Part 21 Sugandh POV

मैं Japan जाने की तैयारी कर रहा था। अगली सुबह मेरी flight थी। पूरा घर खुले हुए suitcase, आधे भरे cartons और इधर-उधर फैले कपड़ों से भरा पड़ा था। Wardrobe लगभग खाली हो चुकी थी। Study table पर passport, visa, joining documents और company की ओर से मिला welcome kit करीने से रखा हुआ था। Laptop के bag में आख़िरी बार charger रखा, फिर एक नज़र पूरे कमरे पर डाली। कुछ ही घंटों बाद यह घर वैसा ही रहेगा, बस मैं यहाँ नहीं रहूँगा।

चार साल।

Company ने मुझे Tokyo भेजने का फ़ैसला किया था। Promotion के साथ मिला यह onsite project किसी भी software engineer का सपना होता है। Team में हर कोई मुझे बधाई दे रहा था। Manager बार-बार कह रहा था कि career के लिए इससे बेहतर opportunity शायद ही मिले। मैं मुस्कुरा देता था। खुश भी था। शायद होना भी चाहिए था। लेकिन अजीब बात यह थी कि जितना मेरा career आगे बढ़ रहा था, उतना ही मुझे लग रहा था कि मेरी ज़िंदगी किसी दूसरी दिशा में पीछे छूटती जा रही है।

Ananya के office छोड़कर जाने के बाद पिछले दो महीने कैसे बीते, इसका हिसाब मेरे पास नहीं था। मैंने खुद को काम में डुबो दिया था। Meetings बढ़ा दी थीं। Office से सबसे आखिर में निकलता, घर आकर भी laptop खोलकर बैठ जाता। कई बार बिना वजह weekends पर भी office चला जाता, सिर्फ़ इसलिए कि खाली घर में लौटने का मन नहीं करता था। मुझे हमेशा लगता था कि इंसान काम में जितना चाहे खुद को उलषा सकता है, लेकिन कुछ लोग ऐसे होते हैं जो हर distraction के बाद भी वापस याद आ ही जाते हैं। Ananya उन्हीं लोगों में से एक थी।

उस रात के बाद उसने कभी मुझसे बात नहीं की थी।

मैंने भी नहीं की।

शायद इसलिए नहीं कि मैं करना नहीं चाहता था, बल्कि इसलिए कि मुझे समझ ही नहीं आ रहा था कि कहाँ से शुरू करूँ। उस रात उसके चेहरे पर जितने सवाल थे, उनमें से एक का जवाब भी मेरे पास नहीं था। मैं उसे रोक सकता था, उसके पीछे जा सकता था, उससे बात कर सकता था… लेकिन मैंने कुछ नहीं किया। कभी-कभी ख़ामोशी भी इंसान की सबसे बड़ी कायरता होती है।

मैंने suitcase की chain बंद की और उसे दरवाज़े के पास खिसका दिया। तभी अचानक मन में ख़याल आया कि उसे phone करूँ। बस इतना बता दूँ कि मेरा promotion हो गया है… कि मैं Japan जा रहा हूँ… कि शायद अगले चार साल तक वापस न आऊँ।

मैंने mobile उठाया। Contact list में उसका नाम अब भी उसी जगह था जहाँ हमेशा रहता था। अँगूठा call button तक गया… और वहीं रुक गया। अगर उसने phone नहीं उठाया तो? अगर उठा लिया… तो मैं क्या कहूँगा? ‘Hi Ananya… मैं Japan जा रहा हूँ?’ इतनी-सी बात कहने के लिए क्या तीन महीने की ख़ामोशी तोड़ी जाती है?

मैं हल्का-सा मुस्कुरा दिया। कभी-कभी इंसान अपने ही सवालों में इतना उलझ जाता है कि जवाब सामने होते हुए भी दिखाई नहीं देते। Phone वापस table पर रख दिया और balcony में आकर खड़ा हो गया। शाम धीरे-धीरे रात में बदल रही थी। नीचे सड़क पर वही रोज़ का शोर था। लोग अपने-अपने घर लौट रहे थे। किसी को जल्दी थी, कोई आराम से चल रहा था। ज़िंदगी सबकी चल रही थी… बस मेरी कहीं रुक-सी गई थी।

