Part 23

मैंने दीवार पर लगी घड़ी की ओर देखा, फिर उसकी तरफ़। Ananya अब भी diary को दोनों हाथों से पकड़े बैठी थी। उसकी उँगलियाँ उसके कवर पर बिना किसी क्रम के घूम रही थीं—कभी किनारे तक जातीं, कभी बीच में रुक जातीं—जैसे उसके भीतर जो कुछ था, वह शब्द बनकर बाहर आने के बजाय उन्हीं उँगलियों में अटक गया हो।

वक़्त हो गया था।

यह बात हम दोनों जानते थे, मगर शायद हममें से कोई भी उसे ज़ुबान नहीं देना चाहता था। जब तक हम चुप थे, मेरे जाने का क्षण थोड़ी दूर खड़ा दिखाई देता था। जैसे ही हममें से कोई उठता, वह हमारे ठीक बीच आ जाता।

बाहर बारिश अब पहले से हल्की हो चुकी थी। खिड़की के शीशे पर ठहरी बूँदें धीरे-धीरे नीचे सरक रही थीं। कमरे में घड़ी की टिक-टिक के अलावा कोई आवाज़ नहीं थी। मैंने एक बार फिर समय देखा और इस बार अपने घुटनों पर हाथ रखकर उठ खड़ा हुआ।

Ananya ने सिर उठाया।

उसके चेहरे पर वही गहरी उदासी थी जिसे वह मुस्कान के पीछे छिपाने की कोशिश कर रही थी। तीन महीनों बाद मैं उसे अपने सामने देख रहा था, फिर भी लग रहा था जैसे हमारे बीच अभी भी कोई बहुत लम्बा फ़ासला बचा हुआ है—इतना लम्बा कि एक रात, एक बातचीत और कुछ स्वीकारोक्तियाँ मिलकर भी उसे पूरा तय नहीं कर सकती थीं।

“अच्छा, Ananya…” मैंने कहा, फिर जाने क्यों आगे के शब्द गले में अटक गए। “जल्दी मिलते हैं।”

यह छोटा-सा वाक्य बोलते हुए जितनी झिझक हुई, उतनी शायद किसी मुश्किल बात को कहते हुए भी नहीं हुई थी। मुझे नहीं पता था कि यह ‘जल्दी’ कब आएगा। चार महीने बाद, चार साल बाद या फिर ज़िंदगी के किसी ऐसे मोड़ पर, जहाँ पहुँचते-पहुँचते हम दोनों इतने बदल चुके होंगे कि आज की रात किसी पुराने सपने जैसी लगेगी।

Ananya ने होंठों पर हल्की-सी मुस्कान लाने की कोशिश की।

“जल्दी,” उसने दोहराया।

उसकी आवाज़ में यक़ीन कम और मेरे शब्दों को सच मान लेने की इच्छा ज़्यादा थी।

मैं एक क़दम उसकी ओर बढ़ा। वह भी diary लेकर खड़ी हो गई। कुछ पल तक हम आमने-सामने खड़े रहे। इतने क़रीब कि मैं उसकी आँखों के नीचे की थकान देख सकता था, मगर इतने दूर कि हममें से कोई नहीं जानता था अब क्या करना चाहिए। हाथ मिलाना इस रात के लिए बहुत Formal था, और बिना कुछ किए चले जाना बहुत बेरहम।

मैंने कुछ सोचने से पहले ही उसे अपनी बाँहों में भर लिया।

इस बार वह पहले की तरह टूटकर नहीं रोई। उसने बस diary को अपने और मेरे बीच से हटाकर एक हाथ में पकड़ लिया और दूसरे हाथ से मुझे कसकर थाम लिया। अगले ही पल उसकी दोनों बाँहें मेरे चारों ओर थीं। मेरे हाथ उसकी पीठ पर ठहर गए और उसका चेहरा मेरे कंधे के पास छिप गया।

