैं रोते-रोते बस यही लिख रही हूँ, यही सोच रही हूँ
तुम थे ना? जो मैंने महसूस किया… वो सब सच था ना?
या मैं किसी ख्वाब के अवशेष में अकेली खड़ी हूँ?

गलतफ़हमी रहने दूँ,
या अलविदा कह दूँ,
बता दो मुझे…


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