Part 3
Poem खत्म हुई। Room में दो second की खामोशी छायी रही। फिर तालियां बजने लगीं। किसी ने “Nice!” कहा। किसी ने “Beautiful!” बोला। HR ने मुस्कुरा कर कहा, “That was lovely.” Ananya बस “Thank you” कहकर बैठ गई। जैसे उसने कोई ख़ास बात की ही ना हो।
मैं उसे देख रहा था। Poem याद नहीं रह गई थी। उसे सुनाने वाली लड़की रह गई थी।
सच कहूं… उस वक़्त मुझे poetry की ज़्यादा समझ नहीं थी। आज भी नहीं है। मैं उसकी rhyme नहीं समझा। ना उसके metaphors। लेकिन एक बात समझ आ गई थी। जिस लड़की ने ये लिखा है… उसने कभी किसी को पूरे दिल से चाहा था। और जिसने भी उसे छोड़ा… उसने सिर्फ़ एक इंसान नहीं खोया था। उसने किसी का यक़ीन तोड़ दिया था।
मुझे लगा… शायद इसी लिए उसने गुलाब लिखा। क्योंकि वक़्त के साथ लोगों के चेहरे धुंधले पड़ जाते हैं… लेकिन यादें… वो अपनी खुशबू संभाल कर रखती हैं।
उस वक़्त मुझे लगा… ये लड़की बहुत गहरी है। बाद में समझ आया… मैं उसके बारे में पहले दिन से ही assumptions बना रहा था। और उनमें से आधे भी सही नहीं थे।
Induction खत्म होते ही सब एक साथ बाहर निकले। किसी को ID card collect करना था। किसी को laptop। किसी को joining forms। Corporate दुनिया का पहला दिन हमेशा paperwork में ही निकल जाता है।
Lift के बाहर सब छोटे-छोटे groups में बात करने लगे। मैं आदत से मजबूर थोड़ा अलग खड़ा था। तभी पीछे से किसी ने कहा, “Poem अच्छी थी ना?”
मैंने मुड़कर देखा। एक लड़का था। Naam शायद Rohit। या Rohan। मुझे याद नहीं।
मैंने कंधे उचका दिए।
“हाँ… अलग थी।”
“यार, मुझे तो लगता है पक्का किसी ने इसका दिल तोड़ा है।”
मैं हंसा।
“Poetry सुनके इतना सब कैसे decide कर लिया?”
“वरना इतना दर्द कौन लिखता है?”
मैं कुछ बोला नहीं। बस एक बार Ananya की तरफ़ देखा। वह HR से बात करते-करते अचानक ज़ोर से हंस पड़ी। उसकी हंसी और उसकी poem… दोनों एक दूसरे से बिल्कुल उल्टे थे। एक में इतनी रोशनी। दूसरी में इतनी उदासी।
उस वक़्त मुझे लगा… इन दोनों में से असली Ananya कौनसी है? और शायद… वही पहली बार था… जब मुझे उसके बारे में जानने की curiosity हुई। प्यार नहीं। Attraction भी नहीं। बस curiosity। और curiosity… कभी-कभी प्यार से भी ज़्यादा खतरनाक होती है।
अगले कुछ हफ़्तों में training शुरू हो गई। सुबह biometric। फिर induction sessions। फिर Excel। फिर PowerPoint। फिर process trainings।
Corporate दुनिया धीरे-धीरे हम सबको एक ही mould में ढालने की कोशिश कर रही थी। बस एक इंसान था… जो उस mould में fit होने से मना कर रहा था। Ananya.
Office में उसकी entry कभी चुपचाप नहीं होती थी। पहले उसकी आवाज़ आती थी। फिर उसकी हंसी। और उसके बाद वो खुद।
कभी pantry में किसी से बात कर रही होती। कभी reception वाले भैया का नाम पूछकर उन्हें नाम से बुला रही होती। कभी housekeeping दीदी के साथ चाय पी रही होती। कभी किसी trainee की presentation बना रही होती।
उसे लोग याद रहते थे। Naam याद रहते थे। छोटी-छोटी बातें याद रहती थीं। मुझे ये talent कभी समझ नहीं आया। मैं लोगों के चेहरे याद रखता था। वह लोगों की कहानियाँ।
शायद इसी लिए… Office में हर किसी को लगता था कि वो उसकी दोस्त है। और शायद इसी लिए… हर दूसरा लड़का उसे पसंद करने लगा था।
नयी bike आई?
“Ananya, ride पे चलते हैं।
” नयी car ली? “
चाय पीने चलते हैं।
” Lunch? “साथ चलते हैं।
” Movie?
“Weekend free हो?”
