काफ़ी देर तक हम दोनों वैसे ही खड़े रहे। उसके रोने की आवाज़ अब सिसकियों में बदल चुकी थी। मैंने उसे अलग करने की कोई कोशिश नहीं की। कुछ लोग बोलकर हल्के हो जाते हैं, कुछ रोकर। और कुछ ऐसे भी होते हैं जिन्हें सिर्फ़ यह यक़ीन चाहिए होता है कि जब वे टूटें, तब कोई उन्हें थामने वाला हो।
धीरे-धीरे उसकी पकड़ ढीली पड़ने लगी। उसने जैसे ही खुद को मुझसे अलग किया, सबसे पहले नज़रें झुका लीं। शायद उसे एहसास हो गया था कि वो कब से रो रही थी। उसने जल्दी से अपनी आँखें पोंछीं और बिना मेरी तरफ़ देखे हल्की-सी मुस्कुराने की कोशिश की।
“Sorry…” उसने एक बार फिर वही शब्द कहा।
इस बार मैं मुस्कुरा दिया।
“तुम्हें पता है, पिछले पाँच मिनट में तुम चौथी बार मुझसे sorry बोल चुकी हो।”
उसने हल्के से मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में पहली बार आँसुओं के बीच एक छोटी-सी मुस्कान दिखाई दी।
“आदत है…” उसने बहुत धीमे से कहा।
“बदल डालो।” मैंने सहज होकर जवाब दिया। “हर बात के लिए माफ़ी माँगने वाले लोग अक्सर अपनी गलती से ज़्यादा दूसरों का बोझ उठाते रहते हैं।”
वो कुछ पल तक मुझे देखती रही। जैसे समझ नहीं पा रही हो कि मेरे इस जवाब पर मुस्कुराए या फिर से रो पड़े। मैंने कमरे के भीतर नज़र दौड़ाई। Coffee table पर कई किताबें खुली हुई थीं। Laptop की screen अभी भी जल रही थी। उसके बगल में एक diary खुली पड़ी थी, जिसके ऊपर pen ऐसे रखा था जैसे लिखते-लिखते अचानक किसी ने उसे छोड़ दिया हो। फ़र्श पर कुछ मुड़े हुए और कुछ फटे हुए काग़ज़ बिखरे पड़े थे। उनमें से एक पर मेरी नज़र अनायास चली गई। आधा वाक्य दिखाई दे रहा था—”कभी-कभी सबसे ज़्यादा दर्द उस इंसान को खोने का नहीं होता… जिससे आपने कभी पाया ही नहीं…” मैंने आगे पढ़ने की कोशिश नहीं की। हर लिखी हुई चीज़ पढ़ लेना, किसी को समझ लेना नहीं होता।
“अंदर आओगे नहीं?” उसकी आवाज़ ने मेरा ध्यान वापस उसकी तरफ़ खींच लिया।
मैंने हल्के से सिर हिलाया और उसके पीछे-पीछे कमरे के भीतर आ गया।
पूरे कमरे में एक ऐसी ख़ामोशी पसरी हुई थी, जो किसी एक दिन में पैदा नहीं होती। वो धीरे-धीरे कई रातों की नींद, कई अधूरी बातों और कई दबे हुए आँसुओं से बनती है।
वो kitchen की तरफ़ बढ़ी।
“चाय बनाऊँ?”
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसके चलने के अंदाज़ में भी थकान उतर आई थी।
“अगर तुम्हें पीनी है तो बना लो।” मैंने कुर्सी खींचते हुए कहा। “मुझे तुम्हारे साथ बैठना ज़्यादा ज़रूरी लग रहा है।”
वो कुछ पल के लिए रुक गई। फिर बिना कुछ कहे वापस आकर सामने वाले sofa पर बैठ गई। हमारे बीच center table थी, लेकिन उस रात वो मेज़ भी किसी दूरी जैसी लग रही थी।
कई मिनट बीत गए। हम दोनों में से कोई कुछ नहीं बोला। अजीब बात थी। तीन महीने तक एक-दूसरे से बात नहीं हुई थी, और अब जब हम आमने-सामने बैठे थे, तो शब्द फिर भी कम पड़ रहे थे। आख़िर मैंने ही चुप्पी तोड़ी।
“अब बताओ…” मैंने धीरे से पूछा, “क्या हुआ है?”
