कभी-कभी किसी इंसान के चले जाने से ज़्यादा मुश्किल उसका लौट आना होता है।
क्योंकि जाने के बाद हम अपने भीतर किसी तरह एक कहानी बना लेते हैं—कि शायद यही ठीक था, शायद यही होना था, शायद कुछ लोग हमारी ज़िन्दगी में सिर्फ़ थोड़ी देर के लिए आते हैं। हम उस कहानी को बार-बार दोहराकर अपने दर्द को कोई अर्थ देने लगते हैं।
फिर वही इंसान अचानक दरवाज़े पर वापस खड़ा मिल जाए…
तो हमारे बनाए हुए सारे अर्थ एक पल में बेकार हो जाते हैं।
और दिल को फिर से उम्मीद करने की इजाज़त मिल जाती है।
शायद इसी वजह से लौटना केवल दूरी तय करना नहीं होता।
कई बार लौटने के लिए इंसान को अपने भीतर बहुत दूर जाना पड़ता है।
दरवाज़ा खुला।
Ananya सामने खड़ी थी।
उसी तरह बिखरे बाल। आँखें अभी भी सूजी हुईं। हाथ में वही diary, जिसे कुछ देर पहले मैं उसके हाथों में छोड़कर गया था।
पहले उसने मुझे देखा।
फिर मेरे पीछे खाली corridor को।
फिर दोबारा मेरी तरफ़।
जैसे उसका दिमाग़ यह समझने में कुछ seconds पीछे चल रहा हो कि मैं सच में वापस आया हूँ।
“तुम…?”
उसकी आवाज़ लगभग फुसफुसाहट थी।
मैं कुछ पल उसे देखता रहा।
कुछ देर पहले इसी दरवाज़े से निकलते समय मैंने उससे कहा था—जल्दी मिलते हैं।
और अब मैं फिर उसी जगह खड़ा था।
बस इस बार मेरे पास उस ‘जल्दी’ का कोई vague promise नहीं था।
मैंने सीधे कहा,
“मैं नहीं गया।”
उसकी भौंहें हल्की-सी सिकुड़ीं।
“क्या?”
“Japan।”
वो मुझे देखती रही।
फिर जैसे उसे अचानक याद आया कि मैं कहाँ जा रहा था।
“Flight?”
“Postpone कर दी।”
कुछ seconds तक उसके चेहरे पर कोई emotion साफ़ नहीं आया। शायद shock इतना बड़ा था कि बाकी सब उसके पीछे खड़ा रह गया।
फिर उसकी आँखें अचानक भर आईं।
“क्यों?”
सिर्फ़ एक शब्द।
लेकिन उसमें जितने सवाल थे, उनका जवाब मेरे पास अब पहली बार था।
मैं एक कदम उसके करीब गया।
“क्योंकि car airport तक पहुँच गई थी…”
मैं थोड़ा रुका।
“…लेकिन मैं नहीं पहुँच पाया।”
उसकी आँखों से पहला आँसू नीचे आया। उसने जल्दी से उसे पोंछने के लिए हाथ उठाया।
मैंने उसका हाथ बीच में ही रोक लिया।
बहुत धीरे से।
उसकी उँगलियाँ मेरी उँगलियों में आ गईं।
“Ananya…”
इस बार उसने मुझे बीच में नहीं रोका।
“चार साल बहुत होते हैं।”
“मुझे पता है।”
“और मैं ये नहीं चाहता कि चार साल बाद जब मैं वापस आऊँ…”
मेरी आवाज़ अपने-आप धीमी हो गई।
“…तो हमारे बारे में मेरे पास सिर्फ़ regret हो।”
उसकी साँस थोड़ी गहरी हुई।
“तो अब?”
मैंने उसकी आँखों में देखते हुए कहा,
“अब कुछ दिन तुम्हारे साथ।”
वो चुप रही।
“बस।”
“कोई promise नहीं।”
“कोई future decide नहीं करेंगे।”
“कोई calculation नहीं कि कौन किसका कितने साल wait करेगा।”
उसने कुछ seconds मुझे देखा।
“और उसके बाद?”
यह वही सवाल था जिससे हम दोनों महीनों से भाग रहे थे।
उसके बाद?
Japan।
चार साल।
दो अलग cities नहीं—दो अलग countries.
दो अलग time zones.
दो careers.
दो ऐसी ज़िन्दगियाँ जिन्हें हममें से कोई दूसरे के लिए रोकना नहीं चाहता था।
मैंने उसका हाथ थोड़ा और कस लिया।
“उसके बाद मैं Japan जाऊँगा।”
उसके चेहरे पर हल्का-सा दर्द आया।
लेकिन इस बार मैंने बात अधूरी नहीं छोड़ी।
“और तुम अपनी ज़िन्दगी जीओगी।”
वो मेरी तरफ़ देखने लगी।
“मैं भी।”
“बस जाने से पहले…”
मैंने साँस ली।
“…मैं कुछ दिन ऐसे जीना चाहता हूँ जिनमें हमें अगला साल decide ना करना पड़े।”
“सिर्फ़ अगला दिन।”
उसकी आँखें फिर भर आईं।
मैंने बहुत धीरे से कहा,
“इस बार भागकर नहीं जाना चाहता।”
उसने आँखें बन्द कर लीं।
एक आँसू और नीचे आ गया।
और अगले ही पल…
वो मेरे सीने से आ लगी।
इतनी अचानक कि मैं एक कदम पीछे चला गया।
Diary उसके हाथ से लगभग छूट गई। मैंने उसे side table पर रख दिया और दोनों बाँहों से Ananya को पकड़ लिया।
इस बार hug पिछली रात वाला नहीं था।
पिछली रात वो टूट रही थी।
आज…
वो मुझे रोक रही थी।
उसकी बाँहें मेरी पीठ के चारों तरफ़ इतनी कसकर थीं कि हमारे बीच कोई जगह नहीं बची थी। उसका चेहरा मेरे सीने के पास था। मेरी ठुड्डी उसके बालों पर।
उसकी साँसें तेज़ थीं।
मेरी भी।
कुछ देर तक बस वही हुआ।
कोई explanation नहीं।
कोई सवाल नहीं।
दो लोग, जो कुछ घंटे पहले फिर अलग होने वाले थे, अब पहली बार एक-दूसरे को इस तरह पकड़ रहे थे जैसे उन्हें सच में समझ आ गया हो कि वे खो क्या सकते थे।
उसने बहुत धीरे से कहा,
“तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिए था।”
मैंने उसके बालों के पास पूछा,
“क्या?”
