Part 26

मैं bed पर लेटा हुआ Ananya के बारे में ही सोच रहा था।

कभी एक करवट, कभी दूसरी। रात गहरा चुकी थी। बहुत लम्बी drive करके हम Delhi से Dharamshala तो आ गए थे, लेकिन मेरा मन अभी भी ऐसा कर रहा था जैसे यह दिन पूरा ही न हो। जैसे यह दिन खत्म ही न हो।

उसकी बातें, उसका चेहरा, उसकी अदाएँ, रास्ते में उसका सोना, उसका मेरा हाथ पकड़ना, उसके होंठ, उसकी आँखें, उसके हाथ—सब कुछ मेरे भीतर बार-बार लौट रहा था। जैसे मुझे पहले कभी प्यार हुआ ही नहीं था। जैसे आज मुझे फिर से Ananya से प्यार हो रहा था।

फिर उसी moment मेरे दिमाग़ ने उस शब्द को पकड़ लिया।

प्यार।

प्यार एक बहुत बड़ा शब्द था। इतना बड़ा कि मैं जो भी हमारे दरमियान था, उसे अभी प्यार नहीं कहना चाहता था। मैं बस चार दिन जीना चाहता था। चार दिन जिनमें हमें किसी सवाल का जवाब नहीं देना था, किसी future का हिसाब नहीं बनाना था, किसी relationship को कोई नाम नहीं देना था।

लेकिन अब मुझे लगने लगा था—क्या ये सच में सिर्फ़ चार दिन थे?

या यह मेरी कोई ऐसी longing थी, जिस पर मैं इतने समय से हाथ नहीं रख रहा था? कोई ऐसा दरवाज़ा, जिसे मैं जान-बूझकर खोल नहीं रहा था, जबकि वह बहुत पहले खुल जाना चाहिए था।

Saba के जाने के बाद मेरा दिल बहुत टूटा था। उससे उभरने में मुझे काफ़ी वक़्त लगा था। फिर जाने-अनजाने मेरे दिल ने अपने चारों तरफ़ इतनी ऊँची दीवारें बना ली थीं कि मुझे प्यार शब्द से ही डर लगने लगा था।

मैं अपनी feelings के साथ कभी बैठता ही नहीं था।

क्योंकि कहीं न कहीं मुझे लगता था कि अगर उनके भीतर गया तो डूब जाऊँगा। अगर किसी को सच में अपने करीब आने दिया, तो उसके पास मुझे बदल देने की power होगी। वह मुझे hurt कर सकता था। मेरे decisions बदल सकता था। मुझे ऐसे choices लेने पर मजबूर कर सकता था जो logical नहीं होंगे, practical नहीं होंगे।

और फिर Ananya आयी।

धीरे-धीरे। बिना किसी घोषणा के।

पहले office में। फिर conversations में। फिर मेरी आदतों में। फिर उन खाली जगहों में, जिनके बारे में मुझे लगता था कि वे हमेशा खाली रहेंगी।

उसने मेरे ऊपर कोई जादू नहीं किया था। शायद असर उससे भी गहरा था। उसने बस मेरे भीतर के उन हिस्सों को notice किया था, जिन्हें मैं खुद भी देखने से बचता था।

और मुझे पता ही नहीं चला कि वह कब मेरे दिल में जगह बना चुकी थी।

मैं करवट बदलकर ceiling देखने लगा।

मन कर रहा था कि बगल वाले कमरे में जाऊँ और Ananya के पास लेट जाऊँ। बस उसके पास। बिना कुछ कहे।

फिर दूसरा मन मुझे रोकता।

इतना close नहीं आना चाहिए।

इतना भी नहीं कि चार साल Japan में रहना मुश्किल हो जाए। इतना नहीं कि Japan punishment लगने लगे। इतना नहीं कि कोई खूबसूरत चीज़ बाद में regret बन जाए।

मैं फिर अपनी उसी पुरानी कशमकश में चला गया।

क्या करूँ? क्या न करूँ? ये करूँ या ये नहीं?

