Part 8

लोग कहते हैं… शहर बदलने से इंसान बदल जाता है। मुझे उस वक्त भी इस बात पर यकीन नहीं था, आज भी नहीं है। शहर सिर्फ address बदलते हैं। आदतें… वो suitcase में साथ चली आती हैं।

कंपनी ने onsite भेजने का offer दिया। Amsterdam. दो साल का project. Office में सब excited थे।

“मस्त life है भाई।”

“Europe!”

“Pictures भेजना।”

“मज़ा आ जाएगा।”

मैं भी मुस्कुरा रहा था। शायद मुझे भी लग रहा था… नया शहर मतलब नयी शुरुआत। लेकिन मैं एक बात भूल गया था। इंसान अपने आप से भागकर कहीं नहीं जा सकता। Amsterdam… तस्वीरों से भी ज़्यादा खूबसूरत था। Canals, पुरानी buildings, cycle चलाते हुए लोग, ठंडी हवा, शाम को beer, weekend trips और weekdays में काम।

दो साल… सच कहूँ तो मैंने अपनी ज़िन्दगी के सबसे आराम वाले दो साल वहीं गुज़ारे। नए दोस्त बने, नए लोग मिले, नए शहर देखे। कभी Paris, कभी Brussels, कभी Prague. Life अच्छी थी, या कम से कम… Instagram पर तो बहुत अच्छी लगती थी।

कभी-कभी रात को balcony में खड़ा होता… तो अचानक Kusha याद आ जाती। न उसका चेहरा, न उसकी आवाज़। बस… Cigarette की smell. अजीब बात थी, मैं कभी smoke नहीं करता था। फिर भी… उसकी याद हमेशा cigarette से ही आती थी। Memory भी कितनी selective होती है। इंसान भूल जाता है किसने क्या कहा था… लेकिन एक ख़ुशबू… दस साल बाद भी याद रहती है।

Ananya? उसकी याद कम आती थी। या शायद… मैं खुद को यही बोलता था। कभी-कभी LinkedIn पर उसका नाम दिख जाता, कभी किसी office वाले की photo में, कभी किसी farewell post में। मैं scroll कर देता। हम कभी friends नहीं बने। न call, न messages, न social media conversations. और मुझे लगता था… बस, कहानी ख़त्म।

एक Sunday दोपहर। मैं grocery लेकर apartment लौट रहा था। Phone vibrate हुआ। Unknown Indian number.

“Hello?”

“Mr. Amsterdam.”

मैं वहीं रुक गया।

“Kusha?”

“हाँ।”

“कैसे पहचाना?”

“मुझे और कौन Mr. Amsterdam बोलेगा।”

वह हँसी, बिल्कुल पहले की तरह।

“तुम यहाँ हो?”

“हाँ।”

“कब से?”

“तीन दिन से।”

“मुझे बताया क्यों नहीं?”

“अब बता दिया।”

मैं हँस दिया।

“कहाँ हो?”

“नीचे।”

“नीचे मतलब?”

“तुम्हारे apartment के नीचे।”

मैंने balcony से झाँककर देखा। वह सच में नीचे खड़ी थी। Black overcoat, हाथ जेब में। मुझे देखकर उसने हाथ हिला दिया। मैं बस उसे देखकर हँस पड़ा।

“कभी नहीं सुधरोगी।”

“सुधर गयी तो पहचानोगे कैसे?”

एक घंटे बाद हम दोनों canal के पास बैठे beer पी रहे थे, जैसे बीच के दो साल कभी गुज़रे ही न हों।

“तुम बदल गए हो।” उसने मुझे देखते हुए कहा।

“मोटा हो गया हूँ?”

“नहीं।”

“फिर?”

“पहले तुम लोगों को देखते थे।”

“अब शहर देखते हो।”

मैं हँस दिया।

“तुम नहीं बदलीं।”

“गलत।”

“बहुत बदल गयी हूँ।”

“कैसे?”