“वापस आना।”
मैं उससे थोड़ा अलग हुआ।
“क्यों?”
उसने मेरी तरफ़ देखा।
आँखों में आँसू थे, लेकिन होंठों पर हल्की-सी मुस्कान भी।
“क्योंकि अब तुम्हें जाने देना और मुश्किल होगा।”
बस।
वही line थी।
शायद वही आख़िरी दीवार भी।
मैंने कुछ नहीं कहा।
मेरी हथेली उसके गाल तक गई।
उसने इस बार पीछे हटने की कोशिश नहीं की।
उल्टा उसका चेहरा मेरी हथेली में थोड़ा-सा झुक गया।
एक instinctive movement.
इतना छोटा…
लेकिन मेरे भीतर कुछ पूरी तरह बदल गया।
मैं उसके और करीब आया।
हमारे बीच मुश्किल से कुछ inches बचे थे।
उसकी नज़र एक पल मेरे होंठों पर गई।
फिर मेरी आँखों पर।
मैंने धीरे से पूछा,
“रुक जाऊँ?”
उसने बहुत हल्के से सिर हिलाया।
“नहीं।”
और फिर वह खुद मेरे करीब आ गई।
हमारे होंठ मिले।
पहले बहुत हल्के से।
जैसे हम दोनों अभी भी यक़ीन कर रहे हों कि यह सच में हो रहा है।
फिर उसके हाथ मेरी shirt के पास आ गए और उसने मुझे अपनी तरफ़ खींच लिया।
उस एक movement के बाद kiss बदल गया।
अब उसमें hesitation कम था।
महीनों की दूरी ज़्यादा।
वो सारी रातें थीं जिनमें उसने मेरा number खोलकर call नहीं किया।
वो सारी सुबहें थीं जिनमें मैंने उसकी खाली chair देखी।
वो farewell वाली रात थी।
वो पहली अधूरी closeness।
वो block।
वो diary।
वो रोना।
वो airport।
सब कुछ जैसे उस एक kiss में आकर एक-दूसरे से हिसाब माँग रहा था।
मैंने उसकी कमर पर हाथ रखा और उसे अपने और करीब खींच लिया।
वो मेरे सीने से लगी थी।
इतनी करीब कि उसकी heartbeat लगभग महसूस हो रही थी।
शायद kiss कुछ seconds चली।
शायद बहुत देर।
उस समय घड़ी का कोई मतलब नहीं था।
जब हम अलग हुए तो सिर्फ़ इतना कि साँस ले सकें।
उसका माथा मेरे माथे से लगा था।
हम दोनों की आँखें बन्द थीं।
उसने एक छोटी-सी साँस छोड़ी और हल्का-सा हँसी।
“अब क्या?”
मैंने आँखें खोलीं।
“Pack करो।”
उसने मेरी तरफ़ देखा।
“क्या?”
“चार दिन।”
“कहाँ?”
“घर।”
उसने भौंहें सिकोड़ दीं।
“तुम्हारा?”
मैं मुस्कुराया।
“पहाड़।”
उसकी आँखों में पहली बार उस रात आँसू से ज़्यादा चमक आई।
“Dharamshala?”
“Dharamshala।”
कुछ seconds तक वो सिर्फ़ मुझे देखती रही।
फिर अचानक दोबारा मेरे गले लग गई।
इस बार मैं हँस पड़ा।
“अब क्या हुआ?”
उसने मेरे shoulder पर चेहरा छिपाकर कहा,
“बस…”
वो थोड़ा और करीब आ गई।
“…थोड़ी देर और।”
मैंने उसे कसकर पकड़ लिया।
“आज जल्दी नहीं है।”
और शायद पिछले कई महीनों में पहली बार मैंने यह बात सच में कही थी।
“चार दिन?”
कुछ देर बाद उसने दोबारा पूछा।
हम अब sofa के पास खड़े थे। Diary वापस उसके हाथ में थी, लेकिन इस बार उसकी fingers उसके cover को बेचैनी से नहीं कुरेद रही थीं।
“हाँ।”
“और फिर तुम चले जाओगे?”
“हाँ।”
उसके चेहरे की चमक एक पल को कम हुई।
मैं उसके पास बैठ गया।
“Ananya…”
वो भी बैठ गई।
मैंने कहा,
“मैं चाहता हूँ इन चार दिनों में हम कोई ऐसा promise ना करें जिसे बाद में निभाने के डर में हम इन्हीं दिनों को खराब कर दें।”
“मतलब?”
“मतलब ना relationship define करेंगे।”
“ना चार साल का plan बनाएँगे।”
“ना ये decide करेंगे कि कौन किसका wait करेगा।”
उसने diary अपनी lap पर रख ली।
“तो क्या करेंगे?”
मैं मुस्कुराया।
“जीएँगे।”
उसने मुझे ऐसे देखा जैसे मेरे मुँह से यह शब्द सुनना उसके लिए थोड़ा unexpected हो।
“तुम?”
“हाँ।”
“Present में?”
“हाँ।”
“Voluntarily?”
“अब ज़्यादा insult मत करो।”
वो हँसी।
सच में हँसी।
वही पुरानी हँसी, जिसमें पहले आँखें मुस्कुराती थीं।
मैं बस उसे देखता रहा।
शायद पिछले तीन महीनों में मैं यही तो ढूँढ़ रहा था—उसका वह version जो डर से पहले मौजूद था।
उसने मेरी नज़र पकड़ ली।
“क्या?”
“कुछ नहीं।”
“झूठ।”
मैं मुस्कुराया।
“तुम्हारी हँसी miss की थी।”
उसकी मुस्कान धीरे-धीरे बदल गई।
कुछ softer.
कुछ ऐसा, जिसका जवाब शायद words नहीं होते।
उसने मेरी fingers पकड़ लीं।
“मेरे office का क्या?”