खुलकर बात करने, खुलकर जीने और खुलकर बोलने में मुझे अभी भी परेशानी होती थी। क्योंकि जब दो लोग एक-दूसरे के बहुत करीब आ जाते हैं, तो उनके पास एक-दूसरे को hurt करने की power भी आ जाती है। वे एक-दूसरे को बदल सकते हैं। वे ऐसे decisions करवा सकते हैं जो दिल के हों, लेकिन दिमाग़ उन्हें गलत कहे।

और फिर मेरे भीतर से एक दूसरी आवाज़ आयी।

ठीक है।

अगर decision emotional होगा तो उसमें बुराई क्या है?

क्यों हम emotions के लिए, प्यार के लिए, टूटकर जी नहीं सकते? क्यों हमें सिखाया जाता है कि logical रहना ही सही है, practical रहना ही maturity है? जैसे feelings कोई ऐसी गलती हों जिनसे पहले permission लेनी पड़े।

मुझे अचानक Radha और Krishna याद आए।

शायद इसलिए नहीं कि हमारी कहानी उनसे compare की जा सकती थी। बस इसलिए कि कुछ प्रेम साथ रहने से छोटे नहीं होते। कुछ लोगों की दिशाएँ अलग होती हैं, फिर भी उनके बीच का प्रेम झूठा नहीं होता।

क्या हर प्यार का आख़िरी destination एक घर ही होता है?

एक शहर?

एक शादी?

एक surname?

या कभी-कभी किसी इंसान का आपकी ज़िन्दगी में आना ही उसके meaning के लिए काफ़ी होता है?

मेरा दिमाग़ उस जगह पहुँच चुका था जहाँ मैं कभी जाना नहीं चाहता था।

Philosophy।

Love।

Fear।

Four days।

Japan।

Ananya।

मैंने pillow उठाकर अपने चेहरे पर रख लिया।

“बस,” मैंने खुद से कहा। “सो जा।”

उसी समय दरवाज़े पर दस्तक हुई।

पहले बहुत हल्की।

मैंने pillow हटाया और कुछ seconds तक दरवाज़े को देखा। लगा शायद imagination है। फिर knock दोबारा हुई। इस बार थोड़ी साफ़।

मैं उठ बैठा। Lamp जलाया और दरवाज़ा खोला।

सामने Ananya खड़ी थी।

उसके बाल खुले हुए थे। आँखों में नींद नहीं थी। चेहरे पर वही expression था जो शायद कुछ देर पहले मेरे चेहरे पर रहा होगा—थोड़ी बेचैनी, थोड़ा संकोच और बहुत सारी अनकही बातें।

मैंने सोचा, शायद उसे पानी चाहिए। या charger। या शायद वह बस कुछ पूछने आयी है।

लेकिन उसने सीधे कहा,

“नींद नहीं आ रही।”

फिर थोड़ी देर रुककर मेरी आँखों में देखते हुए बोली,

“क्या मैं तुम्हारे साथ सो सकती हूँ?”

मैं मुस्कुरा दिया।

उस सवाल में कोई explanation नहीं था। कोई justification नहीं। बस एक सीधी-सी इच्छा थी, जिसे उसने पहली बार बिना बचाए मेरे सामने रख दिया था।

“हाँ,” मैंने कहा।

मैंने अपने कमरे का दरवाज़ा बन्द किया। फिर उसे लेकर terrace की तरफ़ चल पड़ा।

“कहाँ?” उसने पूछा।

“छत पर।”

“मुझे लगा तुम्हारे कमरे में सोना है।”

“सोना वहीं है। पहले थोड़ी हवा।”

“बहुत cold है।”

“तुम्हीं ने कहा था मेरे साथ सोना है।”

“Room में।”

मैं हँस पड़ा।

छत पर एक पुराना carpet बिछा हुआ था। एक तरफ़ folded blankets रखे थे। रात में वह जगह बिल्कुल अलग लग रही थी। घर की छत, दूर तक फैले पहाड़, valley में टिमटिमाती lights और ऊपर खुला हुआ sky।

हम दोनों carpet पर लेट गए।

कंबल हमारे ऊपर था। हवा ठंडी थी, लेकिन उसमें एक ऐसी साफ़-सुथरी ख़ुशबू थी जो Delhi में कभी महसूस नहीं होती थी। दूर किसी dog की आवाज़ आयी और फिर सब कुछ वापस शांत हो गया।

Ananya मेरे पास लेटी थी। पहले थोड़ी दूरी पर। फिर वह धीरे-धीरे मेरे करीब खिसक आयी।

कुछ seconds तक हम दोनों stars देखते रहे।

“तुम यहाँ पहले भी ऐसे लेटते थे?” उसने पूछा।

“हाँ।”

“अकेले?”

