Part 15 Ananya
Present Day.
मैंने अपना phone उठाया और उसकी profile picture पर आकर मेरी नज़र ठहर गई। इतने सालों बाद भी, बस उसका चेहरा देखते ही एक पुरानी, दबी हुई याद मेरे दिल में ऐसे लौट आई, जैसे वो कभी गई ही न हो।
कल रात club में Sugandh को अचानक सामने देखकर, उसका उसी तरह मेरी तरफ देखना… फिर बिना कुछ कहे, मेरी चेहरे पर आई लट को धीरे से कान के पीछे कर देना… उस एक छोटे-से Touch ने मुझे अंदर तक हिला दिया था। It was a glitch in the space-time continuum. एक पल के लिए लगा जैसे बीच के सारे साल किसी ने मिटा दिए हों। जैसे हम कभी अलग हुए ही न हों। वो स्पर्श एक ज़बरदस्त flashback की तरह मुझे सीधे अतीत के उस आख़िरी पन्ने पर ले गया वो मेरे farewell की रात थी। As usual पूरा office बाहर celebrate कर रहा था। Music, lights, drinks, हँसी… सब कुछ पहले जैसा था। बस हम दोनों पहले जैसे नहीं रहे थे।
Amsterdam से वापस आने के बाद Sugandh बदल गया था। बहुत नहीं… बस इतना कि अब वो मुझे notice करने लगा था। पहले उसकी नज़र मुझसे होकर निकल जाती थी, अब कुछ पल ठहर जाती थी। मैं कई दिनों से ये महसूस कर रही थी। And honestly… मुझे अच्छा भी लग रहा था। शायद बहुत अच्छा। लेकिन उसी के साथ एक अजीब-सी confusion भी थी। मैं समझ नहीं पा रही थी कि वो आखिर चाहता क्या है।
पता नहीं क्यों… उसकी आँखें, उसका charisma, उसका शांत रहना, उसका कम बोलना… सब कुछ मुझे अपनी तरफ खींचता चला जाता था। Office में सबकी नज़रें अक्सर मुझ पर होती थीं… लेकिन मेरी नज़र हमेशा उसे ढूँढ़ती रहती थी। Kusha की शादी में मैंने पहली बार हिम्मत करके उससे पूछ भी लिया था—”मेरे साथ try क्यों नहीं किया?” उसने हमेशा की तरह मुस्कुराकर बात टाल दी। शायद उसे लगा मैं मज़ाक कर रही हूँ। शायद उसने मेरी बात को कभी seriously लिया ही नहीं। लेकिन मैं… मैं उससे जुड़ी हर छोटी-सी छोटी बात याद रखती थी।
Amsterdam में रहते हुए मैं उसकी हर नई photo देखती थी। उसकी profile हमेशा public रहती थी। वो किस city में है, किस सड़क पर चल रहा है, किस café में बैठा है… मैं सब देखती थी। मुझे नहीं पता मैं क्या ढूँढ़ती थी। शायद उसे। Perhaps I was looking for a version of him that belonged to me. शायद उसके चेहरे की वो मुस्कान, जो बिना किसी कोशिश के मेरे पूरे दिन को अच्छा बना देती थी। वो मुस्कुराता था… और मैं उसे देखती रह जाती थी।
उसकी आँखों में हमेशा एक अजीब-सी गर्माहट थी। वो बाहर से जितना composed दिखता था, मुझे हमेशा लगता था उसके अंदर उतना ही शोर है। मैं उसकी ज़िंदगी के बारे में सब कुछ जान लेना चाहती थी। उसकी favourite coffee क्या है, ये नहीं… उसके डर क्या हैं। उसके दिल पर कितने ज़ख्म हैं। वो किस बात से भागता है। और पता नहीं क्यों, हर बार उसे देखकर मन करता था कि बस एक बार उसका चेहरा अपने हाथों में लेकर कह दूँ “You’re safe… अब कहीं भागने की ज़रूरत नहीं है।”