मैं हँस पड़ा।
“तुम्हें अभी office याद आ रहा है?”
“Job है मेरी।”
“Leave नाम की भी कोई चीज़ होती है।”
“इतनी अचानक?”
“Emergency।”
उसने भौंहें उठाईं।
“कौन-सी emergency?”
मैंने उसकी तरफ़ देखते हुए कहा,
“मैं।”
वो दो seconds तक मुझे घूरती रही।
फिर सिर हिलाकर हँस पड़ी।
“तुम बहुत stupid हो।”
“पता है।”
“और irresponsible।”
“ये नया है।”
“Japan की flight postpone कर दी।”
“एक हफ़्ते के लिए।”
उसके चेहरे की मुस्कान थोड़ी कम हुई।
“मेरे लिए?”
मैंने तुरंत जवाब नहीं दिया।
क्योंकि कुछ सवालों का सच शब्दों से बड़ा होता है।
फिर मैंने कहा,
“अपने लिए भी।”
उसकी आँखें थोड़ी नरम हो गईं।
शायद यही जवाब उसे सुनना चाहिए था।
अगर मैं कह देता कि मैंने सब कुछ उसके लिए छोड़ा, तो शायद उसी पल हमारे बीच एक ऐसा बोझ पैदा हो जाता जिसे हम दोनों उठाना नहीं चाहते थे।
प्यार अगर शुरुआत में ही sacrifice का हिसाब माँगने लगे तो वह बहुत जल्दी रिश्ता कम और कर्ज़ ज़्यादा लगने लगता है।
मैं ऐसा नहीं चाहता था।
मैं चाहता था कि हम एक-दूसरे को चुनें।
लेकिन खुद को छोड़े बिना।
वो कुछ देर मुझे देखती रही।
फिर बोली,
“कब निकलना है?”
“अभी।”
“क्या?”
“अभी।”
उसने phone देखा।
“Almost तीन बज रहे हैं।”
“Perfect।”
“Perfect कैसे?”
“Traffic नहीं मिलेगा।”
“तुम seriously अभी Dharamshala drive करोगे?”
“हाँ।”
“सोए कब थे?”
“Details।”
“और अगर रास्ते में नींद आ गई?”
“तुम चला लेना।”
वो हँस पड़ी।
“Get lost।”
मैं उठकर पीछे मुड़ने लगा।
“ठीक है, मैं चला जाता हूँ।”
उसने तुरंत मेरा हाथ पकड़ लिया।
बस एक second के लिए।
लेकिन इतना काफ़ी था।
मैं रुक गया।
हम दोनों की नज़र उसके हाथ पर गई।
इस बार उसने तुरंत हाथ नहीं छोड़ा।
“मैंने जाने को नहीं कहा।”
मैंने मुस्कुराकर पूछा,
“तो?”
“Forty minutes।”
“Thirty।”
“Forty-five।”
“Thirty-five।”
“Forty।”
“Done।”
वो उठी।
दो कदम बाद रुकी।
“एक बात।”
“Hm?”
“अगर मैं चलूँ…”
उसने मेरी तरफ़ देखकर कहा,
“तो कोई emotional drama नहीं।”
“मतलब?”
“मतलब पहाड़ों पर जाकर मुझे ये मत बोलना कि अब चार साल मेरा wait करना।”
मैंने उसकी आँखों में देखा।
“नहीं बोलूँगा।”
“और मैं भी नहीं बोलूँगी।”
“ठीक।”
“हम वहाँ future fix करने नहीं जा रहे।”
“ठीक।”
वो कुछ पल चुप रही।
फिर बहुत धीमी आवाज़ में बोली,
“बस… कुछ अच्छे दिन चाहिए।”
उसके कहने के तरीके में इतनी थकान थी कि मुझे पहली बार पूरी तरह समझ आया—
हम दोनों प्यार से ज़्यादा उस समय आराम चाहते थे।
एक-दूसरे से नहीं।
एक-दूसरे के साथ।
मैंने कहा,
“मुझे भी।”
करीब चालीस minute बाद वो नीचे आई।
एक medium-sized bag।
एक jacket हाथ में।
बाल जल्दी में बाँधे हुए।
चेहरे पर कोई makeup नहीं।
आँखों में अभी भी हल्की थकान।
लेकिन पिछले कुछ घंटों में पहली बार…
उनमें anticipation भी था।
मैं car के पास खड़ा था।
उसने इधर-उधर देखा।
“Rukhsaar?”
“घर भेज दिया।”
“और तुम्हारा luggage?”
“उसके पास।”
“मतलब हम literally बिना planning के निकल रहे हैं?”
“हाँ।”
“Hotel?”
“देख लेंगे।”
“Booking?”
“नहीं।”
“Route?”
“मुझे पता है।”
वो सिर पकड़कर हँसी।
“Sugandh…”
“Hmm?”
“अगर हम रास्ते में मर गए ना…”
“तो Japan problem solve।”
उसने मेरे shoulder पर हाथ मारा।
“Idiot।”
मैं हँस पड़ा।
और उस छोटे-से moment में जाने क्यों लगा कि पिछले तीन महीनों में हमने जितना खोया था, उसका थोड़ा-सा हिस्सा वापस मिलने लगा है।
Delhi धीरे-धीरे पीछे छूट रही थी।
रात और सुबह के बीच का समय हमेशा अजीब होता है।
शहर पूरी तरह सोया नहीं होता और दिन पूरी तरह जागा नहीं होता। कुछ tea stalls खुलने लगते हैं। कुछ trucks highway पर बहुत दूर तक अपनी lights खींचते चले जाते हैं। कोई airport जा रहा होता है, कोई airport से लौट रहा होता है।
और कुछ लोग…
शायद पहली बार सच में कहीं पहुँच रहे होते हैं।
Ananya passenger seat पर खिड़की से बाहर देख रही थी।
पहले आधे घंटे हमने लगभग कुछ नहीं कहा।
Radio बहुत धीमी volume पर चल रहा था। कभी कोई पुराना गाना आता, फिर advertisements, फिर ख़ामोशी।
कुछ देर पहले उसके घर में kiss के दौरान जितना कुछ हमारे बीच कहा गया था, उसके बाद शायद words को थोड़ी छुट्टी चाहिए थी।
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
वो जाग रही थी।
कुछ minute बाद उसने मुझे देखते हुए पूछा,
“क्या?”
