Part 24

Apologies dear Readers I was on a break from my novel writing and I will be writing daily.

Recap of the novel (Parts 1–23)

Sugandh unexpectedly meets Ananya after almost ten years in a club. That one meeting brings back memories of a life he had buried long ago.

The story then shifts into the past, beginning with their first day together in a corporate office. Sugandh is confident, charming, emotionally detached, and known around the office as someone who never gets attached. Ananya is warm, deeply empathetic, remembers everyone, writes poetry, and slowly becomes the emotional center of the office.

During those years Sugandh forms a complicated physical relationship with Kusha, a senior colleague who is carrying the scars of betrayal. Their relationship has comfort but no future. Through Kusha, Sugandh begins understanding forgiveness, heartbreak and emotional intimacy, although he still refuses to believe in love.

Meanwhile Ananya quietly becomes someone he constantly notices. He memorizes her habits before realizing he has started caring about her.

Sugandh later moves to Amsterdam for two years. He believes changing cities will change his life, but realizes memories travel with people. During that period Kusha briefly meets him again, and for the first time Sugandh understands the difference between physical closeness and emotional connection.

Back in India, an office farewell party changes everything. A drunk but brutally honest Ananya delivers a passionate speech about modern relationships, emotional immaturity, and how people have forgotten how to love honestly. That speech breaks something inside Sugandh. For the first time, he starts seeing her beyond attraction.

Slowly he realizes that love is not grand gestures—it is noticing someone. Their ordinary office days become extraordinary in retrospect. He notices her coffee, her habits, her laughter, her silence. Without trying, she becomes a part of his daily life.

Ananya, meanwhile, has loved Sugandh for years in silence. She watches him from a distance, misunderstands his emotional walls, and believes she is just another face in his life. Before resigning from the company, she spends one final night with him after her farewell. They share their first kiss and their deepest emotional intimacy, but fear keeps Ananya from staying. She leaves before he wakes and cuts all contact.

Her absence destroys Sugandh’s carefully built emotional defenses. He finally realizes that everything he called “being practical” was actually fear born from losing Saba years ago. He accepts that he is in love with Ananya.

Ananya, on the other hand, joins a new company but cannot move on. She writes letters she never sends, secretly follows Sugandh online, develops anxiety, insomnia and physical pain caused by emotional suppression. Therapy eventually convinces her that silence will never heal her.

Months later she finally gathers the courage to call him. Sugandh immediately goes to her house. For the first time they speak honestly. Both discover they spent months living with exactly the same fears—that the other person had moved on.

They apologize, embrace, and slowly dismantle the walls they built around themselves. Neither of them makes dramatic promises. They simply admit that their story deserves a chance.

At the end, however, reality returns. Sugandh has a four-year assignment in Japan. They hug one last time before his departure, both knowing that love has finally arrived at the exact moment life is asking them to separate.

कुछ दिन ज़िन्दगी के नाम

कभी-कभी हम किसी जगह से बहुत आगे निकल चुके होते हैं।

इतना आगे कि वापस लौटना practical नहीं रहता।रास्ता लम्बा हो चुका होता है। समय कम होता है। लोग इंतज़ार कर रहे होते हैं। Tickets book हो चुकी होती हैं, plans बन चुके होते हैं और ज़िन्दगी हमें बार-बार समझाती है कि अब पीछे मुड़ने का कोई मतलब नहीं।

फिर भी…

दिल किसी बन्द दरवाज़े के बाहर ही खड़ा रह जाता है।और तब इंसान को पहली बार समझ आता है कि आगे बढ़ जाना और सही दिशा में जाना—दो अलग बातें हैं।

Car airport की तरफ़ बढ़ रही थी।

Rukhsaar ने शायद तीसरी बार मुझसे कुछ पूछा था। मैं हर बार उसकी बात पूरी सुने बिना सिर हिला देता। बाहर सड़क पर बारिश के पानी में headlights टूटकर फैल रही थीं। कभी कोई car तेज़ी से आगे निकल जाती, कभी किसी signal पर पूरा traffic एक साथ रुक जाता।