कई बार मुझे लगता था कि Saba के जाने के बाद जो खालीपन मेरे भीतर बना था, उससे मैं अब बाहर आ चुका हूँ। फिर Ananya मेरी ज़िंदगी में आई और मुझे एहसास हुआ कि कुछ ज़ख्म भरते नहीं, बस उनके ऊपर नई परतें चढ़ जाती हैं। उसने उन परतों को कभी जानबूझकर हटाया नहीं, लेकिन उसकी मौजूदगी भर से मैं फिर महसूस करने लगा था। हँसना आसान हो गया था। Office जाना अच्छा लगने लगा था। Coffee अब सिर्फ़ coffee नहीं रह गई थी। Lunch break का मतलब सिर्फ़ खाना नहीं था। उसके साथ बिताए हुए छोटे-छोटे पल जाने कब मेरी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बन गए थे।

और फिर… वो चली गई। उसके जाने के बाद मुझे पहली बार समझ आया कि किसी इंसान की आदत पड़ जाना और उससे प्यार हो जाना शायद दो अलग बातें नहीं होतीं।

मैंने गहरी साँस लेकर suitcase उठाया और नीचे parking में चला गया। सामान car की dickey में रखा और वापस ऊपर आने ही वाला था कि मुझे Rukhsaar का ख़याल आया। कल सुबह वही मुझे airport छोड़ने वाली थी। मैंने उसे phone मिलाया। “Rukhsaar, कल सुबह 6 बजे निकलना है। अगर हो सके तो आज रात यहीं रुक जाना।” “ठीक है। आधे घंटे में आता हूँ।”

Call खत्म करके मैं lift की तरफ़ बढ़ा ही था कि जेब में रखा phone एक बार फिर बज उठा। मैंने चलते-चलते screen की तरफ़ देखा… और मेरे कदम वहीं रुक गए। Screen पर सिर्फ़ दो शब्द लिखे थे—Ananya Calling…

कुछ सेकंड तक मैं साँस लेना ही भूल गया। तीन महीने… पूरे तीन महीने बाद उसका phone आया था। कुछ सेकंड तक मैं बस screen को देखता रह गया। ऐसा नहीं था कि मैंने कभी उसके phone आने की उम्मीद छोड़ दी थी। उम्मीद शायद आख़िरी चीज़ होती है जो किसी इंसान का साथ छोड़ती है। लेकिन मैंने यह ज़रूर मान लिया था कि अगर कभी हमारी बात होगी भी, तो शायद बहुत समय बाद होगी। इतनी अचानक… और इस तरह… इसकी कल्पना भी नहीं की थी।

Phone लगातार बज रहा था। मैंने जैसे ही call receive की, दूसरी तरफ़ कुछ सुनाई नहीं दिया। सिर्फ़ हल्की-हल्की साँसों की आवाज़ थी, जैसे कोई बहुत देर तक रोने के बाद खुद को संभालने की कोशिश कर रहा हो। “Hello…” मेरी आवाज़ अनजाने में धीमी हो गई।

कुछ पल बीत गए। कोई जवाब नहीं आया। “Hello… Ananya?” इस बार मेरी आवाज़ में बेचैनी साफ़ थी। दूसरी तरफ़ जैसे किसी ने कुछ कहने की कोशिश की, लेकिन शब्द गले में ही अटक गए। बस एक दबी हुई सिसकी सुनाई दी। मेरा दिल एकदम से बैठ गया। तीन महीने की ख़ामोशी के बाद अगर किसी इंसान की पहली आवाज़ रोने की हो, तो समझ आ जाता है कि बात सिर्फ़ नाराज़गी की नहीं है। “Ananya… मेरी बात सुन पा रही हो?”

कुछ देर बाद बहुत मुश्किल से उसकी आवाज़ सुनाई दी। “Su… Sugandh…” बस मेरा नाम। उसने इतना ही कहा, लेकिन उसकी आवाज़ में ऐसी थकान थी जैसे कई दिनों से उसने ठीक से किसी से बात ही न की हो। “क्या हुआ?” मैंने लगभग फुसफुसाते हुए पूछा।

दूसरी तरफ़ फिर वही ख़ामोशी। इतनी लंबी कि मुझे लगा शायद call कट गया है। मैं phone कान से हटाकर देखने ही वाला था कि उसने बहुत धीरे से कहा—”I’m… sorry…”

मैं कुछ समझ नहीं पाया। “Sorry? किस बात के लिए?” कोई जवाब नहीं आया। मैंने फिर पूछा, “Ananya… तुम ठीक हो?”