“Mostly।”

“किसी को साथ नहीं लाए?”

मैं उसकी तरफ़ मुड़ा।

“तुम बहुत interested हो history में।”

“Research।”

“Wrong department।”

“Answer।”

“नहीं।”

“कभी नहीं?”

“कभी नहीं।”

वह कुछ seconds तक मुझे देखती रही।

फिर वापस sky की तरफ़ देखने लगी।

“Good।”

“क्यों?”

“बस।”

मैं मुस्कुराया।

कुछ देर बाद उसने अपना हाथ कंबल के भीतर मेरी तरफ़ बढ़ाया। उसकी उँगलियाँ मेरी उँगलियों से छुईं। मैंने उसका हाथ पकड़ लिया।

उसने मेरी तरफ़ देखा।

फिर अचानक थोड़ा आगे झुककर मुझे kiss कर दिया।

बहुत हल्के से।

जैसे वह खुद भी देखना चाहती हो कि मैं पीछे हटता हूँ या नहीं।

मैं पीछे नहीं हटा।

मैंने उसे वापस kiss किया।

पहले उस kiss में बहुत सारी झिझक थी। फिर जैसे पिछले तीन महीनों की दूरी धीरे-धीरे पिघलने लगी। उसके हाथ मेरी shirt पर आ गए। मैंने उसकी कमर पर हाथ रखा और उसे अपने करीब खींच लिया।

उसके गालों की नरमी मेरी हथेलियों के नीचे थी। उसके बाल मेरे चेहरे को छू रहे थे। उसकी साँसें बदल रही थीं और मैं उन बदलावों को सुन नहीं, महसूस कर रहा था।

हम दोनों के बीच के फासले धीरे-धीरे कम होते गए।

इतने कम कि कुछ कहने की ज़रूरत नहीं रही।

कंबल के भीतर पहाड़ी रात की ठंड थी, लेकिन हमारे बीच एक अलग गर्माहट बन चुकी थी। वह गर्माहट जिसकी तड़प में मैं पिछले तीन महीनों से जी रहा था। शायद Ananya भी अपने तरीके से उसी तड़प से गुज़री थी। उसने कुछ कहा नहीं, लेकिन उसके हाथों की पकड़, मेरे पास लौटकर आने का तरीका और हर बार मेरी आँखों में देखने की उसकी आदत बहुत कुछ कह रही थी।

उस रात हमने किसी बात को define नहीं किया।

हमने सिर्फ़ एक-दूसरे को महसूस किया।

एक-दूसरे के करीब आते हुए भी कहीं भीतर एक सुकून था और एक घबराहट भी। सुकून इस बात का कि वह सच में मेरे पास थी। घबराहट इस बात की कि सुबह के बाद क्या होगा, Japan के बाद क्या होगा, इन चार दिनों के बाद क्या बचेगा।

लेकिन उस moment में मैंने खुद को रोकना छोड़ दिया।

मैंने खुद को उसके पास रहने दिया।

और हम दोनों उस कंबल के भीतर, उन तारों के नीचे, धीरे-धीरे एक-दूसरे में खोते गए।

रात कब बीती, पता नहीं चला।

अगली सुबह हल्की-हल्की रोशनी के साथ मेरी आँख खुली।

कुछ seconds तक मुझे समझ नहीं आया कि मैं कहाँ हूँ। फिर मैंने महसूस किया—Ananya मेरे पास सिमटी हुई थी। कंबल हमारे ऊपर था। उसका चेहरा मेरे shoulder के पास था और उसकी साँसें मेरी गर्दन को छू रही थीं।