शहर को मेरे जाने से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ना था।

अगली सुबह भी लोग अपने समय पर office पहुँचते। वही meetings होतीं, वही mails आतीं, वही traffic होता। Ananya भी शायद उठती, kitchen में जाती, चाय बनाती और पिछली रात को अपने मन के किसी कोने में रखकर नई सुबह शुरू करने की कोशिश करती।

मैं चार साल के लिए Japan चला जाता।

और हमारी कहानी…शायद फिर से किसी ‘जल्दी मिलते हैं’ के भरोसे रह जाती।मैंने सिर seat पर टिकाकर आँखें बन्द कर लीं।उसकी diary फिर सामने आ गई।उसके हाथों में दबी हुई।वही diary जिसमें पिछले तीन महीनों के वे सारे शब्द थे जिन्हें वह मुझसे कहना चाहती थी, मगर कह नहीं पाई। मैंने उसे पढ़ने से मना कर दिया था क्योंकि मैं उसकी बातें उसकी ज़ुबान से सुनना चाहता था।बात सुनने के लिए वक़्त भी तो होना चाहिए था।

और मेरे पास?

मैं उसके घर से निकलते समय एक घण्टा भी पूरा नहीं छोड़ पाया था।मेरे मन में अचानक वही ख़याल फिर आया—मुझे वह diary ले लेनी चाहिए थी।

शायद इसलिए नहीं कि मैं उसे पढ़ना चाहता था।शायद इसलिए कि उसके पास मेरा कुछ भी नहीं था, और मेरे पास भी उसका कुछ ऐसा नहीं था जिसे चार साल तक अपने पास रख सकूँ।कुछ रिश्तों में लोग एक-दूसरे की तस्वीरें सँभालते हैं।कुछ में ख़त।कुछ में gifts।

और हमारे पास?

कुछ अधूरी बातें थीं।एक रात थी।कुछ hugs थे।और बहुत सारी ख़ामोशी।

“Rukhsaar…”

मेरी आवाज़ सुनकर उसने radio की volume कम कर दी।

“Hmm?”

“Airport कितनी दूर है?”

उसने सामने navigation पर नज़र डाली।

“दस–बारह minute. क्यों?”

मैंने जवाब नहीं दिया।

Phone निकाला।

Screen unlock की।

Ananya की chat सबसे ऊपर थी। कोई नया message नहीं था। उसका नाम screen पर देखकर जाने क्यों लगा कि वह अभी भी दरवाज़े के पास खड़ी होगी। शायद नहीं। शायद वह diary लेकर sofa पर बैठ गई होगी। शायद रो रही होगी। शायद खुद को समझा रही होगी कि जो होना था, हो गया।

शायद वह भी यही सोच रही होगी कि मुझे रोक लेना चाहिए था।इंसान अपनी तरफ़ की ख़ामोशी तो जानता है।सामनेवाले की चुप्पी के अर्थ वह अपनी सुविधा और अपने डर के हिसाब से बनाता रहता है।

मैंने उसकी chat खोली।कुछ देर keyboard को देखता रहा।फिर लिखा—

सोई नहीं ना?

Message भेजने के बाद मैं screen देखता रहा।

एक tick।

फिर दो।

Reply नहीं आया।

“सब ठीक है?” Rukhsaar ने पूछा।

“पता नहीं।”

“Japan को लेकर?”

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

“नहीं।”

“फिर?”

मैंने phone हाथ में घुमाते हुए कहा, “कभी-कभी सही decision भी गलत क्यों लगता है?”