“कुछ नहीं।”
“Road सामने है।”
“मुझे पता है।”
“फिर बार-बार मुझे क्यों देख रहे हो?”
मैंने सामने देखते हुए कहा,
“Check कर रहा हूँ।”
“क्या?”
“तुम सच में हो।”
उसके चेहरे की मुस्कान थोड़ी रुक गई।
“मैं भी।”
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
“क्या?”
“यही check कर रही हूँ।”
कुछ seconds तक हम चुप रहे।
फिर मैंने steering से अपना बायाँ हाथ हटाकर बीच में रख दिया।
बिना कुछ कहे।
उसकी नज़र मेरे हाथ पर गई।
वो एक पल रुकी।
फिर उसने अपना हाथ मेरी हथेली में रख दिया।
मैंने उसकी fingers पकड़ लीं।
उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं।
हम दोनों ने एक-दूसरे की तरफ़ नहीं देखा।
शायद कुछ gestures को देखने की ज़रूरत नहीं होती।
उन्हें महसूस करना काफ़ी होता है।
कुछ देर बाद उसने पूछा,
“तुम पहले भी ऐसे अचानक कहीं निकल जाते हो?”
“हाँ।”
“अकेले?”
“ज़्यादातर।”
“क्यों?”
मैंने steering पर पकड़ थोड़ी बदली।
“शहर में बहुत noise है।”
“पहाड़ों में नहीं?”
“वहाँ भी है।”
“फिर?”
“वहाँ noise अपना लगता है।”
उसने मेरी तरफ़ देखा।
मैंने कहा,
“हवा की आवाज़।”
“पानी।”
“पेड़।”
“किसी दूर के temple की घंटी।”
“कभी कोई dog।”
“कभी कुछ नहीं।”
वो मुस्कुराई।
“और Delhi?”
“Notifications।”
वो हँस पड़ी।
“Meetings।”
“Deadlines।”
“Escalations।”
“और?”
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
“लोग।”
वो खिड़की के बाहर देखने लगी।
कुछ seconds बाद उसने कहा,
“लोग ही सबसे ज़्यादा noise करते हैं।”
फिर और धीमे से—
“कभी-कभी बिना बोले भी।”
उसकी आवाज़ अचानक बदल गई।
मैंने कुछ नहीं कहा।
क्योंकि मैं जानता था।
पिछले तीन महीनों में हम दोनों के बीच सबसे ज़्यादा शोर हमारी ख़ामोशी ने ही किया था।
मैंने उसका हाथ थोड़ा कस लिया।
उसने भी।
सुबह करीब छह बजे हमने highway पर एक dhaba पर car रोक दी।
हल्की ठंड थी।
आसमान धीरे-धीरे नीला हो रहा था।
Ananya ने jacket पहन ली और car से उतरते ही दोनों हाथ pockets में डाल लिए।
“Coffee?”
मैंने पूछा।
“चाय।”
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
“तुम coffee वाली नहीं थीं?”
“मैं बहुत कुछ वाली थी।”
“थी?”
“हाँ।”
उसने chair खींचते हुए कहा,
“लोग बदलते हैं।”
मैं उसके सामने बैठ गया।
“कुछ चीज़ें नहीं बदलतीं।”
“जैसे?”
“तुम सवाल बहुत पूछती हो।”
“और तुम जवाब नहीं देते।”
मैं मुस्कुराया।
“देखा?”
“क्या?”
“ये भी नहीं बदला।”
वो हँसी।
दो chai आईं।
साथ में आलू के parathe।
हम दोनों ने शायद पहली बार इतने normal तरीके से साथ खाना खाया।
बिना office gang के।
बिना farewell के।
बिना alcohol के।
बिना रोए।
बिना किसी रात के खत्म होने की जल्दी के।
मैंने उसे achar के साथ paratha खाते हुए देखा।
उसने मेरी नज़र पकड़ ली।
“क्या?”
“कुछ नहीं।”
“झूठ।”
मैं हँस पड़ा।
“तुम्हें अब भी याद है?”
“क्या?”
“कि ‘कुछ नहीं’ तुम्हारा favourite answer है।”
कुछ seconds के लिए हम दोनों चुप हो गए।
फिर वो धीरे से मुस्कुराई।
“कुछ बातें भूलती नहीं हैं।”
मैंने chai का sip लिया।
“शायद भूलनी भी नहीं चाहिए।”
उसने glass table पर रखा।
“तुम्हें सच में regret नहीं हो रहा?”
“किसका?”
“Flight।”
मैं कुछ पल उसकी तरफ़ देखता रहा।
“मैं Japan जा रहा हूँ, Ananya।”
“पता है।”
“Promotion भी ले रहा हूँ।”
“पता है।”
“चार साल भी जा रहा हूँ।”
उसने glass की तरफ़ देखते हुए कहा,
“वो सबसे ज़्यादा पता है।”
मैंने table के ऊपर उसका हाथ पकड़ लिया।
“मैंने अपना सपना नहीं छोड़ा।”
“बस उसकी शुरुआत सात दिन आगे कर दी।”
उसने मेरी तरफ़ देखा।
“क्यों?”
“क्योंकि चार साल बाद मुझे promotion याद रहेगा।”
“Tokyo याद रहेगा।”
“काम याद रहेगा।”
“लेकिन अगर आज चला जाता…”
मैं थोड़ा रुका।
“…तो पूरी ज़िन्दगी शायद ये भी याद रहता कि जब हमारे पास पहली बार एक-दूसरे के लिए सच में कुछ था, मैंने flight पकड़ ली।”
उसकी आँखें झुक गईं।
कुछ देर बाद उसने बहुत धीमे से कहा,
“मुझे guilt हो रहा है।”
“किस बात का?”