मैं कुछ देर उसे देखता रहा।

सोते हुए Ananya बहुत अलग लगती थी। दिन में वह हर जगह अपना कोई न कोई हिस्सा छोड़ती हुई चलती थी—हँसी, बातें, questions, छोटी-छोटी observations। लेकिन सोते हुए उसके चेहरे पर एक ऐसी शांति होती थी, जिसे शायद वह जागते हुए किसी को नहीं दिखाती थी।

मैंने धीरे से उठने की कोशिश की।

लेकिन मेरी हलचल से उसकी आँखें खुल गईं।

“कहाँ जा रहे हो?” उसने आधी नींद में पूछा।

“नीचे।”

“क्यों?”

“कपड़े पहनने हैं।”

उसने मेरी shirt पकड़ ली।

“अभी?”

“हाँ।”

“इतनी जल्दी?”

“सुबह हो गई है।”

“तो होने दो।”

मैं हँस पड़ा।

वह फिर मेरे करीब आ गयी और मेरे गाल पर kiss किया। फिर दूसरे गाल पर। उसकी आँखें अब भी पूरी तरह खुली नहीं थीं।

“आज Bir चलना है,” मैंने धीरे से कहा।

“चलेंगे।”

“Ready होना पड़ेगा।”

“हो जाऊँगी।”

“Ananya।”

“क्या?”

“तुम्हारा मन है भी जाने का?”

उसने आँखें खोलकर मुझे देखा।

“तुम्हारा?”

मैंने कुछ नहीं कहा।

वह हल्का-सा मुस्कुरायी।

“फिर अभी मत जाओ।”

उसकी आवाज़ बहुत धीमी थी। उसमें कोई demand नहीं थी। बस एक इच्छा थी।

और मेरे भीतर कल रात से जो कुछ भी बचा था, वह फिर उसकी तरफ़ बह गया।

सुबह की ठंडक, आधी खुली आँखें, कंबल की गर्माहट और उसकी हथेलियों की नरमी—इन सबके बीच समय फिर कहीं पीछे छूट गया।

हम वापस उसी closeness में चले गए, इस बार बिना उस पहली झिझक के। जैसे रात ने हमें एक-दूसरे के शरीर से ज़्यादा एक-दूसरे की चुप्पियों से परिचित कर दिया हो।

काफ़ी देर बाद जब मैं नीचे चाय बनाने गया तो बाहर पूरी तरह सुबह हो चुकी थी।

रसोई में पानी चढ़ाते हुए मुझे अचानक हँसी आ गयी।

मैंने खुद से पूछा—मैं यहाँ क्या कर रहा हूँ?

फिर ऊपर से Ananya की आवाज़ आयी।

“Sugandh, चाय में sugar कम रखना।”

मैंने बिना ऊपर देखे कहा,

“तुम्हारी black coffee कहाँ गयी?”

“आज चाय पीने का मन है।”

“इतनी जल्दी बदल गयीं?”

“तुम्हें नहीं बदलना?”

मैंने चाय के दो कप बनाए।

ऊपर पहुँचा तो Ananya ready होने की कोशिश कर रही थी। उसके बाल अब भी पूरी तरह नहीं सुलझे थे। उसने एक हाथ में कप लिया और दूसरे से अपने बाल बाँधने लगी।

“तुम्हारे बाल तुम्हारी बात नहीं मानते,” मैंने कहा।

“तुम्हारे मानते हैं?”

“मेरे बाल मेरे employee हैं।”

“बहुत खराब joke था।”

“फिर भी तुम हँसी।”

“तुम्हें खुश करने के लिए।”

“Thank you।”

हम दोनों ने चाय पी।

फिर नाश्ते के लिए नीचे निकले। रास्ते में Ananya ने एक छोटी-सी दुकान के बाहर रखे woollen caps देखे और रुक गयी। उसने दो caps उठाए, दोनों पहनकर mirror में खुद को देखा और फिर मेरी तरफ़ मुड़ी।

“कौन-सा?”

“दायाँ।”

“दायाँ कौन-सा है?”