Rukhsaar कुछ पल चुप रहा।

वह उन दोस्तों में से नहीं था जो हर बात पर कोई motivational line बोल दें। शायद इसीलिए जब भी कुछ कहता था, मैं सुनता था।

“क्योंकि decision दिमाग़ लेता है,” उसने सामने देखते हुए कहा, “और उसका नुकसान कई बार दिल भरता है।”

मैं हल्का-सा हँस पड़ा।

“तू कब से ऐसी बातें करने लगा?”

“जब से तू normal बात करना भूल गया।”

Phone vibrate हुआ।

Ananya का reply था—

नहीं।

बस एक शब्द।

मैंने पूछा—

क्यों?

इस बार reply जल्दी आया।

नींद नहीं आ रही।

मेरी उँगलियाँ keyboard के ऊपर रुक गईं।मन हुआ लिख दूँ—मुझे भी नहीं।फिर लगा, यह तो हम दोनों पहले से जानते थे।कुछ truths को message में दोहराने से वे आसान नहीं होते।मैंने chat बन्द कर दी।

Airport की building अब सामने दिखाई देने लगी थी। Glass की ऊँची दीवारें, entrance के बाहर लगी cars की line और सामान खींचते हुए लोग। किसी के चेहरे पर excitement थी, किसी पर थकान। कोई किसी को गले लगा रहा था, कोई जल्दी-जल्दी goodbye कह रहा था।

हर departure के बाहर कोई न कोई छूटता है।फ़र्क़ बस इतना होता है कि कुछ लोग airport पर छूटते हैं…और कुछ हमारे भीतर।

Rukhsaar ने indicator दिया और departure lane की ओर car मोड़ दी।

उसी पल मेरे भीतर कुछ बहुत साफ़ हो गया।ऐसा नहीं था कि मैं Japan नहीं जाना चाहता था।मैं जाना चाहता था।

वह opportunity मैंने कमाई थी। Promotion मेरे career का अगला बड़ा कदम था। Tokyo में मिलनेवाला काम, exposure और वह पूरी नई ज़िन्दगी—इन सबके लिए मैं वर्षों से मेहनत कर रहा था।

मगर मैं इस तरह नहीं जाना चाहता था।Ananya को फिर से अधूरा छोड़कर नहीं।

खुद को यह समझाते हुए नहीं कि चार साल बाद सब वहीं मिलेगा जहाँ आज छोड़कर जा रहा हूँ।ज़िन्दगी किसी के लिए pause नहीं होती।चार साल बाद वह बदल चुकी होगी।मैं बदल चुका होऊँगा।हो सकता है हम दोनों अपनी-अपनी ज़िन्दगी में इतने आगे निकल जाएँ कि आज की रात को याद करते हुए केवल इतना कहें—काश उस समय कुछ दिन और मिल जाते।

कुछ पछतावे बड़े फ़ैसलों से नहीं बनते।वे उन छोटे-छोटे मौकों से बनते हैं जिन्हें हम practical बनने की कोशिश में जाने देते हैं।

“Car रोक।”

Rukhsaar ने पहले मेरी तरफ़ देखा।

“क्या?”

“Car रोक।”

“यहाँ?”

“हाँ।”

उसने car को departure lane में आगे ले जाकर किनारे रोक दिया। पीछे से एक cab वाले ने horn बजाया। Rukhsaar ने hazard lights on कर दीं और मेरी तरफ़ घूम गया।

“क्या हुआ?”

मैंने जवाब देने के बजाय manager का number dial कर दिया।

Call लग रही थी।

हर ring के साथ दिल तेज़ धड़क रहा था। अजीब बात थी—मैंने clients के सामने बड़ी presentations दी थीं, resignations handle किए थे, negotiations की थीं; लेकिन उस रात एक सप्ताह माँगने में हाथ काँप रहे थे।

तीसरी ring पर call उठ गई।

“Sugandh? You reached the airport?”

“Sir…”

मैंने सामने airport की building की तरफ़ देखा।

“Yes?”

