Part 4

शायद इसीलिए… जब Office में पहली बार Kusha से बात हुई… तो मुझे लगा ही नहीं था कि वो मेरी ज़िंदगी का इतना लंबा chapter बन जाएगी। Kusha हमसे लगभग दो साल senior थी। पहली नज़र में ही समझ आ जाता था कि वो उन लोगों में से नहीं है जो हर किसी से दोस्ती कर लेते हैं। ना वो unnecessarily smile करती थी। ना introductions में interest लेती थी। ना Office politics में। उसकी दुनिया बहुत छोटी थी। अपनी team। अपना laptop। और हर दो घंटे बाद एक cigarette।

मैं cigarette नहीं पीता था। कभी आदत बनी ही नहीं। लेकिन Office के smokers’ zone में जाना मुझे अच्छा लगता था। वजह cigarette नहीं थी। Conversations थीं। Office की असली कहानियाँ conference room में नहीं… Smoke breaks पर सुनने को मिलती हैं।

एक शाम मैं बस वहाँ खड़ा चाय पी रहा था। Kusha cigarette जलाने की कोशिश कर रही थी। Lighter बार-बार बुझ रहा था।

“Milega?” उसने बिना मेरी तरफ देखे पूछा।
“मेरे पास lighter नहीं है।” उसने पहली बार मेरी तरफ देखा।
“तुम smoke नहीं करते?”
“नहीं।”
“फिर यहाँ क्या कर रहे हो?”
“मुझे लोग interesting लगते हैं।” वो हल्की सी हँसी।
“पहली बार किसी ने smokers’ zone को zoo बोला है।”
“मैंने zoo नहीं बोला।”
“मतलब वही था।”
“मैंने बस polite version बोला।” उसने cigarette वापस packet में रख दी।
“चाय पिलाओगे?” मैंने कंधे उचका दिए।
“चलो।”

उस दिन हमने cigarette से ज़्यादा चाय पी। और चाय से ज़्यादा बातें कीं। Kusha उन लोगों में से थी जो पहले दस मिनट तक सिर्फ़ तुम्हें observe करते हैं। फिर अचानक कोई ऐसा सवाल पूछ लेते हैं जिसका तुम्हारे पास rehearsed जवाब नहीं होता।

“Relationship में हो?” उसने सीधा पूछा।
“नहीं।”
“Single?”
“Mood के हिसाब से।” वो ज़ोर से हँसी।
“अच्छा जवाब था।”
“तुम?”
“Emotionally unavailable.” उसने चाय का sip लिया।
जैसे ये कोई joke हो। उस वक़्त मुझे लगा वो मज़ाक कर रही है। बाद में समझ आया… सबसे सच्ची बातें लोग मज़ाक में ही बोलते हैं।

उसके बाद tea breaks routine बन गए। कभी cafeteria। कभी Office के बाहर वाली टपरी। कभी basement की parking। हम दोनों की दोस्ती अजीब थी। ना हम एक दूसरे के बारे में ज़्यादा पूछते थे। ना future discuss करते थे। ना expectations थी। बस… जब वक़्त मिलता… बैठ जाते। बातें कर लेते।

Office में हम लगभग अजनबी ही रहते। एक formal “Hi.” एक छोटी सी smile। बस। जैसे हम एक दूसरे को जानते ही न हों। और शायद… यही चीज़ उस relationship को आसान बना रही थी। उसे कुछ चाहिए नहीं था। मुझे कुछ देना नहीं था। बीच में कोई promise नहीं था। कोई label नहीं था। सिर्फ़ वक़्त था। और थोड़ी सी तन्हाई।

Ananya से मेरी तब भी कोई ख़ास बात नहीं होती थी। कभी group lunch। कभी किसी workshop में। कभी lift। बस। लेकिन Office में उसके बारे में बातें कम नहीं हुई थीं। Mayank का नाम पहली बार मैंने भी तभी सुना।

“यार वो Mayank फिर Ananya के desk पे था।”
“क्या scene है?”
“Scene कुछ नहीं।”
“तू देख लेना।” Office की gossip का सबसे बड़ा problem ये होता है… हर कहानी किसी और के नज़रिए से शुरू होती है। और सच तक पहुँचते-पहुँचते उसका चेहरा बदल जाता है। मैं इन बातों में कभी पड़ता नहीं था। ना curiosity थी। ना वक़्त। या शायद… मैं खुद को यही समझा रहा था।