इस बार उसकी साँसें और तेज़ सुनाई देने लगीं। ऐसा लग रहा था जैसे वो खुद को संभालने की पूरी कोशिश कर रही हो, लेकिन हर कोशिश अगले ही पल टूट जा रही हो। “मुझसे बात करो…” मैंने धीरे से कहा। “क्या हुआ है?” काफ़ी देर बाद उसने टूटी हुई आवाज़ में सिर्फ़ इतना कहा, “क्या… क्या तुम… आ सकते हो?”

मेरे भीतर जैसे किसी ने एक साथ सौ सवाल छोड़ दिए। “अभी?” उसने हाँ नहीं कहा। ना भी नहीं कहा। बस उसकी चुप्पी ने मुझे जवाब दे दिया। मैंने बिना एक पल सोचे कहा, “मैं निकल रहा हूँ। दस मिनट।”

उसने कुछ नहीं कहा। लेकिन call काटने से ठीक पहले मुझे लगा जैसे उसने बहुत धीरे से साँस छोड़ी हो। जैसे किसी ने उसके कंधों पर रखा हुआ भारी बोझ कुछ पल के लिए अपने ऊपर ले लिया हो।

Phone रखते ही मैंने car की चाबी उठाई और लगभग दौड़ते हुए नीचे उतर गया। दिमाग़ लगातार यही सोच रहा था कि आखिर ऐसा क्या हुआ होगा। तीन महीने पहले जो लड़की अपने आँसू किसी को दिखाना पसंद नहीं करती थी, वो आज आधी रात मुझे phone करके सिर्फ़ इतना कह पा रही थी कि “आ सकते हो?”

रास्ता ज़्यादा दूर नहीं था, लेकिन उस रात हर मोड़ उम्मीद से लंबा लग रहा था। Signal पर गाड़ी रुकती तो बेचैनी बढ़ जाती। मैंने कई बार घड़ी देखी। फिर खुद पर ही झुंझलाया। समय देखने से गाड़ी तेज़ नहीं चलने वाली थी।

लगभग पंद्रह मिनट बाद मैं उसके apartment के नीचे खड़ा था। ऊपर उसकी balcony में हल्की-सी रोशनी जल रही थी। वही balcony जहाँ कभी शाम की coffee पीते हुए उसने हँसकर कहा था कि उसे बारिश देखना किसी therapy से कम नहीं लगता। आज वही रोशनी जाने क्यों बहुत अकेली लग रही थी।

मैं lift की तरफ़ बढ़ा, फिर बिना सोचे सीढ़ियों की ओर मुड़ गया। बेचैनी में इंसान हमेशा छोटा रास्ता चुनता है, चाहे उससे साँस ही क्यों न फूल जाए। उसके दरवाज़े के सामने पहुँचकर पहली बार मेरे कदम रुक गए। अगर वो सचमुच ठीक नहीं हुई तो? अगर मैं देर से पहुँचा? अगर… मैंने खुद को बीच में ही रोक दिया। हर सवाल का जवाब उस दरवाज़े के पीछे था। मैंने धीरे से bell दबा दी।

अंदर कुछ हलचल हुई। हल्के क़दमों की आहट धीरे-धीरे दरवाज़े के करीब आने लगी। एक पल के लिए मेरा दिल इतनी तेज़ धड़कने लगा कि मुझे लगा उसकी आवाज़ बाहर तक सुनाई दे रही होगी। Click… Lock खुलने की आवाज़ आई। दरवाज़ा धीरे-धीरे खुला।

और सामने… Ananya खड़ी थी।

दरवाज़ा पूरी तरह खुलने में शायद दो ही सेकंड लगे होंगे, लेकिन मुझे लगा जैसे उन दो सेकंडों ने पूरे तीन महीने अपने भीतर समेट रखे हों। अनन्या सामने खड़ी थी। पहली नज़र में मुझे यही लगा कि इन तीन महीनों ने उसके साथ वैसा व्यवहार नहीं किया था जैसा उन्होंने मेरे साथ किया था। उसके बाल लापरवाही से पीछे बँधे हुए थे, जैसे कई दिनों से उसने आईने के सामने खड़े होकर खुद को देखने की कोशिश ही न की हो। आँखों के नीचे हल्के गहरे हो गए थे। चेहरा पहले से और दुबला लग रहा था। लेकिन जिसने मुझे सबसे ज़्यादा बेचैन किया, वो उसकी आँखें थीं। उनमें आँसू नहीं थे… बल्कि आँसुओं के सूख जाने के बाद बच जाने वाली थकान थी।