Ananya ने अपनी उँगलियाँ आपस में फँसा लीं। उसकी नज़रें अब भी नीचे थीं।
“मैं…” वो रुकी। “…मैं बहुत दिनों से तुम्हें phone करना चाह रही थी।”
मैं चुपचाप सुनता रहा।
“हर दिन सोचती थी…” उसने धीमे-धीमे कहना शुरू किया, “…आज करूँगी। फिर डर जाती थी।”
“किस बात से?”
उसने पहली बार मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में डर नहीं था… डर से भी गहरी कोई चीज़ थी।
“इस बात से…” वो बोली, “…कि अगर तुमने phone नहीं उठाया तो?”
उसका सवाल सुनकर मेरे भीतर जैसे कुछ टूटकर बिखर गया। मैं हल्का-सा हँसा।
“और मैं पिछले तीन महीने यही सोचता रहा कि अगर मैंने phone किया और तुमने नहीं उठाया तो?”
कुछ पल तक वो मुझे देखती रही। फिर जाने कितने दिनों बाद… उसके चेहरे पर पहली बार एक सच्ची मुस्कान आई। बहुत छोटी-सी। लेकिन इतनी कि कमरे की ख़ामोशी थोड़ी हल्की हो गई।
उसकी मुस्कान उतनी ही देर ठहरी जितनी देर बारिश के बाद किसी पत्ते पर पानी की आख़िरी बूँद ठहरती है। अगले ही पल उसने नज़रें झुका लीं। कमरे में फिर वही ख़ामोशी लौट आई, लेकिन अब वह पहले जैसी बोझिल नहीं थी। उसमें एक अजीब-सी सहजता थी। जैसे दो लोग, जो बहुत दिनों बाद मिले हों, अब धीरे-धीरे उस दूरी को पहचानने और मिटाने की कोशिश कर रहे हों।
मैं उसे देख रहा था। उसके चेहरे पर थकान साफ़ दिखाई दे रही थी। ऐसा नहीं लग रहा था कि वह सिर्फ़ रोई थी। ऐसा लग रहा था जैसे कई दिनों से उसने ठीक से सोया भी नहीं था। उसकी उँगलियाँ अब भी एक-दूसरे में उलझी हुई थीं और वह बार-बार बिना वजह अपने अंगूठे के नाखून को सहला रही थी। मैं उसे काफ़ी समय से जानता था। वह ऐसा तभी करती थी जब उसके भीतर कुछ बहुत गहराई से चल रहा होता था।
“क्या बात है, Ananya ?” मैंने इस बार थोड़ा और नरम स्वर में पूछा। “तुम मुझे यहाँ बुलाना चाहती थीं… या सिर्फ़ मेरी आवाज़ सुनना चाहती थीं?”
उसने तुरंत जवाब नहीं दिया। उसने सामने रखे glass को दोनों हाथों से पकड़ लिया, लेकिन पानी पीने की बजाय बस उसे देखती रही। फिर बहुत धीमी आवाज़ में बोली,
“मुझे नहीं पता था कि तुम्हें phone करना सही होगा या नहीं।”
मैंने बिना टोके उसे बोलने दिया।
“कई बार number dial किया… फिर काट दिया। कभी लगा तुम नाराज़ होगे। कभी लगा शायद तुमने मुझे भूलने की कोशिश शुरू कर दी होगी। फिर सोचा… अगर सच में भूल गए हो तो? मैं फिर से तुम्हारी ज़िंदगी में आकर तुम्हें क्यों परेशान करूँ?”