एक रात Kusha और मैं Office के बाहर टपरी पर बैठे थे। उसके हाथ में cigarette थी। मेरे हाथ में चाय। काफ़ी देर तक हम दोनों चुप बैठे रहे। अचानक उसने पूछा,

“Mayank को जानते हो?”
“नाम सुना है।”

“अच्छा लड़का है?”
“Mmm.”
“मैं उससे प्यार करती थी।”

उसने ये बात बिल्कुल सीधे तरीक़े से कही। जैसे वो किसी और की कहानी सुना रही हो। मैंने उसकी तरफ मुड़कर देखा। पहली बार। ध्यान से। वो सामने देख रही थी। ना आँखों में आँसू। ना आवाज़ में दर्द। ना शिकायत, ना गुस्सा… सिर्फ एक अजीब सी थकान।बस… थकान। बहुत गहरी थकान। कभी-कभी इंसान रोता नहीं। बस थक जाता है। और मुझे लगा… Kusha शायद बहुत पहले रो चुकी थी। अब सिर्फ़ थकना बाक़ी था।

मैंने धीरे से पूछा, “क्या हुआ था?” उसने इतनी ही बात कही, “Cheat किया।” फिर वो मुस्कुरा दी—वैसे ही… जैसे ये बात उसे अब फ़र्क़ ही नहीं पड़ती। लेकिन मुझे उसकी मुस्कान पर भरोसा नहीं हुआ। दर्द जब बहुत पुराना हो जाता है… तो आँसू नहीं आते, बस आदमी उसके साथ जीना सीख लेता है।

कभी-कभी वो रात को मेरे flat आ जाती। Doorbell बजती। मैं दरवाज़ा खोलता और बिना कुछ कहे वो सीधा अंदर आ जाती, जैसे उसे permission की ज़रूरत ही ना हो।
“Beer है?” पहला सवाल अक्सर यही होता। मैं fridge की तरफ इशारा कर देता। वो खुद निकाल लेती। कभी music चलता, कभी TV, तो कभी कुछ भी नहीं। हम दोनों अजीब तरह की ख़ामोशी में comfortable थे—एक ऐसी ख़ामोशी… जिसमें explanation की ज़रूरत नहीं पड़ती। रात बढ़ती, conversations छोटी होती जातीं और distances और छोटी।

और फिर… वो हमेशा की तरह मेरी बाहों में आ कर लेट जाती। उसके बाल मेरे कंधे पर बिखर जाते और दो जिस्म एक हो जाते। मैं उसकी heartbeat सुन सकता था। हम कभी एक-दूसरे से कुछ कहते नहीं थे, हम बस… मिल लेते थे। उसने कभी मुझसे commitment नहीं मांगा। मैंने कभी उससे promises नहीं किए और शायद इसी वजह से… हम दोनों एक-दूसरे के साथ इतने आराम से थे।

सुबह होती, वो मेरी shirt पहन कर kitchen में चाय बना लेती। मैं उसे देखकर मज़ाक करता, “Office में भी इसी shirt में आ जाना।” वो हंसती, “CCTV footage viral करवानी है क्या?” फिर हम दोनों अलग-अलग निकल जाते।

Office पहुँचते ही… जैसे पिछली रात हुई ही ना हो। उस वक्त मुझे लगता था… ज़िंदगी इसी का नाम है। दिन में corporate employee, रात में किसी की बाहों का सुकून। ना किसी से सवाल, ना किसी को हिसाब। मैं खुश था या शायद… मुझे लगता था कि मैं खुश हूँ। दोनों में बहुत फ़र्क़ होता है, लेकिन वो फ़र्क़ मुझे तब तक समझ नहीं आया था।

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Author: Onesha

She is the funny one! Has flair for drama, loves to write when happy! You might hate her first story, but maybe you’ll like the next. She is the master of words, but believes actions speak louder than words. 1sha Rastogi, founder of 1shablog.com.

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