उस Hug में कुछ था—कुछ ऐसा जो हम दोनों के भीतर बहुत समय से था, मगर अब तक सतह पर नहीं आया था। शायद हम दोनों उसे महसूस कर रहे थे और दोनों ही उसे नाम देने से डर रहे थे। क्योंकि अगर उस पल हमने अपने भीतर छिपे सब कुछ को बाहर आने दिया होता, तो शायद न वह संभल पाती, न मैं।

उसकी साँस मेरे कंधे से टकरा रही थी। मैंने आँखें बंद कर लीं। मन हुआ उससे कह दूँ कि मत डरना, मैं लौट आऊँगा। मन हुआ यह भी कह दूँ कि मेरा इंतज़ार मत करना, क्योंकि मेरे पास उसे देने के लिए कोई तारीख़ नहीं थी, कोई वादा नहीं था, कोई clear future नहीं था। मेरे पास बस एक एहसास था, और वह भी इतना उलझा हुआ कि मैं ख़ुद उसे ठीक से समझ नहीं पा रहा था।

मैंने उसे थोड़ा और कसकर पकड़ लिया।

शायद उसने भी उसी moment अपनी पकड़ मज़बूत कर ली।

कुछ रिश्तों की सबसे सच्ची बातचीत शब्दों के बिना होती है। उस रात हमारे बीच जो कुछ कहा गया, उसे शायद हम दोनों कभी ठीक-ठीक दोहरा नहीं पाते। उसमें शिकायत भी थी, माफ़ी भी; मिलने की राहत भी थी और दोबारा बिछड़ने का डर भी। उसमें एक शुरुआत की सम्भावना थी, मगर उसके साथ चार साल लम्बा अनिश्चित इंतज़ार भी खड़ा था।

काफ़ी देर बाद उसने धीरे-धीरे अपनी बाँहें ढीली कीं। मैं उससे अलग हुआ तो उसकी नज़रें नीचे थीं। उसने diary फिर से अपने सीने के पास कर ली, जैसे मेरे जाने के बाद वही उसे संभालने वाली हो।

मैं दरवाज़े तक पहुँचा और एक बार पलटकर देखा। वह उसी जगह खड़ी थी। आँखें भरी हुई थीं, लेकिन वह रो नहीं रही थी। मैंने दरवाज़ा खोला। बाहर corridor की ठंडी हवा भीतर आई।

मुझे पहली बार लगा कि कुछ वादे भविष्य के भरोसे नहीं किए जाते। वे उस इंसान की आँखों में दिखाई दे रहे डर को थोड़ा कम करने के लिए किए जाते हैं। उन्हें निभा पाना बाद की बात होती है; उस क्षण उनका कहा जाना ज़रूरी होता है।

मैं बाहर आ गया। दरवाज़ा धीरे से मेरे पीछे बंद हो गया।

कुछ second तक मैं वहीं खड़ा रहा। उस बन्द दरवाज़े के दूसरी तरफ़ Ananya थी और इस तरफ़ मैं—फिर से वही दूरी, बस इस बार उसके होने से दोनों अनजान नहीं थे। Lift का button दबाने के बाद भी मैं दरवाज़े की ओर देखता रहा। मन का एक हिस्सा चाहता था कि वह अचानक दरवाज़ा खोले, मेरा नाम पुकारे और कोई ऐसी बात कह दे जिससे मेरा जाना असम्भव हो जाए।

दरवाज़ा नहीं खुला।

Lift आ गई।

नीचे पहुँचकर मैंने देखा, Rukhsaar car में मेरा इंतज़ार कर रहा था। मेरे बैठते ही उसने कुछ कहा—शायद flight के समय के बारे में, शायद traffic के बारे में—लेकिन मैं सुन नहीं पाया। मेरा ध्यान ऊपर उस खिड़की पर था, जिसके पर्दे के पीछे मुझे Ananya की हल्की-सी परछाईं दिखाई दे रही थी।