“कि मैं खुश हूँ।”
मैं उसे देखता रहा।
“मुझे पता है तुम जा रहे हो।”
“मुझे शायद अभी दुखी होना चाहिए।”
“Future की tension होनी चाहिए।”
फिर उसके होंठों पर हल्की मुस्कान आई।
“लेकिन मैं बहुत खुश हूँ।”
मैंने उसके हाथ पर अंगूठा धीरे से घुमाया।
“तो खुश रहो।”
उसने मेरी तरफ़ देखा।
“इतना simple?”
“आज के लिए।”
“और कल?”
“कल का कल देखेंगे।”
“तुम पहले ऐसे नहीं थे।”
“कैसा?”
“Present में रहने वाले।”
मैं हँसा।
“मैं पहले airport से वापस भी नहीं आता था।”
इस बार वो खुलकर हँस पड़ी।
और मुझे लगा—
शायद खुशी को हर बार justify करना ज़रूरी नहीं होता।
कभी-कभी वह बस आती है।
और हमें उसे बैठने देना चाहिए।
सूरज निकलते-निकलते हम फिर road पर थे।
Ananya ने seat थोड़ी पीछे की।
“सो जाओ।”
मैंने कहा।
“नहीं।”
“क्यों?”
“डर है।”
“किस बात का?”
“तुम car चला रहे हो।”
“बहुत funny।”
वो मुस्कुराई।
दस minute बाद सो गई।
पहले उसका सिर window की तरफ़ था।
फिर एक turn पर दूसरी तरफ़ आया।
फिर वापस।
मैंने speed थोड़ी कम कर दी।
कुछ देर बाद नींद में उसने अपना हाथ seat पर फैलाया।
उसकी fingers मेरी wrist से टकराईं।
फिर बिना आँख खोले उसने मेरा हाथ पकड़ लिया।
मैं बिल्कुल स्थिर हो गया।
शायद उसने consciously नहीं किया था।
और इसी वजह से उसका असर ज़्यादा था।
कभी-कभी कोई इंसान जागते हुए जितना trust नहीं बता पाता…
उसका शरीर सोते हुए बता देता है।
मैंने उसकी fingers ठीक से पकड़ लीं।
और बहुत देर तक वैसे ही drive करता रहा।
इतने साल।
इतनी complications।
इतने unanswered questions।
और उस समय मेरी सबसे बड़ी concern बस यह थी कि कहीं car के किसी sharp turn पर उसकी नींद ना खुल जाए।
प्यार शायद हमेशा grand नहीं होता।
कभी-कभी बस इतना होता है—
आप speed कम कर देते हैं…
ताकि सामने वाला सोता रहे।
करीब दस बजे उसकी आँख खुली।
उसने कुछ seconds बाहर देखा।
फिर मुझे।
फिर सीधी होकर बैठी।
“मैं कितनी देर सोई?”
“चार साल।”
उसने तुरंत मेरी तरफ़ देखा।
“Shut up.”
मैं हँस पड़ा।
“एक घंटा।”
“कहाँ पहुँचे?”
“अब पहाड़ शुरू।”
उसने तुरंत window की तरफ़ देखा।
दूर सामने पहली mountain range दिखाई दे रही थी।
हल्की धुंध।
नीला आसमान।
सड़क धीरे-धीरे ऊपर चढ़ रही थी।
उसके चेहरे पर जो बदलाव आया…
मैंने शायद उसी के लिए flight postpone की थी।
उसकी आँखें अचानक चमक गईं।
“Wow…”
बस इतना।
फिर वो कुछ देर कुछ नहीं बोली।
कुछ लोगों को mountains देखकर peace मिलता है।
कुछ को excitement।
Ananya को देखकर लगा जैसे उसे कोई पुरानी जगह याद आ गई हो।
हालाँकि वह पहली बार वहाँ थी।
शायद कुछ जगहें पहली बार देखकर भी घर जैसी लगती हैं।
कुछ kilometre बाद उसने window थोड़ा नीचे कर दिया।
ठंडी हवा अंदर आई।
उसके बाल चेहरे पर आने लगे।
उसने उन्हें पीछे किया।
एक बार।
दूसरी बार।
तीसरी बार कोशिश छोड़ दी।
“अब समझ आया तुम यहाँ क्यों भागते रहते थे।”
“मैं भागता नहीं।”
“हाँ, हाँ।”
“सच।”
“तो?”
मैंने सामने road देखते हुए कहा,
“वापस आता था।”
वो मेरी तरफ़ देखने लगी।
“मेरे लिए mountains escape नहीं हैं, Ananya।”
“फिर?”
“Reset।”
वो चुप रही।
“शहर तुम्हें लगातार बताता है तुम कौन हो।”
“Designation।”
“Salary।”
“Relationship status।”
“Performance।”
“और पहाड़?”
मैंने सामने उठती सड़क की तरफ़ देखा।
“कुछ नहीं पूछते।”
“बस रहने देते हैं।”
वो काफी देर चुप रही।
फिर बाहर देखते हुए बोली,
“शायद मुझे भी कुछ दिन कोई सवाल नहीं चाहिए।”
मैंने बहुत धीमे से कहा,
“इसीलिए तो लाया हूँ।”
उसने मेरी तरफ़ देखा।
इस बार उसकी आँखों में जवाब नहीं, भरोसा था।
Dharamshala पहुँचने से पहले मैंने एक viewpoint पर car रोक दी।
Ananya बाहर उतरते ही railing के पास चली गई।
नीचे valley खुली हुई थी। दूर तक छोटे घर। कुछ खेत। पहाड़ों के बीच अटके clouds.
उसने phone निकाला।
पहली photo।
दूसरी।
तीसरी।
“बस last।”
उसने कहा।
“तुम पिछली तीन photos से यही बोल रही हो।”
“इस बार सच।”
मैं car से टिककर उसे देखता रहा।
और अचानक मुझे Bir की वह दोपहर याद आई जब मैं अकेला बैठा यही imagine कर रहा था—अगर Ananya यहाँ होती तो शायद photos लेती, roadside chai के लिए रुकती, हवा से बाल बचाने की कोशिश करती और फिर आखिर में phone bag में रख देती। उस समय उसकी याद मेरे साथ थी; वह नहीं थी।
आज वह मेरे सामने खड़ी थी।
लगभग उसी तरह।
मैंने कहा,
“तुम्हें पता है मैंने तुम्हें exactly ऐसे imagine किया था।”
वो camera नीचे करके मेरी तरफ़ मुड़ी।
“क्या?”