लेकिन मैं जानती थी… अगर मैं उसकी तरफ एक कदम भी जल्दी बढ़ाऊँगी, तो शायद वो फिर वही करेगा जो हमेशा करता आया था खुद को मुझसे दूर कर लेगा। शायद उसे कभी एहसास भी नहीं हुआ होगा कि मैं उसकी सबसे ख़ामोश admirer थी। उसका कम बोलना, बिना कोशिश किए लोगों का ध्यान अपनी तरफ खींच लेना, लड़कियों का खुद उसके पास आकर बात करना और उसका हर बार उतनी ही सहजता से मुस्कुरा देना… मैं बस दूर खड़ी उसे देखती रहती थी। कई बार खुद पर हँसी भी आती थी। पूरा office मुझसे आकर बात करता था, और मैं… एक ऐसे लड़के को चुपचाप देखती रहती थी, जो शायद ये भी नहीं जानता था कि मैं उसे देख रही हूँ।
Office में उसके बारे में कहानियाँ बहुत थीं। कभी किसी का नाम उससे जोड़ दिया जाता, कभी किसी और का। Instagram पर उसकी profile खोलती तो comments, likes, photos… लड़कियाँ ही लड़कियाँ दिखाई देतीं। कई बार phone बंद करते हुए मैं खुद से ही कहती, “इतने लोगों के बीच मैं कौन हूँ?” सच कहूँ तो कई बार मुझे लगता था कि मैं उसकी दुनिया में बस एक invisible-सी मौजूदगी हूँ। शायद उसे मेरा नाम भी याद हो या ना हो।
Notice period शुरू होने के बाद पहली बार मैंने उसके अंदर एक अजीब-सी बेचैनी देखी। पहले वो मेरी तरफ देखता ही नहीं था। अब जाने-अनजाने उसकी नज़र मेरी तरफ चली आती थी। कभी किसी बहाने मेरी bay तक आ जाता, कभी दूर से देखकर तुरंत अपनी नज़र हटा लेता। कई बार ऐसा लगता जैसे वो कुछ कहना चाहता है, लेकिन अगले ही पल अपने laptop में खो जाता। मैं उसे देखती थी… और जानबूझकर कोई reaction नहीं देती थी। मुझे डर था कि अगर मैंने एक बार भी उसे यक़ीन दिला दिया कि मैं भी उसे देख रही हूँ, तो शायद वो फिर पीछे हट जाएगा।
उसकी presence का असर मैं कभी शब्दों में समझा ही नहीं पाई। वो मेरे पास से गुज़रता था और उसके चले जाने के बाद भी मुझे उसकी मौजूदगी अपने आसपास महसूस होती रहती थी। जैसे उसकी खुशबू नहीं… उसका एहसास हवा में रह गया हो। कई बार ऐसा लगता था कि मेरा दिल उसके पीछे चल पड़ा है और मेरा शरीर उसे रोकने की कोशिश कर रहा है। मैं खुद से लड़ती रहती थी, लेकिन हर बार हार जाती थी।
सबसे ज़्यादा हैरानी मुझे इस बात की होती थी कि मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी में किसी को इस तरह महसूस नहीं किया था। Attraction पहले भी हुआ था, crush भी हुए थे, लोग अच्छे भी लगे थे… लेकिन Sugandh के साथ बात अलग थी। उसे देखते ही मुझे सिर्फ़ उसे छू लेने का मन नहीं करता था… मुझे उसके पास बैठ जाने का मन करता था। उसकी ख़ामोशी सुनने का मन करता था। उसके कंधे पर सिर रखकर बिना कुछ कहे देर तक बैठे रहने का मन करता था। उसके साथ होने का एहसास ही मेरे लिए किसी conversation से ज़्यादा क़ीमती था।
And that was the scariest part. क्योंकि मैं उसे चाहने लगी थी… उससे कुछ माँगे बिना।
Last day जैसे-जैसे पास आ रहा था, मेरे अंदर की बेचैनी भी बढ़ती जा रही थी। मैं हर सुबह office आते ही सबसे पहले उसकी seat की तरफ देखती थी। पहले ये आदत नहीं थी। लेकिन अब… अब उसकी मौजूदगी मेरे पूरे दिन का हिस्सा बन चुकी थी। अगर वो दिखाई दे जाता, तो पता नहीं क्यों दिल को एक अजीब-सा सुकून मिल जाता। और अगर किसी दिन वो देर से आता, तो बिना वजह बेचैनी होने लगती।