Car आगे बढ़ गई।

Rukhsaar मेरे बगल में लगातार बोल रहा था। वह जानबूझकर माहौल हल्का रखने की कोशिश कर रहा था या उसे सच में अंदाज़ा नहीं था कि मेरे भीतर क्या चल रहा है, मैं नहीं जानता। मैं कभी-कभी “हूँ” कह देता, कभी सिर हिला देता, मगर मेरा मन अब भी उसी कमरे में था—उस sofa के पास, बारिश की आवाज़ में और Ananya की गोद में रखी उस diary पर।

तीन महीने।

इन तीन महीनों में मैंने ऐसी बेचैनी और उदासी नहीं झेली थी। मुझे नहीं पता था यह क्या था या क्यों था। मेरे पास अपने किसी सवाल का जवाब नहीं था। बस इतना जानता था कि मैं हर उस जगह से निकल जाना चाहता था जहाँ Ananya नहीं थी—उस office से, उस खाली घर से, कभी-कभी अपने भीतर से भी। मगर इंसान अपने भीतर से निकलकर जाए भी तो कहाँ?

उसके office छोड़ने के बाद मेरी नज़र हर सुबह उसकी खाली कुर्सी पर जाकर रुक जाती थी। मैं जानता था कि वह वहाँ नहीं होगी, फिर भी मन जैसे रोज़ अपनी हार की पुष्टि करने जाता था। उसी bay में वही desks थीं, वही monitors, वही लोग; बस उसके न होने से पूरा दृश्य बदला हुआ लगता था। कई बार सच में ऐसा भ्रम होता कि वह सामने खड़ी है और अगले ही क्षण एहसास होता कि वह किसी और की परछाईं थी।

मेरे मन में हज़ार सवाल थे। उसने मुझे block क्यों किया? उस रात ऐसा क्या हुआ था कि चीज़ें आगे बढ़ने से पहले ही ख़त्म हो गईं? क्या मैंने कुछ ऐसा कहा था जिसका अर्थ मेरी समझ से अलग था? क्या कोई बात उसकी आँखों में थी जिसे मैं पढ़ नहीं पाया? या वह सब सिर्फ़ मेरी कल्पना थी और उसके लिए उस रात का कोई अर्थ था ही नहीं?

मैं जितना सोचता, उतना उलझता जाता। आख़िरकार मैंने सोचना ही बन्द कर दिया—कम-से-कम बाहर से। काम बढ़ा लिया, meetings में बैठा रहा, बेवजह देर तक office में रुका। मेरा distraction शायद दूसरों को उतना दिखाई नहीं देता था, जितना मेरे भीतर का तूफ़ान मुझे सुनाई देता था।

एक दिन अचानक मैंने एक हफ़्ते की छुट्टी माँगी और घर चला गया।

धर्मशाला।

मेरे लिए घर हमेशा सिर्फ़ एक address नहीं रहा था। वह धौलाधार के पीछे से उतरती ठंडी हवा थी, शाम के समय देवदार के पेड़ों में फैलती ख़ुशबू थी और वह धीमापन था जिसमें साँस अपनी पूरी गहराई तक पहुँच पाती थी। शहर में रहते हुए हम साँस तो लेते हैं, मगर कई बार यह भूल जाते हैं कि हवा को महसूस करना भी कोई चीज़ होती है।

वहाँ पहुँचकर मैंने गाड़ी निकाली और बिना कोई तय रास्ता बनाए निकल गया। गाड़ागुशैणी गया, Bir गया, Bhagsunag गया। कुछ दिन तक सच में लगा कि मन थोड़ा सँभल रहा है। पहाड़ों में एक ईमानदारी होती है—वे आपके सवालों का जवाब देने का दावा नहीं करते, बस उनके साथ बैठने की जगह दे देते हैं।

