Part 13
ऊपर लौटते-लौटते करीब दो बज चुके थे। Lunch के बाद office का माहौल सुबह से बिल्कुल अलग हो जाता था। कुछ लोगों के हाथ में coffee होती, कुछ अब भी नीचे pool table के पास अटके रहते और जो लोग वापस आ चुके होते, वो अगले पाँच-दस मिनट तक काम शुरू करने की मानसिक तैयारी करते रहते। फिर धीरे-धीरे पूरा floor दोबारा उसी लय में लौट आता।
मैं अपनी seat पर आकर बैठ गया। Laptop unlock किया। Gmail में कुछ नए mails आ चुके थे। एक mail का जवाब दिया, दूसरे में comments लिखे और फिर काम में लग गया। कुछ देर बाद मुझे एहसास हुआ कि floor पर फिर वही परिचित-सी खामोशी लौट आई है। अब सिर्फ़ keyboards की आवाज़ थी और बीच-बीच में किसी Meet पर धीमी-सी बातचीत।
करीब आधे घंटे बाद मैं पानी भरने उठा। लौटते हुए यूँ ही पूरी floor पर नज़र घूम गई। पहली bay में किसी बात को लेकर हलचल थी। चार-पाँच लोग एक desk के आसपास खड़े थे। मुझे लगा शायद कोई production issue होगा या फिर किसी का birthday plan बन रहा होगा। मैं ज़्यादा देर रुका नहीं और वापस अपनी seat पर आ गया।
शाम की तरफ बढ़ते-बढ़ते काम फिर तेज़ हो गया। हर किसी की screen पर कुछ न कुछ चल रहा था। कोई deadline पूरी कर रहा था, कोई client के reply का इंतज़ार कर रहा था, कोई लगातार calls पर था। Office में सबसे अजीब चीज़ यही होती है—एक ही समय पर हर इंसान अपनी अलग दुनिया में व्यस्त होता है, लेकिन बाहर से देखने पर लगता है जैसे सब एक ही कहानी का हिस्सा हों।
करीब चार बजे पहली बार उस दिन मेरी और Ananya की नज़र मिली।
बस एक पल के लिए।
वो अपनी seat से उठकर किसी दूसरे bay की तरफ जा रही थी। मैं शायद उसी समय screen से नज़र हटाकर गर्दन सीधी कर रहा था। हमारी नज़रें मिलीं।
बस।
न कोई बातचीत।
न कोई रुकना।
न कोई वजह।
वो आगे बढ़ गई और मैं वापस अपने monitor की तरफ देखने लगा।
अगर उस दिन किसी ने मुझसे पूछा होता कि पूरे Tuesday में सबसे अलग क्या हुआ, तो शायद मेरे पास कोई जवाब नहीं होता।
क्योंकि सच यही था कि कुछ हुआ ही नहीं था।
लेकिन शायद इंसान की आदतें भी ऐसे ही बनती हैं।
बिना किसी घोषणा के।
बिना किसी घटना के।
और बिना ये बताए कि कब कोई चेहरा, पूरे दिन के शोर में भी, पहचान में आने लगता है।
करीब साढ़े पाँच बजे Saamyak फिर मेरी desk के पास आकर खड़ा हो गया।
“चल, coffee?”
मैंने screen से नज़र हटाए बिना कहा,
“तू पी आ.”
“आज भी?”
“काम ख़त्म कर लूँ पहले.”
उसने मेरी screen की तरफ देखा और हँसते हुए बोला,
“काम कभी ख़त्म नहीं होगा.”
“पता है.”
“फिर भी हर रोज़ यही बोलता है.”
मैं भी मुस्कुरा दिया।
“आदत है.”
Samyak सिर हिलाते हुए आगे बढ़ गया।
मैंने एक बार फिर monitor की तरफ देखा।
Mail अभी भी वहीं खुली थी।
लेकिन जाने क्यों…
ध्यान अब भी कहीं और भटक रहा था।
मैंने आख़िरी mail भेजी और कुर्सी पर थोड़ा पीछे होकर गर्दन सीधी की। आदत के मुताबिक नज़र पूरे floor पर घूम गई।
पहली bay में अब ज़्यादातर seats खाली हो चुकी थीं।
Ananya अब भी अपनी screen पर झुकी हुई थी। Headphones लगाए, पूरी तल्लीनता से कुछ Tyoe कर रही थी। मुझे नहीं पता क्यों, लेकिन पिछले चार दिनों से उसकी बातें बार-बार दिमाग़ में घूम रही थीं। Friday की वो रात… उसका बिना रुके बोलते जाना… प्यार, honesty, self awareness… और फिर अगले ही पल उसी सहजता से अपनी ज़िंदगी में लौट जाना।
पता नहीं मुझे उसकी बातें परेशान कर रही थीं…
या उसकी आँखें।
मैं दोनों के बीच कोई रिश्ता जोड़ नहीं पा रहा था।
Laptop बंद किया, bag उठाया और parking की तरफ निकल आया।
दिल्ली की शाम हमेशा की तरह ट्रैफ़िक से भरी हुई थी। कुछ दूर जाकर red light पर गाड़ी रुकी। सामने countdown चल रहा था—एक सौ बाईस सेकंड।
मैंने यूँ ही phone उठाया।
Instagram खोला।
Search पर उँगली गई।
कुछ सेकंड तक मैं खुद ही मुस्कुराता रहा।
“क्या कर रहा हूँ मैं?”
फिर भी मैंने type किया…
Ananya Bhardwaj.
एक profile सामने आई।
Private account.
Display picture इतनी छोटी थी कि चेहरा भी ठीक से दिखाई नहीं दे रहा था।
मैं कुछ देर screen देखता रहा।
Follow का button सामने था।
बस एक tap की दूरी पर।
उँगली button तक गई…
फिर वापस आ गई।
उसी पल Friday की उसकी आवाज़ जैसे फिर कानों में गूँज गई—
“Self obsessed…”
“Narcissist…”
“Ek message ka reply dene mein itna sochte kyun ho tum log…”
मैं खुद ही हँस पड़ा।
“Request bhejne mein bhi itna hi soch raha hoon…”
पीछे से किसी ने horn बजाया।
Signal हरा हो चुका था।
मैंने गाड़ी आगे बढ़ा दी।
अगले ही signal पर गाड़ी फिर रुकी।
इस बार मैंने बिना ज़्यादा सोचे phone उठाया…
और Follow पर tap कर दिया।
बस।
इतना-सा काम।
लेकिन पता नहीं क्यों…
ऐसा लगा जैसे मैंने कोई बहुत बड़ा फ़ैसला ले लिया हो।
पूरे रास्ते घर तक एक ही ख़याल आता रहा—
वो request accept करेगी…
या नहीं?