Notice period शुरू होने के बाद मैंने उसके अंदर भी एक बदलाव महसूस किया। वो पहले की तरह बिल्कुल अनजान बनकर नहीं निकल जाता था। कभी पानी भरने के लिए वही समय चुनता जब मैं उठती थी। मुझे आज भी याद है, एक दिन मैं अपनी screen पर काम कर रही थी। बिना सिर उठाए ही मुझे महसूस हो गया था कि वो सामने खड़ा है। मैंने ऊपर देखा तो वो सचमुच वहीं था। हाथ में कोई document था। उसने किसी और से काम की बात की, लेकिन उसकी आँखें एक पल के लिए मेरी आँखों से मिलीं। बस एक पल। फिर वो मुस्कुराया भी नहीं… और वापस चला गया। पता नहीं क्यों, उस एक नज़र ने मेरा पूरा दिन बदल दिया था।
उसके बारे में जितनी बातें office में होती थीं, उतना ही कम मैं उन पर यकीन करती थी। लोग उसे playboy कहते थे। शायद इसलिए क्योंकि वो अच्छा दिखता था, confident था, और लड़कियाँ उससे खुद आकर बात करती थीं। लेकिन मैंने कभी उसे किसी की feelings के साथ खेलते नहीं देखा। उसके अंदर एक अजीब-सी दूरी थी। जैसे वो लोगों के बीच रहकर भी खुद को हमेशा थोड़ा-सा बचाकर रखता हो।
कई बार office के बाहर मैंने उसे Kusha के साथ देखा था। दोनों साथ चाय पीते थे, कभी लंबी बातें करते थे, कभी smokers’ zone के पास खड़े दिखाई देते थे। बाहर से देखने पर लगता था कि दोनों सिर्फ़ अच्छे दोस्त हैं। लेकिन पता नहीं क्यों, मुझे हमेशा महसूस होता था कि उनके बीच कुछ ऐसा है जो बाकी लोगों को दिखाई नहीं देता। उस एहसास से मुझे जलन नहीं होती थी… बस एक हल्की-सी कसक होती थी। शायद इसलिए क्योंकि मैं कभी उसके इतने करीब पहुँच ही नहीं पाई थी कि उसकी ख़ामोशियों का हिस्सा बन सकूँ।
उसकी सबसे अजीब बात ये थी कि वो कभी किसी का attention माँगता नहीं था, लेकिन फिर भी लोगों का attention अपने-आप उसकी तरफ चला जाता था। और शायद यही बात मुझे सबसे ज़्यादा खींचती थी। वो कमरे में सबसे ज़्यादा बोलने वाला इंसान नहीं था, लेकिन अगर वो मुस्कुरा देता, तो जाने क्यों मेरी नज़र वहीं ठहर जाती। उसकी आँखों में हमेशा ऐसा लगता था जैसे कोई अधूरी कहानी छुपी हो। मैं कई बार सोचती थी… अगर कभी उसने अपने बारे में खुलकर बात की, तो शायद मैं घंटों बिना कुछ बोले बस उसे सुनती रहूँ।
शायद इसी वजह से जब उसने मुझे notice करना शुरू किया, तो मुझे उससे ज़्यादा डर लगा। क्योंकि मैं जानती थी कि मैं उससे बहुत आगे निकल चुकी हूँ। वो शायद अभी मुझे देखना सीख रहा था… और मैं जाने कब से उसे महसूस कर रही थी। उसके आसपास रहते हुए मेरा दिल जितनी तेज़ी से धड़कता था, उतनी तेज़ी से शायद मैंने पहले कभी किसी के लिए महसूस नहीं किया था। उसके पास से गुज़रते हुए कई बार ऐसा लगता था जैसे हवा का तापमान बदल गया हो। वो मेरे बिल्कुल करीब से निकलता, और मेरा मन करता कि बस एक बार उसे रोक लूँ… बिना किसी वजह के… सिर्फ़ कुछ Second और अपने पास रखने के लिए।
लेकिन मैंने कभी ऐसा नहीं किया। क्योंकि मुझे डर था… अगर मैंने उसे अपने दिल की ज़रा-सी भी झलक दिखा दी… तो शायद वो फिर मुस्कुराएगा… और हमेशा की तरह एक कदम पीछे हट जाएगा।
Office से निकलते-निकलते रात हो चुकी थी। Formal farewell वहीं ख़त्म हो गया था। Cake, photos, speeches… सब office की चार दीवारों के अंदर रह गया। लेकिन हम सब जानते थे कि असली farewell अभी बाकी था। हमारी छोटी-सी gang हमेशा की तरह बाहर मिलने वाली थी। वही लोग, वही शोर, वही हँसी… बस आज की रात अलग थी। आज मैं आख़िरी बार उनके साथ थी।