Bir की एक पहाड़ी पर मैं बहुत देर तक अकेला बैठा रहा था। सामने आकाश में paragliders उड़ रहे थे। नीचे दूर तक हरियाली थी और हवा इतनी साफ़ कि लगता था शरीर के भीतर जमी सारी थकान खींचकर अपने साथ ले जाएगी। कहीं पास से कोई धुन आ रही थी—या शायद वह मेरे भीतर ही बहुत दिनों से बज रही थी। मुझे नहीं पता।

उसी पहाड़ी पर बैठे-बैठे मैंने पहली बार सोचा था कि अगर Ananya यहाँ होती तो कैसा होता।

मैं उसे अपनी दुनिया दिखाता। पहाड़ों की वह शान्ति, जिसे किसी motivational quote में नहीं समझाया जा सकता। सुबह का वह सन्नाटा जिसमें केवल पक्षियों की आवाज़ होती है। मंदिरों की घंटियाँ, Tibetan बाज़ारों की चहल-पहल, सड़क के किनारे मिलने वाली चाय और उन लोगों की धीमी ज़िंदगी, जिन्हें कहीं पहुँचने की लगातार जल्दी नहीं होती। मैं चाहता था कि वह city के शोर से कुछ दिन दूर रहे, खुलकर हवा महसूस करे और जाने कि जीवन सिर्फ़ deadlines, resignations, अधूरी नींद और unanswered messages से कहीं बड़ा है।

मैं उसे वहाँ देख सकता था—बालों को हवा से बचाने की नाकाम कोशिश करते हुए, किसी छोटी-सी दुकान पर रुककर बेवजह कोई चीज़ ख़रीदते हुए, हर जगह की कहानी पूछते हुए। शायद वह पहले पहाड़ों की तस्वीरें लेती और फिर कुछ देर बाद phone bag में रख देती। शायद कहती, “यहाँ time इतना slow क्यों चलता है?” और मैं उसे बताता कि time हमेशा इतना ही चलता है, शहर में बस हम बहुत तेज़ भागते हैं।

उस कल्पना ने मेरे चेहरे पर एक अजीब-सी मुस्कान ला दी थी। दर्द के बीच आई वह मुस्कान मुझे ख़ुद समझ नहीं आई। तभी लगा कि शायद मोहब्बत सिर्फ़ दुख नहीं देती। वह इंसान साथ हो या न हो, उसका होना—उसकी हँसी, उसकी यादें, उसका चेहरा—आपके साथ चलता रहता है। और कभी-कभी एक ऐसी प्यारी, अनकही ख़ुशी देता है जिसे केवल दिल महसूस कर सकता है। ऐसी ख़ुशी जिसे आप किसी से कह भी नहीं पाते, क्योंकि उसे बताते ही वह छोटी लगने लगती है।

शायद जिस दिल के लिए वह महसूस होती है, वह बिना बताए भी समझ जाता होगा। या शायद हर प्यार करने वाला यह जानता होगा कि सामने वाला इंसान आपको समझने या उस तरह प्रेम करने की क्षमता रखता हो या नहीं, आपके भीतर का प्रेम फिर भी आपको बदलता है।

हम अक्सर जिस इंसान से प्यार करते हैं, उसे अपने मन में idealize करने लगते हैं। फिर जब वह हमारी बनाई हुई छवि जैसा व्यवहार नहीं करता, तो हमें निराशा होती है। लेकिन कभी-कभी वही निराशा हमें अपने भीतर देखने के लिए मजबूर करती है। वह इंसान हमारा mirror बन जाता है। उसके साथ रहकर नहीं, कई बार उससे दूर होकर हम देखते हैं कि हम वास्तव में कौन हैं, किन घावों को वर्षों से अपने साथ लिए घूम रहे हैं और प्रेम के नाम पर सामने वाले से क्या-क्या माँग रहे हैं।

मैंने Himachal की लगभग हर उस जगह पर जाकर देख लिया था जहाँ पहले मुझे सुकून मिला करता था। मगर इस बार सुकून के बीच भी एक खाली जगह थी। उसकी याद मेरे साथ थी, वह नहीं थी।

