Part 12
Tuesday की सुबह हमेशा Monday से थोड़ी आसान होती थी। Weekend की बातें धीरे-धीरे ख़त्म हो जाती थीं और पूरा office अपनी पुरानी रफ़्तार पकड़ लेता था। कोई आते ही laptop dock पर लगाता, कोई coffee लेकर अपनी seat तक पहुँचता, कोई lift से निकलते ही किसी को आवाज़ दे देता। कुछ ही देर में पूरा floor keyboards की आवाज़, Gmail notifications और अधूरी conversations से भर चुका था। Corporate offices की सुबह लगभग हर दिन एक जैसी होती है, लेकिन फिर भी हर सुबह अपने साथ कुछ नया लेकर आती है।
मैं हमेशा की तरह थोड़ा जल्दी पहुँच गया। Corner seat होने की वजह से मुझे सुबह का पूरा floor साफ़ दिखाई देता था। Bag नीचे रखा, laptop निकाला और system on होने का इंतज़ार करने लगा। Gmail खुलने में अभी कुछ seconds बाकी थे। यूँ ही आदत के मुताबिक मेरी नज़र पूरे floor पर घूम गई। पहली bay में अभी सिर्फ़ दो लोग बैठे थे। बाकी chairs खाली थीं। मैंने बिना ज़्यादा सोचे screen की तरफ देखा और unread mails खोलने लगा।
करीब पाँच मिनट बाद धीरे-धीरे floor भरने लगा। किसी ने दूर से हँसते हुए “Good Morning” कहा। दो-तीन लोग एक साथ अपनी seats की तरफ बढ़े। कोई चलते-चलते phone पर बात कर रहा था, कोई हाथ में coffee mug लिए अपनी जगह ढूँढ़ रहा था। उसी हलचल के बीच मेरी नज़र एक बार फिर पहली bay की तरफ चली गई—Ananya आ चुकी थी।
वो अपनी seat पर बैठने से पहले पास वाली desk पर बैठे किसी लड़के से कुछ कह रही थी। अगले ही पल दोनों हँस पड़े। उसने laptop खोला, बाल पीछे किए और screen पर झुक गई। बस इतना-सा दृश्य था। न उसने मेरी तरफ देखा, न मैंने उसे देखने की कोई कोशिश की। मैं दोबारा अपने काम में लग गया।
सुबह का पहला घंटा हमेशा की तरह जल्दी निकल गया। किसी mail का जवाब देना था, किसी document पर comments करने थे, किसी thread में tag हो गया था। बीच-बीच में Chat की notification आती और मैं फिर अपने काम में लग जाता। लेकिन जाने क्यों, हर थोड़ी देर बाद नज़र अपने-आप पूरे floor पर घूम जाती। कभी पहली bay में कोई खड़ा दिखाई देता, कभी किसी discussion की वजह से वहाँ भीड़ लग जाती, कभी monitors के पीछे से सिर्फ़ लोगों के सिर दिखाई देते। उन सबके बीच कभी Ananya दिख जाती, कभी नहीं।
अजीब बात ये थी कि जब वो दिखाई नहीं देती थी, तब भी मुझे लगता था कि पहली bay की तरफ एक बार देख लेना चाहिए। ऐसा नहीं था कि मैं उसे ढूँढ़ रहा था। शायद मैं सिर्फ़ ये देख रहा था कि वहाँ क्या चल रहा है। या शायद मैं खुद से यही कह रहा था।
करीब बारह बजे तक सुबह का सारा शोर फिर से काम में बदल चुका था। पूरे floor पर वही परिचित-सी खामोशी फैल गई थी जिसमें सिर्फ़ keyboards की आवाज़, कहीं-कहीं बजती Teams की ringtone और बीच-बीच में किसी के “एक minute…” कहने की आवाज़ सुनाई देती थी। कोई अपने monitor पर झुका बैठा था, कोई headphones लगाए किसी call पर था, तो कोई अपनी chair घुमाकर सामने वाले से कुछ discuss कर रहा था और अगले ही पल वापस screen पर लौट आता था।