उसकी हर बात के साथ मेरे भीतर एक अजीब-सी टीस उठ रही थी। कितनी अजीब बात थी कि पिछले तीन महीनों में मैं भी लगभग यही सब सोचता रहा था। हम दोनों अपने-अपने डर के कैदी बने बैठे थे। किसी ने किसी को ठुकराया नहीं था, फिर भी दोनों ने मान लिया था कि शायद दूसरा अब उन्हें नहीं चाहता। कभी-कभी रिश्ते टूटते नहीं, बस दो लोगों की चुप्पियाँ उनके बीच इतनी ऊँची दीवार बना देती हैं कि दोनों को लगता है सामने वाला अब दिखाई ही नहीं देता।
मैंने कुर्सी से थोड़ा आगे झुकते हुए कहा,
“अगर मैं सच बताऊँ, तो मैंने भी कई बार तुम्हें phone करने का सोचा था।”
उसने धीरे-से मेरी तरफ़ देखा।
“फिर किया क्यों नहीं?”
मैं हल्का-सा मुस्कुरा दिया। “शायद उसी वजह से, जिस वजह से तुमने नहीं किया।”
कुछ पल के लिए उसकी आँखें मेरी आँखों में ठहर गईं। उन आँखों में मुझे पहली बार अपने जैसा डर दिखाई दिया। मुझे हमेशा लगता था कि मैं ही उलझा हुआ हूँ, मैं ही समझ नहीं पा रहा कि क्या महसूस कर रहा हूँ। लेकिन उस रात पहली बार एहसास हुआ कि उलझन सिर्फ़ मेरी नहीं थी। हम दोनों एक ही रास्ते पर खड़े थे, बस दोनों ने एक-दूसरे की तरफ़ चलना बंद कर दिया था।
Ananya ने गहरी साँस ली और धीरे से sofa की backrest पर सिर टिका दिया। “पिछले कुछ हफ़्तों से सब कुछ बहुत अजीब हो गया है, Sugandh Office छोड़ने के बाद लगा था थोड़ा समय मिलेगा, खुद को समझ पाऊँगी। लेकिन जितना अकेली होती गई, उतना ही महसूस हुआ कि मैं खुद से भाग रही हूँ। दिन भर किताबें खोलकर बैठती हूँ, कुछ लिखने की कोशिश करती हूँ, फिर सब फाड़ देती हूँ। रात को नींद नहीं आती। सुबह उठती हूँ तो लगता है जैसे पूरी रात किसी ने सिर के अंदर शोर मचाया हो।”
उसकी बात सुनते हुए मेरी नज़र फिर उन फटे हुए पन्नों पर चली गई। अब समझ आ रहा था कि वे सिर्फ़ काग़ज़ नहीं थे। वे शायद उन बातों के टुकड़े थे जिन्हें वह लिख तो देती थी, लेकिन स्वीकार नहीं कर पाती थी।
“और आज?” मैंने पूछा। “आज ऐसा क्या हुआ कि तुमने phone कर दिया?”
वह कुछ देर तक बिल्कुल स्थिर बैठी रही। उसने होंठ भींचे, फिर बहुत धीरे से मुस्कुराई। वह मुस्कान इस बार अपने ऊपर हँसने जैसी थी।
उसने एक पल के लिए आँखें बंद कर लीं।
“पहली बार मुझे सच में डर लगा।”
“डर?”