Saba की याद भी कभी-कभी आती थी, लेकिन अब पहले जैसी नहीं। धीरे-धीरे वह पीछे जा रही थी। यह बात मुझे राहत देने के बजाय डराती थी। मुझे हमेशा लगता था कि Saba के बाद मेरे भीतर किसी और के लिए वह जगह बची ही नहीं थी। फिर Ananya आई और बिना कुछ माँगे उस हिस्से तक पहुँच गई जिसे मैंने वर्षों से बन्द कर रखा था।

मैं Ananya का इंतज़ार कर रहा था। किस बात का, यह मुझे भी नहीं पता था। शायद इस बात का कि वह अचानक मेरे सामने आ जाए और बस एक बार मुझे गले लगा ले। उसके बाद क्या होता, इसका जवाब मेरे पास तब भी नहीं था।

क्या वह मेरी feelings समझ पाती?

क्या मैं स्वयं उन्हें समझ पाया था?

वह प्यार था या नहीं, यह मैं तब नहीं जानता था। बस एक तड़प थी कि वह आकर देख ले कि मेरे भीतर क्या चल रहा है। कुछ बातें ऐसी थीं जो मैंने कभी किसी से नहीं कही थीं। शायद उससे भी नहीं कह पाता। मगर क्या वह उन बातों के पीछे छिपे Sugandh को देख पाती? क्या वह समझ पाती कि मैं जैसा हूँ, वैसा क्यों हूँ?

और अगर वह मुझे समझ भी लेती, तो क्या मैं उसे समझ पाता?

क्या मैं उसके व्यवहार के पीछे का डर देख पाता—सिर्फ़ यह नहीं कि उसने मुझे block किया, बल्कि यह भी कि उसे ऐसा करने की ज़रूरत क्यों महसूस हुई? क्या मैं उसे उस तरह प्रेम कर पाता जिसकी वह हक़दार थी? क्या मेरे भीतर अपने पुराने घावों और traumas से निकलकर उसके लिए जगह बनाने की क्षमता थी?

इन सवालों से पहाड़ भी मुझे नहीं बचा पाए।

अगले सप्ताह मैं office लौट आया और मन फिर से अशान्त हो गया। वही खाली कुर्सी, वही जगह, वही लम्बा इंतज़ार। ऐसा लगता था जैसे हमारे बीच कोई दूरी है जिसे मापा नहीं जा सकता। मैं कितना भी चल लूँ, वह कम नहीं होगी।

कहीं भीतर मेरा मन हर दिन प्रार्थना करता कि वह आ जाए। उसका phone आ जाए। वह किसी corridor में अचानक दिखाई दे जाए।

एक दिन मैंने phone निकालकर उसकी पुरानी photos देखीं। पहले मुझे हर तस्वीर में सिर्फ़ उसकी हँसी दिखाई देती थी। उस दिन पहली बार ध्यान गया कि हँसी तो थी, मगर उसके भीतर की मुस्कान कई तस्वीरों में ग़ायब थी। जैसे कोई गहरी उदासी बहुत पहले से उसके अन्दर घर बनाकर बैठी थी और हम सब उसके सामने दिखाई देने वाले हिस्से को ही Ananya समझते रहे।

मैंने एक सप्ताह और काम किया। अशान्ति कम होने के बजाय बढ़ती चली गई। दिन हो या रात, सोते हुए या जागते हुए, भीतर बस एक ही नाम चलता रहता—Ananya

अगले weekend मैंने Neem Karoli Baba जाने का मन बनाया। सुबह गाड़ी उठाई और निकल गया। वहाँ पहुँचते-पहुँचते बारिश शुरू हो गई थी। मंदिर के आसपास की हवा में मिट्टी और भीगे पेड़ों की मिली-जुली ख़ुशबू थी। मैं बहुत देर तक चुपचाप बैठा रहा। मुझे कभी समझ नहीं आया कि प्रार्थना में शब्द ज़रूरी होते हैं या नहीं। उस दिन मेरे पास वैसे भी सही शब्द नहीं थे।