उसने beer की bottle घुमाते हुए कहा:”अब मैं cigarette भी कम पीती हूँ।”

“देखा? मैंने बोला था।”

“लोग बदलते हैं।”

मैं कुछ बोलता… उससे पहले उसने मेरी तरफ देखकर पूछा: “आज रात free हो?”

“शायद।”

“शायद नहीं। हो।”

रात को वह मेरे apartment नहीं आयी। उसने hotel लिया था। “यहीं आओ”, बस इतना message भेजा। मैं चला गया। Reception से ऊपर, room number, knock, दरवाज़ा खुला। और मुझे अचानक लगा… हम दोनों ने वक्त को सच में हरा दिया है। न awkwardness, न formalities, जैसे कल ही मिले हों।

“Beer?” उसने पूछा।

“मुझे लगा तुम wine पीने लगी होगी।”

“तुम मुझे इतना भी नहीं जानते।”

“मैं कब जानता था?”

“Fair point.”

हम दोनों हँस पड़े। रात धीरे-धीरे पुरानी rhythm में लौटने लगी। Music, beer, बातें, silences. और फिर… वह मेरे पास आकर बैठ गयी। इतना पास… कि हम दोनों के बीच सिर्फ़ साँसें रह गयी थीं। उसने मेरी तरफ देखा।

“Miss किया?”

“नहीं।”

“झूठ।”

“हाँ।”

“कितना?”

“मुझे cigarette की smell miss हुई।”

“तुमने मुझे नहीं।”

“मुझे तुम उसी में याद आती हो।”

उसने धीरे से मेरा हाथ पकड़ लिया।

“तुम वैसे ही अजीब हो।”

“मुझे पता है।”

उस रात… हम फिर एक-दूसरे के करीब आए, जैसे पहले आते थे। न promises, न questions, न future. सिर्फ़ वह लम्हा, सिर्फ़ हम।

उसका चेहरा मेरे इतना करीब था कि मैं उसकी साँसें महसूस कर सकता था। उसकी उंगलियाँ अब भी ठंडी थीं। उसकी आदत नहीं बदली थी, मेरी भी नहीं। सब कुछ… बिल्कुल पहले जैसा था। और शायद इसीलिए… इस बार कुछ अलग लगा।

मैं उसके साथ था, लेकिन मेरा दिमाग… कहीं और। पहली बार मैंने खुद को उस लम्हे से बाहर खड़ा देखा। जैसे मैं उसे जी नहीं रहा था… बस देख रहा था।

“कहाँ खो गए?” Kusha ने मेरी तरफ देखकर पूछा।

“कहीं नहीं।”

उसने मान लिया, मैं नहीं मान पाया।

उस रात पहली बार मुझे एहसास हुआ… Physical intimacy और emotional intimacy… एक ही चीज़ नहीं होती। किसी के इतने करीब होकर भी… उससे बहुत दूर महसूस किया जा सकता है।

कुछ देर हम दोनों चुप बैठे रहे।

वो मुझे छोड़ने नीचे तक आई। हाथ में beer की bottle लिए हम दोनों धीरे-धीरे साथ चलते रहे।

पता नहीं क्यों… एक सवाल दिमाग में बार-बार आ रहा था।

मैंने पूछा, “एक बात पूछूँ?”

उसने मेरी तरफ देखा। “पूछो।”

मैंने कुछ second उसे देखा।

“खुश हो?”

“मतलब?”

“शादी में।”

उसने बिना एक पल गंवाए कहा,

“बहुत।”

मैं उसकी आँखों में देखते रह गया।जवाब बहुत जल्दी आया था।इतना जल्दी…कि समझ नहीं आया वो सच था…या बहुत बार बोला हुआ जवाब।अगर वो इतनी खुश थी…तो Amsterdam अकेले क्यों आयी थी? और अगर खुश नहीं थी…तो मुझे क्यों नहीं बताया? मैंने सवाल वहीं छोड़ दिया। हर बात का जवाब पूछना ज़रूरी नहीं होता।कभी-कभी इंसान जवाब से ज़्यादा…उसके बाद आने वाली ख़ामोशी को समझ लेता है।वो हल्का सा मुस्कुराई।

“क्या सोच रहे हो?”