कुछ seconds तक मैं कुछ कह नहीं पाया।

फिर पहली बार बिना कोई explanation तैयार किए बोल दिया—

“मेरे घर में emergency हो गई है।”

दूसरी तरफ़ चुप्पी रही।

“What happened?”

“कुछ personal है। मुझे… एक हफ़्ता चाहिए।”

यह पूरा सच नहीं था।

लेकिन पूरी तरह झूठ भी नहीं।

क्योंकि कभी-कभी emotional emergencies के लिए हमारे पास कोई official शब्द नहीं होता। उनके लिए medical certificate नहीं मिलता। कोई test report नहीं होती। बस एक एहसास होता है कि अगर आज नहीं रुके, तो भीतर कुछ ऐसा टूट जाएगा जिसे बाद में कोई leave, कोई promotion और कोई success ठीक नहीं कर पाएगी।

Manager ने कुछ practical सवाल पूछे। Visa validity। Joining date। Tokyo team को update। नई flight का additional cost।

मैं हर बात का जवाब देता रहा।

आख़िर में उसने गहरी साँस लेकर कहा—

“Fine. Take a week. But next Monday you have to fly.”

“I will.”

“Are you sure?”

मैंने आँखें बन्द कर लीं।

“हाँ।”

पहली बार…

मैं सच में sure था।

Call कट गई।

मैंने phone नीचे कर लिया।

Rukhsaar मुझे देख रहा था।

“तूने flight postpone कर दी?”

“हाँ।”

“चार साल का project?”

“सिर्फ़ एक हफ़्ता।”

उसने कुछ क्षण मुझे देखा, फिर हल्का-सा मुस्कुराया।

“और इस एक हफ़्ते में क्या करेगा?”

मेरी नज़र phone पर चली गई।

Ananya की chat अब भी खुली थी।

नींद नहीं आ रही।

मैंने उसकी बात पढ़ी और जाने कितने दिनों बाद मेरे भीतर बेचैनी के साथ थोड़ी-सी शान्ति भी उतर आई।

“जो तीन महीने पहले कर लेना चाहिए था।”

“मतलब?”

“उससे बात।”

Rukhsaar ने सिर हिलाया।

“बात के लिए flight cancel नहीं की जाती, भाई।”

“सिर्फ़ बात नहीं।”

“फिर?”

मैंने खिड़की से airport की तरफ़ देखा। कुछ लोग अपना सामान trolley पर रखकर भीतर जा रहे थे। एक आदमी बार-बार पीछे मुड़कर अपनी family को हाथ हिला रहा था।

मैंने बहुत धीरे से कहा—

“कुछ यादें बनानी हैं।”

Rukhsaar कुछ पल चुप रहा।फिर उसने hazard lights बन्द कीं और steering घुमा दी।

“कहाँ?”

“वापस।”

“उसके घर?”

“हाँ।”

Car airport की lane से बाहर निकलकर उसी सड़क पर लौट आई जिससे कुछ देर पहले आई थी।

सड़क वही थी।बारिश वही।शहर भी वही।बस direction बदल गई थी।

और कभी-कभी…

ज़िन्दगी बदलने के लिए इतना ही काफ़ी होता है।रास्ते में मैंने Ananya को कोई message नहीं किया।

पता नहीं क्यों।

शायद पहली बार उसे surprise करना चाहता था। या शायद डर था कि अगर पहले बता दिया और उसने मना कर दिया, तो मेरे पास लौटने की हिम्मत नहीं बचेगी।Rukhsaar ने दो-तीन बार पूछा कि मैं उससे क्या कहूँगा।मेरे पास कोई जवाब नहीं था।मैं Japan postpone करने की वजह बता सकता था।यह कह सकता था कि मैं उसे इस हालत में छोड़कर नहीं जा पाया।यह भी कह सकता था कि पिछले तीन महीनों में हर उस जगह पर गया जहाँ कभी सुकून मिला करता था, मगर हर जगह केवल उसी की कमी मिली।

लेकिन उसके दरवाज़े तक पहुँचते-पहुँचते मुझे समझ आ गया था कि मुझे इनमें से कुछ भी नहीं कहना।

कम-से-कम अभी नहीं।

कुछ फ़ैसलों को explanation की नहीं…एक अगले क़दम की ज़रूरत होती है।Car उसके apartment के नीचे रुकी।ऊपर वही खिड़की अब भी रोशन थी।

“मैं wait करूँ?” Rukhsaar ने पूछा।

मैंने car का door खोलते हुए कहा, “नहीं।”

“सामान?”