“यहीं नहीं।”
“Mountains में।”
“कब?”
“जब तुम मुझसे बात नहीं कर रही थीं।”
उसकी मुस्कान धीरे-धीरे चली गई।
वो मेरे पास आई।
“क्या imagine किया था?”
“कि तुम्हें यहाँ लाऊँगा।”
“तुम हर चीज़ की photo लोगी।”
“हर दुकान पर रुकना होगा।”
“दस minute की जगह आधा घंटा लगाओगी।”
“और?”
“हर अच्छी चीज़ देखकर…”
मैं थोड़ा रुका।
“…मुझे लगेगा तुम्हें दिखाऊँ।”
उसका चेहरा बदल गया।
कुछ answers romantic होने की कोशिश नहीं करते।
शायद इसलिए ज़्यादा romantic लगते हैं।
वो एक कदम और आगे आई।
फिर बिना कुछ कहे अपनी बाँहें मेरी कमर के चारों तरफ़ डाल दीं।
मैंने उसे पकड़ लिया।
उसका चेहरा मेरे chest पर।
मेरी chin उसके सिर पर।
कुछ cars हमारे पास से निकलीं।
कहीं दूर से music आ रहा था।
मगर उस moment में बाकी सब background में चला गया।
मैंने पूछा,
“क्या हुआ?”
उसने मेरे सीने से लगे हुए कहा,
“कुछ नहीं।”
“Favourite answer।”
उसकी पकड़ और कस गई।
“बस रहने दो।”
मैं चुप हो गया।
कुछ देर बाद उसने ऊपर देखा।
मैंने उसके चेहरे पर आए बाल पीछे किए।
मेरी fingers उसके cheek के पास कुछ seconds रुक गईं।
उसकी आँखें मेरी आँखों पर थीं।
मैं उसके forehead के पास झुका और उसे बहुत धीरे से kiss किया।
उसने आँखें बन्द कर लीं।
मेरी बाँह उसकी कमर के और करीब आ गई।
Forehead से cheek.
फिर मैं रुक गया।
उसने आँखें खोलीं।
हम दोनों के बीच मुश्किल से कुछ inches थे।
“क्या?”
उसने धीमे से पूछा।
“Public place।”
मैंने कहा।
वो मुस्कुराई।
“अब याद आया?”
और उसने खुद मुझे kiss कर दिया।
इस बार उस kiss में पिछली रात का दर्द नहीं था।
ना आँसू।
ना goodbye.
बस attraction था।
Relief था।
और यह नया-सा एहसास कि अब हमें एक-दूसरे को चाहने से डरना नहीं था।
कुछ seconds बाद वो पीछे हुई।
उसके होंठों पर मुस्कान थी।
“अब चलें?”
मैंने कहा,
“यह unfair था।”
“क्या?”
“Start करके खुद खत्म कर दिया।”
वो car की तरफ़ चलते हुए बोली,
“चार दिन हैं।”
फिर पीछे मुड़कर मेरी तरफ़ देखा।
“Patience।”
मैं वहीं खड़ा हँसता रह गया।
हम Dharamshala पहुँचे तो afternoon उतरने लगी थी।
मैं उसे सीधे घर ले जा सकता था, लेकिन McLeodganj की तरफ़ road मोड़ दी।
“घर नहीं?”
“जाएँगे।”
“पहले?”
“चाय।”
“हम तीन बार chai पी चुके हैं।”
“ये अलग है।”
“हर chai अलग कैसे होती है?”
“पहाड़ों में होती है।”
“Scientific explanation?”
“Trust me।”
वो window के बाहर देखने लगी।
“वही करके यहाँ पहुँची हूँ।”
उस line के बाद हम दोनों मुस्कुराए।
शायद सच में।
Trust.
यही तो चीज़ सबसे पहले टूटी थी।
और शायद यही सबसे धीरे वापस आने वाली थी।
McLeodganj की छोटी गलियों में चलते हुए Ananya हर दूसरे दुकान पर रुक रही थी।
Tibetan jewellery.
Books.
Prayer flags.
Handmade journals.
एक दुकान पर उसने bracelets उठाए।
“ये अच्छा है?”
“ठीक।”
वो मुझे घूरने लगी।
“ठीक?”
“हाँ।”
“तुमसे shopping opinion माँगना गलती है।”
वो bracelet वापस रखने लगी।
मैंने उसके हाथ से ले लिया।
Shopkeeper को पैसे दिए।
“Sugandh…”
मैंने उसकी wrist पकड़कर bracelet बाँधना शुरू किया।
“रहने दो।”
“मैं खरीद रही थी।”
“अब नहीं।”
“क्यों?”
मैं knot ठीक करते हुए बोला,
“Japan में proof चाहिए होगा…”
“…कि ये चार दिन imagination नहीं थे।”
मेरी fingers उसकी wrist पर थीं।
उसकी नज़र मेरे चेहरे पर।
मैंने ऊपर देखा।
“क्या?”
वो कुछ seconds चुप रही।
फिर बोली,
“तुम कभी-कभी बहुत अच्छे लगते हो।”
मैं मुस्कुराया।
“कभी-कभी?”
उसने तुरंत हाथ खींच लिया।
“Moment खत्म।”
मैं हँस पड़ा।
वो आगे निकल गई।
मैं दो कदम में उसके पास पहुँचा और चलते-चलते उसका हाथ पकड़ लिया।
उसने हमारे जुड़े हुए हाथ देखे।
फिर मेरी तरफ़।
लेकिन छोड़ा नहीं।
बल्कि अपनी fingers मेरी fingers में और ठीक से फँसा दीं।
हम काफी देर वैसे ही चलते रहे।
पहली बार किसी सड़क पर उसका हाथ पकड़कर।
बिना किसी office colleague से छुपाए।
बिना यह तय किए कि हम क्या हैं।
बिना कोई label.
