Part 11

Weekend कब ख़त्म हुआ, पता ही नहीं चला।

Friday की उस रात के बाद मैंने कई बार खुद को समझाया कि मैं बेवजह ज़्यादा सोच रहा हूँ। Office parties में लोग पी लेते हैं, बहस कर लेते हैं, emotional हो जाते हैं, फिर Monday आते-आते सब कुछ पहले जैसा हो जाता है। शायद इस बार भी वही होना था।

लेकिन Monday पहले जैसा नहीं था।

या शायद…

Monday वही था।

बदल कुछ और गया था।

मैं हमेशा की तरह थोड़ा जल्दी office पहुँच गया। Bag chair पर रखा, laptop निकाला और system on होने का इंतज़ार करने लगा। Outlook खुलने में हमेशा की तरह थोड़ा वक्त लग रहा था। पता नहीं क्यों, screen की तरफ देखने के बजाय मेरी नज़र अनायास सामने चली गई।

Aisle के उस पार…

वो अपनी desk पर बैठी थी।

बस एक पल के लिए देखा और फिर वापस screen पर देखने लगा। कोई खास बात नहीं थी। वही coffee का mug, वही खुले बाल, वही laptop, वही Monday morning की व्यस्तता। जैसे Friday की रात कभी हुई ही नहीं।

पहली meeting शुरू हुई। Project timeline, client escalation, deadlines… वही रोज़ वाली बातें। मैं discussion में था, फिर भी बीच-बीच में जाने क्यों नज़र उठ जाती। कभी वो किसी से बात कर रही होती, कभी monitor पर झुकी होती, कभी किसी mail पर हँस देती। मैं हर बार खुद को वापस presentation पर ले आता।

Lunch तक आते-आते मुझे खुद भी एहसास नहीं था कि मैंने ऐसा कितनी बार किया।

Lunch के लिए सब उठे। Samyak ने दूर से आवाज़ लगाई,

“चल?”

“तू चल, मैं आता हूँ।”

उसने कंधे उचकाए और बाकी लोगों के साथ निकल गया।

मैंने laptop lock किया और bottle उठाने लगा कि तभी सामने से Ananya भी उठी। उसने desk पर रखा mug उठाया और मेरी तरफ देखकर मुस्कुराई।

“चल रहे हो?”

“हाँ… बस आता हूँ।”

“Okay.”

बस इतना ही।

वो आगे बढ़ गई।

मैं भी उसके कुछ कदम पीछे चल पड़ा।

Cafeteria तक के उस छोटे-से रास्ते में हमने एक-दूसरे से कुछ नहीं कहा। आसपास लोग weekend, IPL और appraisal की बातें कर रहे थे। हम दोनों बस उनके साथ चल रहे थे, जैसे हमेशा चलते आए हों।

Lunch table पर हमेशा की तरह शोर था। कोई paneer की शिकायत कर रहा था, कोई diet की, कोई HR की। Ananya सबसे बात कर रही थी। कभी Samyak से उलझ जाती, कभी सामने बैठे intern की plate से french fries उठा लेती, कभी किसी की बात पर ज़ोर से हँस पड़ती।

मैं ज़्यादा बोल नहीं रहा था।

लेकिन पहली बार…

मैं उसे सुन रहा था।

शायद Friday से पहले भी वो ऐसी ही थी।

बस मैंने कभी ध्यान नहीं दिया था।

शाम तक काम में दिन निकल गया। घर लौटते हुए मैं Car की खिड़की से बाहर देख रहा था। Traffic वही था, सड़कें वही थीं, शहर भी वही था।

बस एक बात अजीब थी।

पूरे दिन में ऐसा एक भी पल नहीं आया था जब मैंने जान-बूझकर Ananya के बारे में सोचा हो।

और फिर भी…

पता नहीं कैसे…

पूरा दिन उसके आसपास ही बीत गया था।

उस रात सोने से पहले अचानक यही ख़याल आया।

क्या वो पहले भी ऐसी ही थी…

या मैं पहली बार उसे देख रहा था?

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