“जो अभी तुम्हारे सिर पर नहीं है।”

“तुम्हारे साथ shopping करना impossible है।”

“तुमने फिर भी किया।”

उसने cap वापस रखा, लेकिन जाते-जाते एक छोटा-सा bracelet खरीद लिया। वही आदत—जिस चीज़ को पहले नहीं खरीदना था, अंत में वही खरीदना।

हमने नाश्ता किया। उसने आलू के पराँठे का आधा हिस्सा मुझे दे दिया क्योंकि उसके हिसाब से वह पूरा नहीं खा सकती थी। फिर मेरे plate से अचार उठा लिया क्योंकि उसके हिसाब से उसका वाला अच्छा नहीं था।

मैं उसे देखता रहा।

“क्या?”

“कुछ नहीं।”

“फिर वही?”

“तुम अपना अचार बदलती रहती हो।”

“तुम मेरी plate notice कर रहे हो?”

“मैं तुम्हें notice करता हूँ।”

यह बात मेरे मुँह से बिना सोचे निकल गयी।

वह कुछ seconds चुप रही।

फिर उसने अपनी नज़र plate पर कर ली।

“बहुत देर से?”

मैंने सच बोलने की कोशिश की।

“शायद।”

नाश्ते के बाद हम Bir के लिए निकल गए।

रास्ते भर Ananya window से बाहर देखती रही। कभी किसी पहाड़ी पर बने छोटे-से घर को, कभी सड़क किनारे खड़े पेड़ों को, कभी अचानक खुल जाने वाली valley को। बीच-बीच में वह phone निकालकर photos लेती और फिर मुझे दिखाती।

“ये अच्छा है?”

“तुमने अभी तीन photos उसी tree की ली हैं।”

“तीनों अलग हैं।”

“Tree same है।”

“तुम्हें art की समझ नहीं।”

“मुझे तुम समझ आती हो।”

“ये उससे भी ज़्यादा doubtful है।”

Bir पहुँचते ही उसकी excitement साफ़ दिखाई देने लगी। Paragliding की booking हो रही थी और वह लगातार instructions पढ़ रही थी, जैसे उसे खुद pilot बनना हो।

“इतना nervous मत हो,” मैंने कहा।

“मैं nervous नहीं हूँ।”

“तुमने form तीन बार पढ़ा।”

“मैं responsible हूँ।”

“तुम्हारे हाथ ठंडे क्यों हैं?”

“Weather।”

“Obviously।”

उसने मुझे घूरा।

फिर मेरा camera माँग लिया।

“मेरी photo लो।”

“कितनी?”

“अच्छी।”

“ये कोई number नहीं है।”

“जब तक अच्छी न हो।”

मैंने उसकी कई photos लीं। कभी वह mountain की तरफ़ देख रही थी, कभी हवा उसके बालों को उड़ा रही थी, कभी वह camera की तरफ़ सीधे देखती और फिर आख़िरी moment पर हँस देती।

Ananya को photos खिंचवाने का बड़ा शौक था, लेकिन उसे posed photos पसंद नहीं थीं। वह चाहती थी कि photo में उसे पता ही न हो कि कोई उसे देख रहा है।

शायद इसी वजह से वह camera देखते ही बदल जाती थी।

और शायद इसी वजह से मुझे उसका वह चेहरा सबसे ज़्यादा पसंद था, जो photo में आने की कोशिश नहीं करता था।

उसने camera मेरे हाथ से लिया।

“अब तुम्हारी।”

“नहीं।”

“क्यों?”

“मैं photogenic नहीं हूँ।”

“तुम्हें किसने बताया?”

“मैंने।”

“तुम्हारी राय valid नहीं है।”

उसने मुझे अपने पास खींच लिया और हम दोनों ने एक selfie ली। पहली में हवा ने उसके बाल मेरे चेहरे पर ला दिए। दूसरी में मैं आँखें बन्द किए था। तीसरी में वह हँस रही थी और मैं उसे देख रहा था।

उसने तीसरी photo रख ली।

“इसमें तुम मुझे देख रहे हो।”

“तो?”