सिर्फ़ इसलिए क्योंकि उस समय उसका हाथ मेरे हाथ में अच्छा लग रहा था।
और शायद कई रिश्ते labels से पहले इसी तरह शुरू होते हैं।
एक दिन दो लोग notice करते हैं कि वे चल तो अलग-अलग रहे थे…
लेकिन जाने कब हाथ पकड़ लिया।
शाम होते-होते हम Dharamshala से आगे घर पहुँचे।
Ananya entrance पर रुक गई।
उसके चेहरे पर वही expression था जो किसी इंसान का किसी नए घर में प्रवेश करते समय होता है—curiosity और हल्की झिझक के बीच कुछ।
“तो…”
उसने अंदर आते हुए कहा,
“ये है Mr. Mysterious का घर।”
“इतना mysterious कब था?”
“बहुत।”
“तुमने कभी पूछा नहीं।”
“तुमने कभी बताया नहीं।”
“फिर वही।”
“क्या?”
“हम दोनों बेवकूफ़।”
वो हँसी।
“इस पर agreement है।”
मैंने उसका bag room में रख दिया।
Window से Dhauladhar की range साफ़ दिखाई दे रही थी।
वो curtain के पास जाकर कुछ देर बाहर देखती रही।
“तुम यहाँ बड़े हुए?”
“कुछ हिस्सा।”
“Lucky।”
“उस समय नहीं लगता था।”
“क्यों?”
मैं उसके पीछे जाकर खड़ा हो गया।
“जिस चीज़ के साथ बड़े होते हो, उसकी value अक्सर छोड़ने के बाद समझ आती है।”
वो बाहर देखते हुए बोली,
“लोगों के साथ भी।”
कुछ seconds तक हम दोनों चुप रहे।
उसने धीरे से मुड़कर मेरी तरफ़ देखा।
मैं उससे काफी करीब खड़ा था।
लेकिन मैंने उसे touch नहीं किया।
वो मुस्कुराई।
“अब फिर serious हो गए।”
“तुमने किया।”
“तो ठीक करो।”
“कैसे?”
उसने shoulders हल्के से ऊपर किए।
“मुझे क्या पता?”
लेकिन उसकी आँखों में कुछ और था।
अब हम दोनों शायद एक-दूसरे की ख़ामोशी थोड़ी बेहतर पढ़ने लगे थे।
मैंने उसके दोनों हाथ पकड़े और उसे अपनी तरफ़ खींच लिया।
वो सीधे मेरे chest से आ लगी।
इस बार उसने surprise pretend नहीं किया।
उसकी बाँहें अपने-आप मेरी गर्दन के चारों तरफ़ चली गईं।
मैंने उसके cheek पर kiss किया।
फिर दूसरे cheek पर।
वो हँसने लगी।
“क्या कर रहे हो?”
“Serious mood ठीक।”
“ये treatment है?”
“Trial basis।”
“काम कर रहा है।”
मैंने forehead पर kiss किया।
उसकी हँसी धीरे-धीरे रुक गई।
उसकी नज़र मेरे होंठों पर आई।
और इस बार उसने इंतज़ार नहीं किया।
उसने मुझे kiss किया।
धीरे शुरू हुआ।
लेकिन कुछ seconds बाद उसमें hesitation कम होती गई।
उसकी fingers मेरे बालों में थीं।
मेरे हाथ उसकी waist पर।
वो मेरे बहुत करीब थी।
और शायद हम दोनों के लिए यही सबसे नया था—
एक-दूसरे को चाहना…
और उस चाहत से भागना नहीं।
मैंने उसे थोड़ा और अपने पास खींचा।
वो एक पल अलग हुई।
Forehead मेरे forehead से।
उसकी साँस तेज़ थी।
मेरी भी।
मैंने पूछा,
“ठीक?”
उसने आँखें खोले बिना सिर हिलाया।
फिर बहुत हल्की मुस्कान के साथ दोबारा मुझे kiss कर दिया।
उस जवाब में शब्दों की कोई ज़रूरत नहीं थी।
कुछ देर बाद हम window के पास floor पर बैठ गए।
Ananya मेरे सामने नहीं थी।
वो मेरी side में थी।
उसका सिर मेरे shoulder पर।
हमारी fingers आपस में उलझी हुईं।
बाहर शाम उतर रही थी।
पहाड़ों पर light बदलने में बहुत कम समय लगता है। कुछ minute पहले जो peaks साफ़ दिखाई दे रही थीं, अब उन पर grey उतरने लगा था।
Ananya ने पूछा,
“कल कहाँ?”
“Bir।”
उसने तुरंत सिर उठाया।
“वही जगह?”
“कौन-सी?”
“जहाँ तुम मुझे imagine करते थे।”
मैं हँस पड़ा।
“तुम्हें एक line याद रह गई।”
“Important line थी।”
“हाँ।”
वो वापस मेरे shoulder पर टिक गई।
कुछ देर बाद बोली,
“मुझे वहाँ ले जाना।”
“इसीलिए जा रहे हैं।”
“वो वाली पहाड़ी भी।”
“कौन-सी?”
“जहाँ तुम अकेले बैठे थे।”
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
“क्यों?”
उसकी fingers मेरी fingers में कस गईं।
“देखना है।”
“क्या?”
उसने सामने mountains की तरफ़ देखते हुए कहा,
“वो जगह जहाँ मेरे बिना भी मैं तुम्हारे साथ थी।”
उस sentence के बाद मैं कुछ seconds बोल नहीं पाया।
मैंने उसका हाथ उठाकर उसकी fingers पर kiss किया।
वो मेरी तरफ़ देखने लगी।
“ये नया है।”
“क्या?”
“तुम affection दिखा रहे हो।”
“Problem?”
