तूफ़ान
आज कुछ अजीब हुआ।
मैं बैठी हुई काम कर रही थी। बिल्कुल सामान्य दिन था। न मैं तुम्हारे बारे में सोच रही थी, न किसी याद में खोई हुई थी। फिर अचानक एक vision आया।
जैसे तुम मेरा चेहरा अपने दोनों हाथों में थामे हुए हो।
और मेरे पूरे चेहरे पर kisses कर रहे हो।
इतनी clear intuition थी कि मैं एकदम से घबरा गई।
क्योंकि हाल-फिलहाल में मेरा ऐसा कुछ मन भी नहीं किया। मैं तो अपने काम में लगी हुई थी। इसलिए यह एहसास यूँ ही आया हो, ऐसा मुझे नहीं लगा।
मैंने खिड़की से बाहर देखा।
बाहर तूफ़ान था।
भयंकर तूफ़ान।
एकदम काला तूफ़ान।
इतनी तेज़ बारिश, इतनी तेज़ हवा, जैसे पेड़ गिर जाएँ, जैसे दुनिया तहस-नहस हो जाए। आसमान और धरती के बीच जैसे कोई उन्माद चल रहा था, कोई बेचैनी, कोई ऐसी बात जिसे शब्दों में नहीं कहा जा सकता।
और उसी पल मेरे भीतर एक सवाल उठा।
तुम तो पहाड़ों के इंसान हो।
तुम्हारे भीतर भी शायद मौसम कुछ ऐसे ही आते होंगे।
करीब तीन या साढ़े तीन बजे मुझे ऐसा लगा जैसे तुम जहाँ भी हो, मुझे बहुत miss कर रहे हो।
जैसे तुम्हारा मन मेरा चेहरा kiss करने का कर रहा हो।
या शायद मेरे साथ सोने का।
लेकिन क्यों?
यही बात मेरी समझ में नहीं आई।
तुम अपने Papa की वजह से परेशान हो।
कुछ career को लेकर।
कुछ शादी के pressure को लेकर।
कुछ उन responsibilities को लेकर जिनके बारे में शायद तुम किसी से खुलकर बात भी नहीं करते।
तुम्हारे दिमाग में बहुत कुछ चल रहा है।
और सच कहूँ तो मुझे नहीं पता कि उन सबके बीच मैं कहाँ आती हूँ।
तुम्हारी ज़िंदगी आसान नहीं है।
उसमें बहुत सारी responsibilities हैं।
मैं यह समझती हूँ।
मैं यह भी समझती हूँ कि तुम उन लोगों में से नहीं हो जो emotions को अपने ऊपर हावी होने देते हैं।
लेकिन फिर मैं सोचती हूँ—
अगर सचमुच ऐसा है,
तो मेरे ऊपर तुम पूरे के पूरे हावी क्यों हो?
आज यह तुम्हारा मुझे kiss करने का मन क्यों कर रहा था?
इसका कोई जवाब है?
तुम मुझसे इतनी physical intimacy क्यों चाहते हो?
क्यों तुम्हें लगता है कि मेरे करीब आकर तुम्हें शांति मिल जाएगी?
क्यों तुम्हें लगता है कि मेरे पास आकर कुछ हल्का हो जाएगा?
तुम मेरे पास क्या ढूँढते हो?
सुकून?
गर्माहट?
आराम?
एक safe space?
या इस भागती हुई ज़िंदगी में कोई ऐसा किनारा, जहाँ कुछ देर के लिए बैठा जा सके?
हमारे रिश्ते को कोई नाम नहीं है।
शायद कभी होगा भी नहीं।
फिर भी तुम्हारे भीतर यह कैसी इच्छा है कि तुम मेरे एकदम करीब आना चाहते हो?
दूर रहकर बेचैन हो जाते हो?
आख़िर ऐसा क्या है जो तुम्हें मेरी तरफ़ खींचता रहता है?
मुझमें ऐसा क्या है?
क्यों तुम्हें अपने आपको मेरे सामने संभालना पड़ता है?
यह कैसा attraction है?
यह कैसी कशिश है?
इतने दिन हो गए।
इतना समय बीत गया।
फिर भी क्यों लगता है कि तुम्हारे भीतर कुछ कम नहीं हुआ?
कभी-कभी तो मुझे भी मन करता है कि मैं आऊँ और तुम्हें kiss कर लूँ।
लेकिन मैं ऐसा नहीं करती।
क्योंकि मैं तुम्हें वह space देना चाहती हूँ जिसकी तुम्हें ज़रूरत है।
तुम्हें वो सब करने देना चाहती हूँ जो तुम्हें करना है।
मैं तुमसे कुछ expect नहीं कर रही।
कुछ भी नहीं।
फिर भी आज जो महसूस हुआ, उसने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया।
ये तुम्हारी कैसी इच्छाएँ हैं?
मेरे बिल्कुल करीब आकर खुद को महसूस करने की।
मेरी साँसों में अपनी साँसें मिलाने की।
मेरी मौजूदगी में कुछ देर के लिए सारी लड़ाइयाँ भूल जाने की।
और सबसे अजीब बात यह है कि मुझे इसकी खबर भी हो रही है।
जैसे कहीं कोई unspoken message पहुँच रहा हो।
जैसे तुम पागल हो रहे हो मेरे साथ फिर से सोने के लिए।
जैसे कोई तड़प है।
कोई अधूरी इच्छा।
कोई ऐसी प्यास जो अब तक बुझी नहीं।
लेकिन क्यों?
इतनी तड़प क्यों है तुम्हें?
क्या है जो मैं अब तक समझ नहीं पाई?
क्या बात है जो तुमने कभी कही नहीं?
क्या है जो तुम्हें बार-बार मेरी तरफ़ लौटाकर ले आता है?
और अगर सचमुच तुम्हारे पास इसका कोई जवाब है—
तो शायद एक दिन मुझे भी बताना।
क्योंकि उस भयंकर तूफ़ान के बीच, जब पूरी दुनिया हवा और बारिश के शोर में डूबी हुई थी,
मेरे भीतर सिर्फ़ एक ही सवाल गूँज रहा था—
“तुम आखिर मुझमें ढूँढते क्या हो?”