मुझे कभी समझ नहीं आया… लड़के उसे impress करने की इतनी कोशिश क्यों करते थे। फिर एक दिन समझ आया। Ananya हर इंसान को ये एहसास करा देती थी… कि वो important है। और इंसान से ज़्यादा addictive चीज़ दुनिया में शायद कोई नहीं… जब कोई तुम्हें important महसूस कराए।
मैं कभी उस race में शामिल नहीं हुआ। ना उसे coffee के लिए पूछा। ना lunch। ना ride। ना movie।
सच कहूं… मैं उसे ignore भी नहीं कर रहा था। बस… मैं उसे देख रहा था। दूर से। जैसे कोई किताब bookshelf पर रखी हो। जिसे पढ़ने की जल्दी भी ना हो… और नज़र भी उसी पर टिकी रहे।
मैं उस race में इसलिए भी नहीं था… क्योंकि मेरी अपनी एक अलग ही race चल रही थी। College के आख़िरी दो सालों में मैंने जितनी मेहनत placement के लिए नहीं की थी… उससे ज़्यादा मेहनत लोगों ने मेरी image बनाने में कर दी थी।
किस लड़की के साथ देखा गया। किस party में गया। किसने propose किया। किसने मना किया। किसने हाँ की।
हर कहानी में मेरा नाम होता था। आधी सच। आधी झूठ। और बाकी लोगों की imagination।
शुरू-शुरू में मैं explain करता था। फिर एक दिन छोड़ दिया। Log वैसे भी वही मानते हैं जो उन्हें interesting लगता है। सच नहीं। Story. और मेरी story… सच से ज़्यादा entertaining थी।
सच ये था… मुझे attention पसंद थी। बहुत।
मैं अपना ख़याल रखता था। Gym. कपड़े। Perfume. Hair. Shoes. ये सब सिर्फ़ इसलिए नहीं कि मुझे fashion पसंद था। मुझे अच्छा लगता था जब लोग मुझे notice करते थे। और जब दुनिया बार-बार तुम्हें ये यक़ीन दिलाए कि तुम attractive हो… तो धीरे-धीरे तुम खुद भी उस बात पर यक़ीन करने लगते हो। मैं भी करने लगा था।
लड़कियों से बात करना मेरे लिए कभी मुश्किल नहीं रहा। कभी किसी को impress करने की planning नहीं करनी पड़ी। Conversations अपने आप शुरू हो जाती थीं। चाय से dinner। Dinner से drives। Drives से… can’t say. बाकी कहानी समझने के लिए intelligent होना ज़रूरी नहीं है।
उस वक़्त मुझे लगता था… Attachment over-rated है। Feelings complicated होती हैं। और complications से मुझे allergy थी।
मैं चीज़ों को नाम देने से बचता था। Relationship. Commitment. Future. ये सब शब्द मुझे unnecessarily heavy लगते थे। मैं बस present में जीता था। या कम से कम… मैं खुद से यही कहता था।
Office में मेरी और Ananya की बात-चीत अभी भी नाम-मात्र की थी। कभी lift में “Hi.” कभी cafeteria में “Seat खाली है?” कभी किसी presentation के बाद एक formal smile। बस।
लेकिन अजीब बात ये थी… उससे बात ना करने के बाद भी मुझे उसके बारे में काफ़ी कुछ पता चल जाता था। Corporate offices में gossip Wi-Fi से भी तेज़ travel करती है। और Ananya… Office की favourite topic थी।
“क्या मस्त लिखती है यार।” “कल HR के साथ lunch कर रही थी।” “Marketing वाले नए लड़के के साथ coffee पे गई थी।” “उसने सबका birthday याद रखा।” “क्या बिंदास लड़की है।”
हर दिन कोई ना कोई उसके बारे में कुछ ना कुछ बता ही देता। और हर दिन मैं ये pretend करता… कि मुझे कोई interest नहीं है।
एक दिन lunch के वक़्त हम सब एक ही table पर बैठे थे। लगभग आठ लोग होंगे। Discussion चल रहा था weekend plans का।
“कोई movie?” “कोई trek?” “कोई beer?”
सब अपनी-अपनी बोल रहे थे। तभी किसी ने Ananya से पूछा, “तुम्हारा plan?” “मैं घर जाऊंगी।” “बस?” “हाँ।” “Boyfriend से मिलने नहीं?”
पूरे table पर एकदम से शोर मच गया। “किसका boyfriend?” “कब बना?” “किसने बताया?”
Ananya इतनी ज़ोर से हंसी कि पानी पीते-पीते उसे खांसी आ गई। “तुम लोग भी ना…” उसने bottle table पर रखी। “मैं सिर्फ़ घर जा रही हूँ।” “क्यों?” “Mummy ने बोला है।”
पूरा table फिर हंस पड़ा। किसी ने मज़ाक में कहा, “यार… इसकी mummy हम सबसे ज़्यादा possessive निकलीं।”
Ananya ने आँखें घुमाईं। “तुम लोगों को लगता है दुनिया में हर लड़की की life का centre boyfriend ही होता है।”
एक second की खामोशी हुई। फिर उसने chips का packet उठाया। “और वैसे भी…” “मैं किसी को इतनी importance देती ही नहीं।”
उसने बिल्कुल casually कहा। जैसे कोई बहुत छोटी बात हो।
सब फिर किसी और topic पर चले गए। लेकिन पता नहीं क्यों… उसकी वो एक line मेरे दिमाग़ में अटक गई। “मैं किसी को इतनी importance देती ही नहीं।”
उस वक़्त मुझे लगा… या तो ये झूठ बोल रही है। या फिर… ये लड़की वैसे बिल्कुल नहीं है जैसी दिखती है।
मुझे तब भी नहीं पता था… कि दोनों बातें एक साथ भी सच हो सकती हैं।
उस दिन के बाद मैंने उसे थोड़ा और observe करना शुरू किया। बातें नहीं। बस observe.
वह जब हंसती थी… तो आँखें पहले मुस्कुराती थीं। जब गुस्सा होती… तो बिल्कुल चुप हो जाती। और जब किसी की बात ध्यान से सुनती… तो अपनी chai भूल जाती थी।
मुझे लोगों की आदतें याद रहती थीं। और उसकी आदतें… पता ही नहीं चला कब याद होने लगीं।
शायद… किसी को पसंद करना इसी तरह शुरू होता है। तुम्हें उसका चेहरा याद नहीं रहता। उसकी आदतें याद रहने लगती हैं।
लेकिन उस वक़्त… मैं इस feeling को नाम देने के mood में नहीं था। मैं सिर्फ़ देख रहा था। और ज़िन्दगी… चुपचाप मेरे साथ अपनी अगली चाल चल रही थी।