“हाँ।” उसने मेरी तरफ़ देखते हुए कहा, “मुझे लगा अगर आज भी मैंने तुम्हें phone नहीं किया… तो शायद ज़िंदगी भर नहीं कर पाऊँगी।”
उसके शब्द कमरे में देर तक गूँजते रहे। मैं उसे देखता रहा, लेकिन उस पल मेरे पास कोई जवाब नहीं था। कुछ बातें ऐसी होती हैं जिनका उत्तर शब्दों से नहीं दिया जा सकता। वे सिर्फ़ महसूस की जा सकती हैं। मैंने धीरे से अपनी कुर्सी उसके थोड़ा और क़रीब खिसका ली। हमारे बीच अब सिर्फ़ कुछ इंच का फ़ासला बचा था।
“मैं आज रात चला जाऊँगा,” मैंने शांत स्वर में कहा, “लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि मैं हमेशा के लिए जा रहा हूँ।”
वह हल्का-सा मुस्कुराई, लेकिन उसकी आँखें अब भी भीगी हुई थीं।
“मुझे पता है,” उसने कहा, “डर तुम्हारे जाने का नहीं था, सुगंध…” वह कुछ क्षण रुकी। उसकी आवाज़ और धीमी हो गई। “…डर इस बात का था कि कहीं हमारी कहानी यहीं ख़त्म न हो जाए, बिना कभी शुरू हुए।”
उस एक वाक्य के बाद कमरे में फिर से सन्नाटा छा गया। बाहर कहीं दूर बारिश शुरू हो चुकी थी। खिड़की के शीशों पर गिरती बूँदों की आवाज़ कमरे की ख़ामोशी में घुल रही थी। मैंने पहली बार महसूस किया कि कुछ रिश्ते इज़हार से नहीं, बल्कि उस डर से पहचाने जाते हैं जिसमें दोनों लोग एक-दूसरे को खो देने की कल्पना से ही टूटने लगते हैं।
मैंने उसकी बात का जवाब तुरंत नहीं दिया। शायद इसलिए नहीं कि मेरे पास कुछ कहने के लिए नहीं था, बल्कि इसलिए कि उसकी कही हुई बात मेरे भीतर कहीं बहुत गहराई तक उतर गई थी। “हमारी कहानी यहीं ख़त्म न हो जाए, बिना कभी शुरू हुए…” यह सिर्फ़ एक वाक्य नहीं था। यह उन तीन महीनों की ख़ामोशी का सार था, जिसे हम दोनों अपने-अपने तरीक़े से ढोते रहे थे। मैंने उसकी तरफ़ देखा। वह अब भी मेरी ओर नहीं देख रही थी। उसकी नज़रें सामने रखी diary पर टिकी थीं, जैसे उसके सारे जवाब उसी के पन्नों में बंद हों।
कमरे में रखी घड़ी की टिक-टिक पहली बार सुनाई दे रही थी। बाहर बारिश अब थोड़ी तेज़ हो चुकी थी। खिड़की के शीशों पर गिरती बूँदें कमरे के भीतर एक अजीब-सी लय बना रही थीं। कभी-कभी मौसम भी इंसान के भीतर चल रही उथल-पुथल का हिस्सा बन जाता है। उस रात बारिश सिर्फ़ बाहर नहीं हो रही थी। हम दोनों अपने-अपने भीतर भीग रहे थे।
“एक बात पूछूँ?” मैंने धीरे से कहा।
उसने सिर उठाया।
“पूछो।”
“उस रात… जब तुम आख़िरी बार office आई थीं… तुम मुझसे कुछ कहना चाहती थीं ना?”
उसने कुछ क्षण मेरी आँखों में देखा। फिर बहुत हल्के से मुस्कुराई। वह मुस्कान किसी स्वीकारोक्ति जैसी थी।
“हाँ।”
“क्या?”
उसने लंबी साँस ली और sofa से टिककर बैठ गई। ऐसा लगा जैसे वह अपने भीतर की किसी बहुत पुरानी गाँठ तक पहुँचने की कोशिश कर रही हो।
“याद है…” उसने धीमे स्वर में कहा, “उस दिन cafeteria में तुमने मुझसे पूछा था कि अगर कभी मैं अचानक कहीं चली जाऊँ, तो तुम्हें मेरी सबसे ज़्यादा कौन-ची बात याद आएगी?”