Restaurant पहुँचते ही सब अपनी-अपनी मस्ती में लग गए। किसी ने beer order कर दी, किसी ने starters। Rohit हमेशा की तरह सबसे ऊँची आवाज़ में हँस रहा था। Samyak DJ से गाने बदलवाने में लगा था। Neha पहले से ही सबके लिए table arrange कर चुकी थी। हर तरफ़ शोर था, हँसी थी, glasses टकराने की आवाज़ थी… लेकिन उस पूरे शोर में भी मेरी नज़र बार-बार सिर्फ़ एक ही चेहरे को ढूँढ़ रही थी।
Sugandh थोड़ा दूर बैठा था। हमेशा की तरह। लोगों के बीच होकर भी जैसे उनसे थोड़ा अलग। कोई उससे बात करता तो वो मुस्कुरा देता, दो-चार लाइनें बोलता और फिर चुप हो जाता। उसके हाथ में beer की bottle थी, लेकिन उसकी आँखें बार-बार भीड़ के उस हिस्से तक चली आती थीं जहाँ मैं बैठी थी। हर बार जब मेरी नज़र उसकी तरफ़ उठती, वो या तो bottle की तरफ़ देखने लगता या किसी और से बात करने लगता। उसकी यही आदत मुझे हमेशा हँसा देती थी। इतना confident दिखने वाला लड़का… और नज़र मिलते ही बिल्कुल चुप।
मैंने glass उठाया और पहला sip लिया। शायद celebration के लिए। शायद खुद को समझाने के लिए कि सब ठीक है। लेकिन हर sip के साथ मेरे अंदर कुछ और ही खुलता जा रहा था। जितना मैं खुद को normal दिखाने की कोशिश कर रही थी, उतना ही मेरे अंदर का शोर बढ़ता जा रहा था। मेरे सामने लोग बातें कर रहे थे, हँस रहे थे, photos खिंचवा रहे थे… और मैं उन सबके बीच बैठी सिर्फ़ उसे महसूस कर रही थी।
मुझे आज भी याद है, उस रात मैंने उससे शायद एक भी ढंग की बात नहीं की थी। फिर भी पूरी शाम ऐसा लग रहा था जैसे हम दोनों के बीच लगातार कोई ख़ामोश बातचीत चल रही हो। कभी वो मेरी तरफ़ देख लेता, कभी मैं उसे देख लेती। फिर दोनों ऐसे नज़रें हटा लेते जैसे कुछ हुआ ही न हो। लेकिन कुछ तो हो रहा था। शायद बहुत पहले से हो रहा था। बस हम दोनों में से किसी ने उसे कभी नाम नहीं दिया।
जितना समय बीत रहा था, मेरे लिए उसके पास बैठना उतना ही मुश्किल होता जा रहा था। उसके आसपास एक अजीब-सी गर्माहट थी। ऐसा नहीं कि उसने कुछ किया हो। उसने मुझे छुआ तक नहीं था। फिर भी जब भी वो मेरे पास से गुज़रता, मुझे लगता जैसे हवा का रुख़ बदल गया हो। उसकी खुशबू, उसकी मौजूदगी, उसका चुप रहना… सब मिलकर मेरे अंदर ऐसी बेचैनी पैदा कर रहे थे जिसे मैं चाहकर भी किसी से कह नहीं सकती थी।
मैंने दूसरी beer मँगा ली। Neha ने मेरी तरफ़ देखकर हँसते हुए कहा, “आज तो लगता है जाने का पूरा ग़म निकालने का इरादा है।”
मैं भी हँस दी। “शायद…”
लेकिन सच तो ये था कि मैं नौकरी छोड़ने का ग़म नहीं मना रही थी। मैं उस इंसान से दूर जाने का ग़म पी रही थी, जिसके इतने पास होकर भी मैं कभी उसके पास पहुँच ही नहीं पाई। मैंने एक बार फिर उसकी तरफ़ देखा।
जैसे-जैसे रात गहराती जा रही थी, मेरे अंदर का शोर भी बढ़ता जा रहा था। मुझे याद नहीं मैंने कितनी pee li thi। बस इतना याद है कि उस रात मैं पहली बार अपने दिल की आवाज़ को चुप नहीं करा पा रही थी। शायद उस शराब का असर था… या शायद इतने सालों से दबे हुए एहसासों का।
लोग एक-एक करके उठने लगे थे। कोई bill की बात कर रहा था, कोई cab book कर रहा था। सब अपने-अपने अंदाज़ में शाम समेट रहे थे। मैं कुर्सी पर चुप बैठी थी। दुनिया की आवाज़ें जैसे धीरे-धीरे धुँधली पड़ती जा रही थीं। मुझे बस इतना याद है कि जब मैं उठी, मेरे कदम लड़खड़ा गए थे।