उसके चेहरे पर मुस्कान आई।
“बिल्कुल नहीं।”
फिर उसने थोड़ा रुककर कहा,
“बस आदत नहीं है।”
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
“मुझे भी नहीं।”
और शायद यही हमारी सबसे बड़ी समानता थी।
हम दोनों प्यार चाहते बहुत थे।
लेकिन प्यार receive करना नहीं जानते थे।
उसे closeness मिलती तो डर लगता कि यह चली जाएगी।
मुझे closeness मिलती तो मैं उससे पहले दूरी बना लेता कि वह मुझे चोट पहुँचा सके।
हमारी defence अलग थीं।
डर एक ही था।
खोने का।
लेकिन उस शाम हमने उसे solve नहीं किया।
शायद अभी करना भी नहीं था।
कुछ घाव conversations से नहीं…
consistency से भरते हैं।
और हमारे पास अभी पहला दिन ही था।
रात थोड़ी और ठंडी हुई तो हम balcony में आ गए।
एक blanket था।
पहले दोनों ने आधा-आधा लिया।
फिर हवा तेज़ हुई।
Ananya मेरे करीब खिसक आई।
फिर थोड़ा और।
आख़िर में वो मेरी बाँहों में थी।
उसकी पीठ मेरे chest से लगी हुई।
मेरी बाँहें उसकी waist के चारों तरफ़।
उसके हाथ मेरी बाँहों के ऊपर।
सामने पूरा पहाड़ अँधेरे में था।
नीचे कहीं-कहीं घरों की lights।
ऊपर stars.
“Cold?”
मैंने उसके कान के पास पूछा।
“नहीं।”
“झूठ।”
“अब नहीं।”
मैं मुस्कुराया।
उसने सिर थोड़ा पीछे करके मेरे shoulder पर टिका दिया।
मैंने उसकी temple पर kiss किया।
वो आँखें बन्द कर गई।
हम कुछ देर वैसे ही बैठे रहे।
फिर उसने धीरे से कहा,
“Sugandh?”
“Hm?”
“मुझे अभी Japan की बात नहीं करनी।”
“मत करो।”
“Tomorrow भी नहीं।”
“ठीक।”
“और शायद day after भी।”
मैंने उसकी waist के चारों तरफ़ पकड़ थोड़ी और कस ली।
“ठीक।”
“तुम परेशान नहीं होगे?”
“नहीं।”
“क्यों?”
मैंने सामने darkness में देखते हुए कहा,
“क्योंकि Japan कहीं नहीं जा रहा।”
वो हल्का-सा हँसी।
“Unfortunately।”
“और ये?”
मैंने पूछा।
“क्या?”
मैंने उसकी fingers अपने हाथ में लीं।
“ये चार दिन।”
वो चुप हो गई।
कुछ seconds बाद उसने बहुत धीमे से कहा,
“ये जा रहे हैं।”
मैंने अपना चेहरा उसके बालों के पास रखा।
“इसीलिए इन्हें अभी जाने नहीं देंगे।”
वो मेरी तरफ़ मुड़ी।
Blanket थोड़ा नीचे खिसक गया।
उसके दोनों हाथ मेरे shoulders पर थे।
हमारी noses लगभग touch कर रही थीं।
उसने कहा,
“तुम्हें पता है?”
“क्या?”
“तुम तीन महीने बहुत irritating थे।”
“अब?”
“अब भी हो।”
“फिर?”
वो मुस्कुराई।
“अब kiss कर सकती हूँ, इसलिए manage हो रहा है।”
मैं हँस पड़ा।
“बहुत romantic।”
“तुम deserve नहीं करते।”
“फिर भी?”
उसका जवाब शब्दों में नहीं आया।
वो थोड़ा आगे झुकी और मेरे होंठों को छू लिया।
इस बार kiss बहुत धीमा था।
लंबा।
बिना किसी desperation के।
जैसे हमारे पास सच में समय हो।
मेरे हाथ उसकी waist पर थे। उसकी fingers मेरी गर्दन के पीछे चली गईं।
हम एक-दूसरे के पास थे।
बहुत करीब।
लेकिन उस closeness में जल्दी नहीं थी।
कुछ prove नहीं करना था।
कोई अगला step earn नहीं करना था।
बस महसूस करना था कि दूसरा इंसान सच में वहाँ है।
जब वो अलग हुई तो कुछ seconds तक उसने आँखें नहीं खोलीं।
मैंने उसके forehead से अपना forehead लगा दिया।
“क्या सोच रही हो?”
उसने आँखें बन्द रखकर कहा,
“कि अगर ये सपना हुआ ना…”
“…तो मैं बहुत नाराज़ होऊँगी।”
मैं मुस्कुराया।
“कल सुबह confirm कर लेना।”
“कैसे?”
“मैं यहीं रहूँगा।”
उसने आँखें खोलीं।
मुझे देखा।
और इस बार उसके चेहरे पर जो मुस्कान आई, उसमें डर पूरी तरह गया तो नहीं था…
लेकिन पहली बार उसके साथ भरोसा भी था।
वो वापस मेरी chest से लग गई।
मैंने blanket उसके चारों तरफ़ ठीक कर दिया।
बहुत देर तक हम वहीं बैठे रहे।
ना कोई photo.
ना phone.
ना कोई message.
बस ठंडी हवा।
पहाड़।
और वो।
रात में अपने room में जाकर मैंने phone देखा।
Tokyo team की mails थीं।
नई flight confirmation भी।
अगले हफ़्ते।
Reality ने हमें छोड़ा नहीं था।
बस कुछ दिनों के लिए थोड़ा पीछे खड़ी हो गई थी।
मैंने screen बन्द कर दी।
अगले कमरे में Ananya थी।
कल Bir जाना था।
वही Bir जहाँ कुछ महीने पहले मैं अकेला बैठकर सोच रहा था कि अगर वह मेरे साथ होती तो कैसा होता—उसकी तस्वीरें, उसकी हँसी, roadside chai, mountains के बीच उसका होना। तब उस कल्पना ने मुझे दर्द के बीच भी एक छोटी-सी खुशी दी थी।
आज मुझे उसकी कल्पना करने की ज़रूरत नहीं थी।
वह सच में यहाँ थी।
उसने खुद कुछ अच्छे दिनों की माँग की थी—ऐसे दिन जिनमें उन्हें चार साल का future solve नहीं करना था, केवल थोड़ी देर एक-दूसरे के साथ साँस लेनी थी।
मैंने light बन्द कर दी।
उस रात मुझे पहली बार लगा कि शायद कुछ रिश्तों को हमेशा के लिए बचाने से पहले…
उन्हें कुछ दिनों के लिए पूरी तरह जी लेना ज़रूरी होता है।
कल Bir था।
और पहली बार,
मेरे पास वहाँ जाने के लिए सिर्फ़ उसकी याद नहीं थी।
Ananya थी।
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