“कुछ नहीं।”

“झूठ।”

मैं हंस दिया।

“तुम्हें अब तक कोई मिली नहीं?”

“कैसे पता?”

“Stalk करती हूँ तुम्हें।”

मैं हँसा।

“अच्छा?”

“हाँ। Instagram… LinkedIn… Facebook… सब देख रखा है।”

“तुम free बहुत रहती हो।”

“बिल्कुल नहीं।”

“बस curiosity है।”

“Curiosity?”

“हाँ। देखना था कोई तुम्हें झेल भी रहा है या नहीं।”

मैं हँस पड़ा।

“मिला कुछ?”

उसने सिर हिलाया।

“नहीं। कोई नहीं है तुम्हारी life में।”

मैंने उसकी तरफ देखा।

“मैंने कब कहा मेरी life में कोई नहीं है?”

उसने भौंहें चढ़ाईं।

“अच्छा?”

“है कोई?”

मैंने beer का एक sip लिया।

“है।”

वो थोड़ा आगे झुक गई।

“कौन?”

मैं मुस्कुराया।

“दिल में।”

उसने आँखें घुमाईं।

“Oh please… मेरा नाम मत लेना।”

मैं हँस पड़ा।

“तुम होती…”

मैं एक पल के लिए रुका।

“…तो किसी और की wife कैसे होती?”

वो कुछ second तक मुझे देखती रही।

फिर ज़ोर से हँस पड़ी।

“अच्छा… possessive!”

“नहीं।”

“तो?”

“बस…”

मैंने कंधे उचकाए।

“Sharing पसंद नहीं।”

वो मुस्कुराई।

“चीज़ों की?”

“Hmm”

“या लोगों की?”

मैंने उसकी तरफ देखा।

“फ़र्क़ होता है?”

उसने बिना मुस्कुराए कहा,

“होता है।”

एक पल रुकी।

“बहुत।”

“चीज़ें replace हो जाती हैं…”

“…लोग नहीं।”

मैं कुछ नहीं बोला।

उसने मेरी ख़ामोशी देखी, beer की bottle रखी और मुस्कुरा कर बोली,

“देखा?”

“क्या?”

“तुम जितना दिखते हो…”

“…उतने simple नहीं हो।”

मैं हँसा।

“ये तारीफ़ थी?”

उसने कंधे उचकाए।

“पता नहीं…”

“Warning समझ लो।”

हम दोनों हँस पड़े।

कुछ देर तक हम दोनों चुप बैठे रहे।

Canal के पानी में lights टूट-टूट कर तैर रही थीं।

थोड़ी देर बाद उसने धीमे से पूछा,

“वैसे…”

“Hmmm?”

“मुझे लगता था…”

“…तुम कभी किसी के लिए रुकोगे ही नहीं।”

मैं मुस्कुरा दिया।

“मैं आज भी नहीं रुकता।”

उसने मेरी तरफ गौर से देखा।

“पक्का?”

“हाँ।”

वो हल्का सा हँसी।

“एक दिन रुक जाओगे।”

“किसने बोला?”

“Experience.”

मैं ज़ोर से हँस पड़ा।

“ये dialogue मेरा था।”

“अब मेरा है।”

“क्यों?”

“क्योंकि…”

वो मेरी तरफ देखकर मुस्कुराई।

“…मेरी predictions तुमसे better हैं।”

मैं सिर्फ मुस्कुरा दिया।उस वक़्त मुझे लगा…वो बस मज़ाक कर रही है।मुझे बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था…कि मेरी पूरी ज़िंदगी की सबसे सही prediction…वो यूँ ही, beer की bottle हाथ में लिए…Amsterdam की एक ठंडी शाम में करके जा रही थी.

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