मैं भी अपने काम में लगा हुआ था। बीच-बीच में कोई mail आता, कोई message, कोई clarification। सुबह कब निकल गई, पता ही नहीं चला। एक बार पानी की bottle भरने उठा तो यूँ ही पूरी floor पर नज़र घूम गई। पहली bay में लगभग सभी अपनी screens में व्यस्त थे। Ananya भी। दोनों हाथ keyboard पर थे और आँखें monitor पर। अगर कोई उसे उस वक्त देखता, तो शायद यहीं कहता कि ये वही लड़की नहीं हो सकती जो Friday को पूरी table को चुप करा गई थी।
शायद इंसान का सबसे असली रूप भी यही होता है। कोई हमें उन पाँच मिनटों से पहचान लेता है जिनमें हम सबसे ज़्यादा बोलते हैं, और कोई उन पाँच घंटों से जिनमें हम बिना कुछ कहे अपना काम करते रहते हैं।
करीब एक बजे Samyak ने अपनी chair पीछे खिसकाई और बिना सिर उठाए कहा: “चलें?”
Ravi ने screen से नज़र हटाए बिना जवाब दिया: “दो minute.”
Samyak: “तेरे दो minute दस होते हैं.”
Ravi: “तो तू चल, मैं आता हूँ.”
Neha ने laptop lock करते हुए कहा: “मैं नीचे मिलती हूँ.”
धीरे-धीरे सब अपनी-अपनी जगह से उठने लगे। किसी ने phone जेब में रखा, किसी ने Tiffin उठाया, किसी ने बस screen lock की और चल पड़ा। कोई किसी का इंतज़ार नहीं कर रहा था, फिर भी आख़िर में सब लगभग साथ ही lift के सामने मिल गए। Ananya सबसे आख़िर में आई। आते-आते उसने अपना Lunchbox उठाया और monitor एक बार फिर देख लिया।
Ananya: “बस एक mail भेज दूँ…”
Samyak ने मुस्कुराकर कहा: “Corporate का सबसे बड़ा झूठ।”
Ananya: “कौन-सा?”
Samyak: “‘बस एक mail.'”
Ananya हँस पड़ी: “सच में आख़िरी है।”
Samyak: “ये भी सब बोलते हैं.”
Ananya: “तुम लोग जाओ, मैं आती हूँ.”
Samyak: “नहीं, अब तो wait करेंगे.”
Ananya: “क्यों?”
Samyak: “कल फिर बोलेगी, बिना मुझे लिए चले गए.”
Ananya: “मैं कब बोलती हूँ?”
Samyak: “तू नहीं बोलती, guilt feel करवा देती है.”
Ananya: “ड्रामा बंद कर।”
उसने जल्दी से mail भेजा, laptop lock किया और हमारी तरफ आ गई: “चलो.”
हम सब lift की तरफ बढ़ गए। Lift हमेशा की तरह भरी हुई थी। कुछ लोग नीचे जा चुके थे, कुछ इंतज़ार कर रहे थे। किसी ने सीढ़ियों का रास्ता पकड़ लिया, बाकी वहीं खड़े बातें करते रहे। Corporate offices in lunch भी अपने समय पर नहीं होता, lift मिल जाए तो lunch जल्दी हो जाता है, नहीं मिले तो पाँच मिनट वहीं निकल जाते हैं।
नीचे पहुँचते-पहुँचते group अपने-आप दो हिस्सों में बँट गया। कोई cafeteria की तरफ चला गया, कोई बाहर धूप में खड़ा होकर phone पर बात करने लगा। हम लोग हमेशा की तरह खाना लेकर उसी लंबी table पर जाकर बैठ गए जहाँ पिछले कई महीनों से लगभग रोज़ बैठते आ रहे थे।
खाना शुरू हुए मुश्किल से दो मिनट हुए होंगे कि Ravi ने कहा: “यार, कल फिर production में issue आ गया था।”
Samyak ने तुरंत जवाब दिया: “रात वाले?”