“कुछ नहीं।”

लेकिन उसने उसे delete नहीं किया।

Paragliding से पहले हम उसी पहाड़ी की तरफ़ चले गए जहाँ मैं कुछ महीने पहले अकेला बैठा था।

वही ढलान। वही हवा। वही दूर तक फैली valley। कुछ जगहों पर छोटे-छोटे wildflowers उगे हुए थे।

Ananya उनमें से एक के पास बैठ गयी।

“Cute है।”

उसने एक छोटा-सा फूल तोड़ा और मेरी तरफ़ बढ़ा दिया।

मैंने फूल उसकी हथेली से लिया।

और अचानक मुझे वह पुराना दिन याद आ गया।

दो महीने पहले मैं इसी पहाड़ी पर अकेला बैठा था। Ananya मेरे सामने नहीं थी। मुझसे दूर थी। फिर भी जहाँ भी जाता, उसका ख़याल मेरे साथ चला आता था।

उस दिन मैंने घास के बीच से ऐसा ही एक फूल उठाया था। उसकी photo लेकर Instagram story पर एक गाना लगाया था—किसी के साथ घर बसाने जैसा, किसी के साथ अपनी दुनिया जीने जैसा।

तब वह सिर्फ़ एक गाना था।

कम-से-कम मैंने खुद को यही समझाया था।

आज Ananya मेरे सामने बैठी थी। हवा उसके बाल उड़ा रही थी। उसने फूल मेरी हथेली में रख दिया था और खुद valley की तरफ़ देख रही थी।

मेरे भीतर एक thought आया।

अगर कभी मुझे किसी के साथ घर बसाना हुआ…

तो शायद वह Ananya होगी।

मैंने तुरंत उस thought को रोकना चाहा।

चार दिन।

Japan।

Future नहीं।

लेकिन thoughts rules नहीं मानते।

दिल तो और भी कम मानता है।

मैं उसके पास बैठ गया। उसने बिना कुछ पूछे अपना सिर मेरे shoulder पर रख दिया। मैंने अपनी बाँह उसके चारों ओर रख दी।

करीब दस minutes तक हमने कुछ नहीं कहा।

मैं बस उसे देखता रहा।

उसके बालों में हवा अटक रही थी। उसकी उँगलियाँ घास के छोटे-छोटे तिनकों को छू रही थीं। कभी वह सामने देखती, कभी आँखें बन्द कर लेती। वह इस moment को अपने भीतर रख रही थी, जैसे कोई चीज़ जिसे बाद में अकेले खोलकर देखना हो।

मुझे उन सभी दिनों की याद आने लगी जब Ananya मेरे सामने नहीं थी।

उसका खाली desk।

उसका block किया हुआ number।

रात को phone खोलकर उसकी profile देखना।

बेवजह उस सड़क से गुजरना जहाँ कभी उसे देखा था।

Bir पर अकेले बैठकर यह सोचना कि अगर वह मेरे साथ होती तो क्या कहती, क्या देखती, किस बात पर हँसती।

मैं जहाँ भी गया, वह किसी न किसी रूप में मेरे साथ थी।

और आज वह सच में मेरे पास बैठी थी।

मैंने उसे थोड़ा और कसकर थाम लिया।

उसने आँखें खोले बिना पूछा,

“क्या हुआ?”

“कुछ नहीं।”

“तुम्हारा कुछ नहीं वाला चेहरा बहुत loud है।”

मैं हल्का-सा हँसा।

“बस तुम्हें देख रहा हूँ।”

“क्यों?”

