Part 1

The Reunion

Club से बाहर निकलते वक़्त मैंने बस आदत से मजबूर होकर एक बार पीछे मुड़कर देखा था।

कभी-कभी ज़िन्दगी की सबसे बड़ी कहानियाँ किसी planning से नहीं, एक छोटी सी आदत से शुरू होती हैं।

और मेरी… उसी रात शुरू हुई।

Friday night था। Club अपने पूरे शोर पर था। Bass इतनी तेज़ थी कि लोगों की हंसी भी उसमें घुल जाती थी। Neon lights धुंध की पतली परत को चीरते हुए dance floor पर बिखर रही थीं। हर table पर एक अलग कहानी चल रही थी। कहीं birthday celebrate हो रहा था, कहीं promotion, और कहीं सिर्फ़ weekend।

मैं काफ़ी देर से वहाँ था। अब निकलने ही वाला था।

“Sugandh… कहाँ रह गया? चल भाई!”

Rukhsaar की आवाज़ पीछे से आई।

“मुझे पांच minute दे। तू parking में चल, मैं आया।”

उसने बिना कुछ पूछे हाथ हिला दिया और भीड़ में गायब हो गया।

मैं मुड़कर चलने ही वाला था… तब मैंने तुम्हें देखा।

पहले सिर्फ़ एक झलक। फिर दोबारा। और तीसरी बार देखते ही मेरे कदम वहीं रुक गए।

नहीं… ये तुम नहीं हो सकतीं। दस साल बाद भी कोई इतना वैसा कैसे लग सकता है? Club की रोशनी अक्सर चेहरों को धोखा दे देती है।

मैंने दोबारा देखा। इस बार ध्यान से।

तुम किसी बात पर ज़ोर से हंस रही थीं। वैसे ही… सिर हल्का सा पीछे ले जाकर। बाल कंधों पर बिखेर कर। जैसे तुम हमेशा हंसा करती थीं।

फिर तुम सामने खड़ी लड़की से गले मिलीं… और अपनी table की तरफ़ लौट गईं।

पांच… शायद छह लोग बैठे थे वहाँ। सब अपनी बातों में मशगूल थे।

सिर्फ़ मैं था… जो दस साल पीछे चला गया था।

वक़्त अजीब चीज़ होता है। कभी पूरी ज़िन्दगी बदल देता है। कभी दस साल गुज़र जाते हैं… और एक मुस्कान सब कुछ वापस ले आती है।

मैं खुद से लड़ रहा था। “जाने दे।” क्या ज़रूरत है? दस साल हो गए। ज़िन्दगी किसी का इंतज़ार नहीं करती। ना जाने उसकी ज़िन्दगी कितनी बदल चुकी होगी।

और मेरी? मैं भी तो वही नहीं रहा था।

मुझे मुड़कर चले जाना चाहिए था। लेकिन… इंसान अक्सर मोह से नहीं हारता। Curiosity से हारता है।

मुझे बस इतना देखना था… की मेरी याद सही थी या नहीं।

मैं धीरे-धीरे तुम्हारी table की तरफ़ बढ़ा। हर कदम पे लग रहा था जैसे पैर भारी होते जा रहे हों। Interview के पहले भी मैं इतना nervous कभी नहीं हुआ था।

Table के पास पहुँचकर मैंने सिर्फ़ एक बार तुम्हारी तरफ़ देखा।

उसी पल… तुम्हारी नज़र मेरी नज़र से मिली।

एक second। दो second।

तुम्हारी आँखों में पहले हैरानी आई। फिर पहचान। और उसके बाद… एक मुस्कान।

मैं बस “Hi” कहने ही वाला था… कि तुम कुर्सी से उठकर सीधा मेरे गले आ लगीं।

एक पल के लिए मेरे हाथ हवा में ही रह गए। शायद इसलिए क्योंकि मैंने उस hug की बिल्कुल उम्मीद नहीं की थी।

“Hi, Sugandh!”

तुम्हारी आवाज़… बिल्कुल वैसे ही थी।

“कैसे हो? Looonggg time! कहाँ गायब हो गए थे यार?”

दस साल। और तुम्हारे लिए जैसे वो सिर्फ़ कल की बात हो।

Log कहते हैं वक़्त सब कुछ बदल देता है। झूठ। कुछ खुशबुएँ वक़्त से तेज़ होती हैं।

जैसे ही तुम मेरे करीब आईं… एक बहुत पुरानी रात मेरी यादों के किसी बंद कमरे से बाहर आ गई।

तुम्हारे बालों की वही हल्की सी खुशबू। तुम्हारा बिना झिझक गले लग जाना। मेरा नाम तुम्हारे मुंह से सुनना।

Club धीरे-धीरे धुंधला पड़ने लगा। Music अब भी चल रहा था। Log अब भी नाच रहे थे।

लेकिन मेरा दिमाग़… दस साल पहले जा चुका था।

“तुम आजकल हो कहाँ?” तुमने पूछा।

मैं जवाब दे सकता था। Company का नाम। शहर का नाम। Designation।

लेकिन पता नहीं क्यों… मैंने बस तुम्हारे चेहरे पर गिरती एक लट को उँगलियों से हटा कर उसके कान के पीछे कर दिया।

उस पल मैंने ये भी नहीं सोचा… कि शायद मुझे ऐसा करना ही नहीं चाहिए था। दस साल… कभी-कभी हक़ भी छीन लेते हैं।

तुमने मुझे रोका नहीं। बस देखती रहीं। जैसे ये लम्हा तुम्हें भी उतना ही अजीब लग रहा हो जितना मुझे।

मैंने हंसी रोक कर कहा, “तुम्हारे दिल में।”

पूरा table हंस पड़ा। तुम भी।

और मैं समझ गया… दस साल सिर्फ़ calendar पर गुज़रे थे। हम दोनों के बीच नहीं।

“Phone दो।”

तुमने बिना permission मांगे मेरा phone ले लिया। Face unlock खोला। Contacts में अपना number save किया।

Ananya.

बस। ना surname। ना emoji। ना कोई explanation। जैसे हम कभी अजनबी थे ही नहीं।

Phone वापस देते हुए तुमने कहा, “कभी फ़ुरसत से मिलते हैं।”

मैंने सिर हिला दिया।

“मुझे भी तुमसे कुछ बात करनी थी।” “तुमने पहले क्यों नहीं की?”

मैं मुस्कुरा दिया। “क्योंकि मुझे लगता था… वक़्त मिल जाएगा।”

तुम कुछ पल तक मुझे देखती रहीं। फिर धीरे से मुस्कुरा दीं।

उस मुस्कान में क्या था… मैं उस वक़्त नहीं समझ पाया। शायद आज भी नहीं समझता।

उस रात club में मेरी मुलाक़ात Ananya से नहीं हुई थी। मेरी मुलाक़ात… अपनी ही एक पुरानी ज़िन्दगी से हुई थी।

एक ऐसी ज़िन्दगी… जिसे मैंने कब का पीछे छोड़ दिया था।

या… मैं सिर्फ़ ऐसा सोचता था।

क्योंकि मेरी कहानी उस रात से शुरू नहीं हुई थी। वो शुरू हुई थी… दस साल पहले।

एक corporate office के induction room में। जहाँ एक लड़की सबके सामने खड़ी होकर मुस्कुराते हुए बोली थी—

“Hi… I’m Ananya.”

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