मैंने पीछे रखे suitcases की तरफ़ देखा।

“अपने पास रख।”

“और अगर उसने दरवाज़ा नहीं खोला?”

मैं car से बाहर निकल आया।

“तो सुबह तक यहीं बैठूँगा।”

Rukhsaar हँस पड़ा।

“तू गया।”

मैंने door बन्द करते हुए उसकी तरफ़ देखा।

“शायद पहली बार सही जगह।”

Lift के सामने खड़ा हुआ तो phone में समय देखा।रात काफ़ी हो चुकी थी।ऊपर जाते हुए हर floor पर मेरा दिल थोड़ा और तेज़ धड़कने लगा। कुछ देर पहले इसी lift से नीचे उतरा था। तब लग रहा था कि उससे दूर जा रहा हूँ।अब उसी रास्ते पर लौटते हुए पहली बार समझ आया—

किसी के पास वापस लौटना हमेशा पीछे जाना नहीं होता।

कई बार वही आपकी ज़िन्दगी का पहला सही क़दम होता है।

Lift का दरवाज़ा खुला।

Corridor खाली था।

उसके घर के बाहर पहुँचकर मैं कुछ पल चुप खड़ा रहा। दरवाज़े के नीचे से हल्की रोशनी बाहर आ रही थी।

मैंने bell दबाने के लिए हाथ उठाया।फिर रोक लिया।Phone निकाला।उसकी chat खोली।

लिखा—

दरवाज़ा खोलो।

Message send किया।

अन्दर कुछ seconds तक कोई हलचल नहीं हुई।फिर phone पर दो blue ticks आए।दरवाज़े के पीछे धीमे-धीमे क़दमों की आवाज़ सुनाई दी।Lock खुला।दरवाज़ा थोड़ा-सा खुला और Ananya सामने खड़ी थी।

उसी तरह बिखरे बाल।सूजी हुई आँखें।हाथ में अब भी वही diary।

उसने पहले मुझे देखा।

फिर corridor में मेरे पीछे।जैसे समझने की कोशिश कर रही हो कि मैं सच में वापस आया हूँ या उसकी थकान उसे कोई और भ्रम दिखा रही है।

“तुम…?”

उसकी आवाज़ बहुत धीमी थी।

मैंने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—

“Japan नहीं गया।”

वह कुछ नहीं बोली।

बस मुझे देखती रही।

“क्यों?”

मैंने पहली बार उसके सवाल से नज़रें नहीं चुराईं।

“क्योंकि चार साल जाने से पहले…”

मैं थोड़ा रुका।

“…मैं तुम्हारे साथ चार दिन जीना चाहता हूँ।”

उसकी उँगलियाँ diary के चारों ओर और कस गईं।

“कहाँ?”

मेरे चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान आई।

“घर।”

उसकी आँखों में उलझन थी।

मैंने कहा—

“पहाड़।”

“Dharamshala।”

“मेरे साथ चलोगी?”

दरवाज़े के उस तरफ़ वह खड़ी थी।इस तरफ़ मैं।

लेकिन इस बार हमारे बीच कोई बन्द दरवाज़ा नहीं था।


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Author: Onesha

She is the funny one! Has flair for drama, loves to write when happy! You might hate her first story, but maybe you’ll like the next. She is the master of words, but believes actions speak louder than words. 1sha Rastogi, founder of 1shablog.com.

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