“क्योंकि तुम यहाँ हो।”

वह चुप रही।

फिर बहुत धीरे से बोली,

“मैं भी हूँ।”

उसके बाद हम paragliding के लिए चले गए।

Ananya पहले nervous थी, लेकिन उसके चेहरे पर excitement उससे कहीं ज़्यादा थी। Harness पहनते समय वह लगातार instructions दोहरा रही थी। Instructor ने कुछ समझाया तो उसने इतनी गंभीरता से सिर हिलाया जैसे किसी important meeting में बैठी हो।

“Scared?” मैंने आख़िरी बार पूछा।

“नहीं।”

“झूठ।”

“तुम्हें बहुत confidence है।”

“तुम्हारे हाथ देखे हैं।”

वह हँसी।

फिर दौड़ने लगी।

अगले ही पल जमीन उसके पैरों के नीचे से चली गयी।

Ananya हवा में थी।

पहले उसने डर के कारण चीखा। फिर कुछ seconds बाद उसकी हँसी नीचे तक आने लगी। वह हवा में ऊपर उठती गयी। उसके नीचे पूरा valley था, सामने mountains थे और उसके चेहरे पर ऐसी खुशी थी, जो मैंने शायद पहले कभी नहीं देखी थी।

मैं उसे देखता रहा।

और उसके पीछे छुपी हुई उस खुशी का राज जानना चाहता था।

क्या वह Bir था?

क्या वह Dharamshala था?

क्या वह कल की drive थी?

क्या वह रात थी?

क्या वह हमारे साथ सोना था?

क्या वह मुझे चाहना था?

या शायद वह सिर्फ़ हवा में उड़ रही थी और उसे किसी वजह की ज़रूरत ही नहीं थी।

लेकिन मेरे भीतर का selfish हिस्सा चाहता था कि उसकी खुशी का कारण मैं हूँ।

कभी-कभी जब हम किसी को बहुत चाहते हैं, तो हमें उसकी खुशी सिर्फ़ चाहिए नहीं होती। हम उसमें अपना थोड़ा-सा हिस्सा भी ढूँढ़ने लगते हैं।

Ananya हवा में घूम रही थी। मैं नीचे खड़ा उसे देख रहा था।

उस moment मुझे समझ आया कि चार दिन बहुत कम थे।

बहुत कम।

लेकिन शायद ज़िन्दगी हमेशा हमें उतना समय नहीं देती जितना हम चाहते हैं। कभी-कभी वह बस इतना समय देती है कि हम समझ सकें—हम खोना क्या नहीं चाहते।

जब Ananya नीचे उतरी तो उसके बाल पूरी तरह बिखरे हुए थे। उसकी आँखें चमक रही थीं। वह कुछ बोलते-बोलते हँस रही थी और फिर अचानक मेरी तरफ़ आकर मुझसे लिपट गयी।

“मैं उड़ गयी,” उसने मेरे shoulder पर चेहरा छिपाकर कहा।

“मैंने देखा।”

“बहुत ऊपर।”

“हाँ।”

“तुम डर गए थे?”

“तुम्हारे लिए?”

“हाँ।”

मैंने उसकी पीठ पर हाथ रखा।

“थोड़ा।”

वह मुझसे अलग हुई।

“और अब?”

मैंने उसके चेहरे को देखा।

“अब तुम नीचे हो।”

“बस?”

मैं मुस्कुराया।

“अब तुम फिर से बहुत बोलोगी।”

वह हँसी।

मैं उसकी हँसी देखता रहा।

मुझे नहीं पता था कि चार दिन के बाद क्या होगा। Japan की flight थी। Tokyo था। चार साल थे। हमारी अपनी-अपनी ज़िन्दगियाँ थीं। कोई clarity नहीं थी।

लेकिन उस दिन मेरे दिल और दिमाग़ एक-दूसरे से लड़ नहीं रहे थे।

दोनों चुप थे।

दोनों Ananya को देख रहे थे।

और मैं पहली बार अपने भीतर उस डर को जगह दे रहा था, जिससे इतने समय से भागता रहा था—

कि कहीं चार साल बाद लौटूँ और Ananya की इस हँसी में मेरा नाम न बचे।

फिर भी, उस moment में मैंने उससे कोई promise नहीं माँगा।

मैंने उसके हाथ में अपना हाथ रखा।

वह मेरे साथ चलने लगी।

और हम दोनों उस पहाड़ी से नीचे उतर गए।


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Author: Onesha

She is the funny one! Has flair for drama, loves to write when happy! You might hate her first story, but maybe you’ll like the next. She is the master of words, but believes actions speak louder than words. 1sha Rastogi, founder of 1shablog.com.

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