मैंने बिना सोचे सिर हिला दिया। वह बात मुझे सचमुच याद थी। उस दिन मैंने हँसते हुए जवाब दिया था कि उसकी coffee बनाने की आदत याद आएगी। उसने उस जवाब पर नाराज़ होने का नाटक किया था, लेकिन उसकी आँखों में तब भी एक अधूरा सवाल रह गया था। उस समय मुझे लगा था कि वह बस मज़ाक कर रही है। आज समझ आ रहा था कि शायद वह मज़ाक नहीं था।
“उस दिन…” उसने कहना जारी रखा, “मैं तुम्हारा जवाब सुनना नहीं चाहती थी। मैं सिर्फ़ यह जानना चाहती थी कि अगर मैं तुम्हारी ज़िंदगी से चली जाऊँ… तो तुम्हें कोई फ़र्क़ पड़ेगा भी या नहीं।”
मैंने अनायास ही अपनी नज़रें झुका लीं। कितनी छोटी-सी बात थी। और मैं उसे समझ ही नहीं पाया।
“तुम्हें पता है,” वह धीमे से हँसी, “मैं उस दिन पूरे रास्ते खुद पर हँसती रही। मुझे लगा मैं कितनी बेवकूफ़ हूँ। जो बात सीधे पूछ सकती थी, उसके लिए भी इशारों का सहारा ले रही थी। फिर मैंने खुद को समझा लिया कि शायद मैं ही ज़्यादा सोच रही हूँ।”
उसने diary की ओर हाथ बढ़ाया। कुछ पल तक उसकी उँगलियाँ उसके कवर पर घूमती रहीं। फिर उसने उसे उठाकर अपनी गोद में रख लिया। “इन तीन महीनों में मैंने बहुत कुछ लिखने की कोशिश की।” उसने diary मेरी तरफ़ बढ़ाई। “लेकिन शायद कभी तुम्हें देने की हिम्मत नहीं जुटा पाती।”
मैंने diary हाथ में ली, लेकिन खोली नहीं।
“पढ़ोगे नहीं?” उसने पूछा।
मैंने उसकी तरफ़ देखा और धीरे से सिर हिलाया।
“अभी नहीं।”
वह थोड़ा चौंकी।
“क्यों?”
“क्योंकि अगर इसमें तुम्हारे मन की बातें हैं, तो मैं उन्हें तुम्हारी ज़ुबान से सुनना चाहूँगा।”
उसकी आँखें अचानक भर आईं। शायद उसे मेरे इस जवाब की उम्मीद नहीं थी। उसने धीरे से diary वापस अपनी गोद में रख ली और दोनों हाथों से उसे ऐसे थाम लिया जैसे कोई अपनी सबसे कीमती चीज़ संभालकर रखता है।
“तुम हमेशा इतनी मुश्किल बातें इतनी आसानी से कैसे कह देते हो?” उसने मुस्कुराने की कोशिश करते हुए पूछा।
मैं भी मुस्कुरा दिया।
“आसान तो मुझे भी नहीं लगता। बस… देर से समझ आता है कि कहना ज़रूरी था।”
हम दोनों कुछ देर तक फिर चुप बैठे रहे। इस बार चुप्पी असहज नहीं थी। उसमें एक भरोसा था। ऐसा भरोसा, जो धीरे-धीरे लौटता है, बिना किसी घोषणा के। तभी मेरी नज़र दीवार पर लगी घड़ी पर गई। रात काफ़ी हो चुकी थी। मेरी flight तक अब बहुत ज़्यादा समय नहीं बचा था। मैंने घड़ी से नज़र हटाकर उसकी तरफ़ देखा। वह भी शायद वही सोच रही थी, क्योंकि उसने बिना कुछ कहे हल्की-सी मुस्कान के साथ पूछा,
“कितने बजे निकलना है?”
“लगभग एक घंटे में।”
उसने बस “हूँ…” कहा और खिड़की की तरफ़ देखने लगी। उस एक छोटे-से उत्तर में जितनी उदासी थी, उतनी शायद पूरे कमरे में नहीं थी। मुझे पहली बार महसूस हुआ कि समय कभी-कभी घड़ी की सुइयों से नहीं चलता। वह उन लोगों की आँखों में दिखाई देता है, जो जानते हैं कि सामने बैठा इंसान कुछ ही देर में उनसे बहुत दूर चला जाएगा।
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