हम दोनों कुछ नहीं बोले। शायद इसलिए नहीं कि कहने के लिए कुछ नहीं था, बल्कि इसलिए कि इतने दिनों की ख़ामोशी के बाद कोई भी पहला वाक्य छोटा पड़ जाता। वो बस मुझे देखती रही। मैं उसे। ऐसा लग रहा था जैसे हम दोनों एक-दूसरे के चेहरे पर इन तीन महीनों की कहानी पढ़ने की कोशिश कर रहे हों।

“कैसी हो?” आख़िरकार मैंने धीरे से पूछा।

उसने जवाब नहीं दिया। बस होंठों पर एक बहुत हल्की-सी मुस्कान लाने की कोशिश की, जो अगले ही पल टूट गई। उसकी पलकों ने एक बार ज़ोर से आँखें बंद कीं, जैसे वो अपने भीतर उमड़ रहे किसी तूफ़ान को रोकना चाहती हो। लेकिन कुछ भावनाएँ सिर्फ़ चाहने से नहीं रुकतीं। उसकी आँखों से पहला आँसू चुपचाप नीचे गिरा। मैंने अनायास ही एक क़दम उसकी तरफ़ बढ़ाया। “Ananya…” बस इतना ही कहा था मैंने।

अगले ही पल उसने दोनों हाथों से मेरा हाथ पकड़ लिया। उसकी उँगलियाँ बर्फ़ की तरह ठंडी थीं। उसने उन्हें इतनी मज़बूती से पकड़ा हुआ था जैसे डर हो कि अगर छोड़ दिया, तो मैं फिर कहीं चला जाऊँगा। उसने सिर झुका लिया। मैं उसके चेहरे को देख नहीं पा रहा था, लेकिन उसके काँपते हुए कंधे बता रहे थे कि वो खुद को रोकने की आख़िरी कोशिश कर रही है।

“मुझे लगा…” उसने बहुत धीरे से कहना शुरू किया। “…तुम नहीं आओगे।”

उस एक वाक्य ने जाने क्यों मेरे भीतर महीनों से जमा सारी नाराज़गी, सारे सवाल और सारी शिकायतें एक साथ ख़ामोश कर दीं। मैंने बिना कुछ कहे उसके दोनों हाथ अपनी हथेलियों में ले लिए। “अगर तुम बुलाओगी…” मैंने उसकी तरफ़ देखते हुए कहा, “…तो मैं हमेशा आऊँगा।”

मेरी बात सुनते ही उसने पहली बार मेरी आँखों में देखा। उसकी पलकों पर फिर आँसू भर आए। “Sorry…” उसने फिर वही शब्द दोहराया।

इस बार मैंने हल्के से सिर हिला दिया। “किस बात की?”

उसने जवाब देने की कोशिश की, लेकिन शब्द नहीं निकले। उसकी साँसें फिर तेज़ होने लगीं। मैं समझ गया कि वो अभी भी अपने भीतर चल रही किसी लड़ाई से बाहर नहीं आई है। मैंने धीरे से उसके सिर पर हाथ रखा। “कुछ मत कहो।”

वो कुछ पल तक बिल्कुल स्थिर खड़ी रही। फिर जैसे उसके भीतर बची हुई सारी ताक़त एक साथ जवाब दे गई। उसने एक छोटा-सा क़दम आगे बढ़ाया… और अपना माथा मेरे कंधे पर टिकाकर आँखें बंद कर लीं।

मैंने धीरे से अपनी बाँहें उसके चारों ओर फैला दीं। उसने मुझे कसकर पकड़ लिया। इतना कसकर कि जैसे इन तीन महीनों की सारी दूरी उसी एक पल में ख़त्म कर देना चाहती हो। मैंने भी उसे अपने और क़रीब खींच लिया। उसके बालों में वही हल्की-सी खुशबू अब भी थी जिसे मैं शायद कभी भूल ही नहीं पाया था। उसने कुछ नहीं कहा। मैं भी चुप था। उस वक़्त शब्द सचमुच बेकार थे। कभी-कभी किसी इंसान का बस यूँ चुपचाप गले लग जाना, पूरी बातचीत से ज़्यादा सुकून दे जाता है।

कितनी देर हम वैसे ही खड़े रहे, मुझे याद नहीं। बस इतना याद है कि पहली बार तीन महीनों बाद मुझे लगा… शायद मैं घर लौट आया हूँ।


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Author: Onesha

She is the funny one! Has flair for drama, loves to write when happy! You might hate her first story, but maybe you’ll like the next. She is the master of words, but believes actions speak louder than words. 1sha Rastogi, founder of 1shablog.com.

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