मैं मन की शान्ति माँगने गया था।

लेकिन जाने कब मैंने उसे माँग लिया।

शायद मैंने नहीं—मेरे दिल ने।

वहाँ से लौटने के कुछ समय बाद Japan project की ख़बर आ गई। चार साल का onsite assignment। Promotion। Tokyo। Career में आगे बढ़ने का वैसा अवसर जिसके लिए लोग वर्षों तक प्रतीक्षा करते हैं। ख़बर मिलते ही मेरा ध्यान फिर काम में लगने लगा। Visa, documents, handover, packing—अचानक करने के लिए इतना कुछ था कि मन को भटकने की जगह कम मिल गई।

मुझे एक सप्ताह के भीतर निकलना था।

और उसी एक सप्ताह में अनन्या का phone आ गया।

मैंने इसकी उम्मीद नहीं की थी। लेकिन phone के बाद उसके घर पहुँचकर मैंने जो देखा, उसकी कल्पना तो बिल्कुल नहीं की थी। मुझे नहीं पता था कि मुझे block करके वह मुझसे ज़्यादा परेशान रही होगी। मैं केवल अपनी ख़ामोशी का भार जानता था; उसकी ख़ामोशी के पीछे कितनी टूटी हुई रातें थीं, यह उस शाम पहली बार दिखाई दिया।

Car airport की तरफ़ बढ़ रही थी। सड़क पर बारिश का पानी चमक रहा था और सामने से आती गाड़ियों की headlights शीशे पर फैलकर ग़ायब हो रही थीं। Rukhsaar अब भी कुछ बोल रहा था। मैंने उसकी ओर देखा, फिर बिना सुने ही सिर हिला दिया।

मेरे शरीर का एक हिस्सा उस car में बैठा था, मगर मेरा मन अब भी Ananya के घर के बाहर खड़ा था।

मैंने उसे गले लगाया था और फिर अपनी ज़िंदगी के अगले चार साल जीने के लिए निकल आया था—Ananya को अपने दिल में लिए हुए। हमारे बीच अब भी कोई रिश्ता तय नहीं हुआ था। न उसने मुझसे इंतज़ार करने को कहा था, न मैंने उससे कोई वादा माँगा था। फिर भी ऐसा लग रहा था जैसे मैं अपने साथ सिर्फ़ suitcases नहीं, उसके हिस्से का कुछ बहुत नाज़ुक भी लेकर जा रहा हूँ।

मैंने सिर seat से टिकाया और आँखें बंद कर लीं। उसकी diary फिर मेरे सामने आ गई—उसके हाथों में दबी हुई, उन तीन महीनों के हर अनकहे शब्द को अपने भीतर सँभाले।

मुझे उसे ले लेना चाहिए था।

यह ख़याल अचानक इतनी तीव्रता से आया कि मैंने आँखें खोल दीं। एक पल के लिए मन हुआ Rukhsaar से कहूँ car मोड़ दे। मैं वापस जाऊँ, doorbell बजाऊँ और बिना कोई explanation दिए बस वह diary माँग लूँ। शायद flight छूट जाती। शायद Ananya हँस पड़ती। शायद रोती। शायद कहती कि अब इसे पढ़ने का कोई अधिकार नहीं है।

लेकिन car बहुत आगे निकल चुकी थी।

मैंने खिड़की से बाहर देखा। पीछे छूटती सड़क पर उसका घर अब कहीं दिखाई नहीं देता था।

यार, वह diary ले लेनी चाहिए थी।

चार साल उसके बिना कैसे रहूँगा?


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Author: Onesha

She is the funny one! Has flair for drama, loves to write when happy! You might hate her first story, but maybe you’ll like the next. She is the master of words, but believes actions speak louder than words. 1sha Rastogi, founder of 1shablog.com.

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