Ravi: “हाँ, डेढ़ घंटे तक लगा रहा.”
Samyak: “किसकी गलती थी?”
Ravi: “गलती किसी की नहीं थी… mail सबको आ गई थी.”
Samyak: “मतलब गलती किसी एक की ही रही होगी.”
सब हँस पड़े। Ananya चुपचाप खाना खा रही थी। उसने बीच में सिर्फ़ इतना कहा: “Problem ये है कि postmortem सबको करना आता है, prevention किसी को नहीं.”
Ravi: “मैडम फिर शुरू हो गई।”
Ananya: “गलत बोल रही हूँ?”
Ravi: “नहीं… लेकिन lunch पे incident review मत करो.”
Ananya: “तुम लोग भी तो वही कर रहे हो।”
Ravi ने हाथ उठाकर surrender कर दिया: “ठीक है madam, topic change.”
Ananya: “Better.”
बात वहीं ख़त्म हो गई। अगले ही पल discussion किसी web series पर पहुँच गया। किसी ने weekend पर देखी हुई series recommend करनी शुरू कर दी, कोई बोल रहा था कि time ही नहीं मिलता।
मैं ज़्यादा कुछ बोल नहीं रहा था। कभी-कभी मुझे लगता था कि हर group में एक ऐसा इंसान होता है जो बातचीत का हिस्सा कम और गवाह ज़्यादा होता है। मैं शायद वही था। लोग बोलते रहते थे, मैं सुनता रहता था। शायद इसी वजह से मुझे बातें याद रह जाती थीं।
बीच-बीच में मेरी नज़र Ananya पर चली जाती। वो हर discussion में अपनी बात रखती थी, लेकिन आख़िरी बात कहने की कोशिश कभी नहीं करती थी। अगर कोई उसकी बात से disagree करे, तो वो उसे पूरा सुनती थी। बीच में काटती नहीं थी। फिर मुस्कुराकर अपना point रखती थी। उसे बहस जीतने की जल्दी नहीं रहती थी, शायद इसलिए लोग उससे बहस करते भी रहते थे।
Samyak ने अचानक मेरी तरफ देखकर कहा: “वैसे… Amsterdam में lunch कैसा होता था?”
मैंने पानी का घूंट लिया: “Office जैसा ही.”
Samyak: “झूठ.”
मैं: “सच.”
Samyak: “कुछ तो fancy होगा.”
मैं: “Fancy bill होता था.”
पूरी table हँस पड़ी। Ravi बोला: “मतलब वहाँ भी लोग फ्री का खाना ढूँढ़ते थे?”
मैं: “इंसान country change करता है… आदतें नहीं।”
Samyak: “ये लाइन नोट करो कोई।”
Ravi: “LinkedIn पे डाल दे।”
Samyak: “नीचे लिख देना — Thoughts?”
इस बार अनन्या भी हँस पड़ी: “Hashtag Monday Motivation.”
Ravi: “Tuesday है.”
Ananya: “Corporate में हर दिन Monday ही लगता है.”
किसी ने table पर हल्का-सा हाथ मारा: “बस… ये सही बोला।”
Lunch ख़त्म होते-होते सबने अपनी-अपनी plates उठाईं। कोई सीधे washroom चला गया, कोई coffee लेने रुक गया। सम्यक ने घड़ी देखी और बोला: “चलो… वरना वापस आके फिर वही mail आएगी… Where are we on this?”
Ravi ने सिर पकड़ लिया: “बस यार… ये line मत याद दिला।”
हम सब हँसते हुए वापस lift की तरफ बढ़ गए। दोपहर का आधा घंटा ख़त्म हो चुका था। ऊपर लौटते ही फिर वही screens थीं, वही mails, वही deadlines… जैसे lunch break किसी ने pause button दबाकर बीच में रख दिया हो।