And then, the universe shifted. अगले ही पल किसी ने मुझे संभाल लिया।
वो Sugandh था। उसने कुछ नहीं कहा। बस उतनी ही मजबूती से मुझे थामे रखा, जितनी ज़रूरत थी। उसकी हथेली की पकड़ में कोई जल्दबाज़ी नहीं थी, कोई अधिकार नहीं था… बस एक सुकून था। ऐसा सुकून, जिसे महसूस करते ही जाने क्यों मेरी आँखें भर आई थीं।
रास्ते भर उसने मुझसे बहुत कम बात की। बीच-बीच में बस इतना पूछ लेता, “ठीक हो?” और मैं हर बार सिर हिलाकर “हाँ” कह देती, जबकि हम दोनों जानते थे कि मैं ठीक नहीं थी। मुझे याद है… रास्ते की आधी बातें धुँधली हैं। लेकिन उसका साथ… बिल्कुल साफ़ याद है। वो मुझे घर छोड़ने निकला था… लेकिन मेरी हालत देखकर उसने रास्ता बदल दिया।
उस रात उसने मेरी देखभाल जिस तरह की, उसने मेरी उसके बारे में बनी हुई हर Assumptions बदल दी। मैंने उसे हमेशा दूर रहने वाला, थोड़ा रहस्यमयी, थोड़ा बेपरवाह समझा था। लेकिन उस रात… वो बहुत patient था। उसने मेरे लिए पानी रखा। नींबू पानी बनाया। बार-बार यही देखता रहा कि मैं ठीक हूँ या नहीं। He was caring, in ways I never imagined him to be.
मैं आधी नींद में उसे देख रही थी। उसके चेहरे पर वही शांति थी, लेकिन उस रात पहली बार उसमें एक ऐसी नरमी, एक soft side दिखाई दिया, जो उसने शायद कभी किसी को नहीं दिखाया था। मैं उसे बस देखती रही। इतने सालों से जिस इंसान को दूर से चाहा था… वो पहली बार मेरे इतने करीब था। हमारे बीच अब भी ख़ामोशी थी। लेकिन उस ख़ामोशी में पहले जैसी दूरी नहीं थी।
मैंने जाने-अनजाने उसका हाथ पकड़ लिया। उसने मेरी तरफ देखा। उसकी आँखों में सवाल भी था… और अपनापन भी। उस पल मुझे कुछ सोचने की ज़रूरत नहीं पड़ी। मैं थोड़ा-सा उसकी तरफ झुकी और बहुत हल्के से उसके गाल को छू लिया।
वो कुछ पल बिल्कुल स्थिर खड़ा रहा। फिर उसने धीरे से मेरी तरफ देखा। ऐसे… जैसे इतने सालों से पहली बार मुझे सचमुच देख रहा हो। उसने बहुत सँभलकर मेरे चेहरे को अपनी हथेलियों में लिया। उसकी उँगलियाँ काँप नहीं रही थीं… लेकिन उसकी साँसें बता रही थीं कि वो भी उतना ही बेचैन था जितनी मैं।
हम दोनों के बीच बस कुछ inch की दूरी रह गई थी। मैं उसकी साँसों की गर्माहट महसूस कर सकती थी। वो कुछ कहना चाहता था। मैं भी। लेकिन उस रात शब्द शायद हम दोनों का साथ छोड़ चुके थे। उसने बहुत धीरे से अपना माथा मेरे माथे से टिका दिया। मैंने आँखें बंद कर लीं। इतने सालों की दूरी उस एक पल में जैसे पिघल गई।
तभी उसकी हथेलियाँ मेरे गालों से फिसलती हुई मेरी गर्दन पर रुक गईं। जब उसके होंठों ने पहली बार मेरे होंठ से छुए, तो वो सिर्फ एक kiss नहीं थी—ऐसा लगा जैसे वक्त वहीं रुक गया हो। उस kiss में सालों का इंतज़ार, एक अधूरी ख़्वाहिश और उसे खो देने का डर सब एक साथ घुला हुआ था। मैंने उसके कंधों को कसकर पकड़ लिया। उसने मुझे और करीब खींचते हुए, मेरी दोनों कलाइयों को अपने एक हाथ में थामा और बहुत प्यार से मुझे दीवार की तरफ़ pin कर दिया।
कमरे की dim light में उसकी shirt अब उतर चुकी थी। His chest was rising and falling while he was breathing heavily against mine. वो एकदम चुप था, पर उसकी गहरी आँखें मेरे चेहरे के एक-एक हिस्से को ऐसे पढ़ रही थीं जैसे कोई आख़िरी ख़त हो। मेरी उँगलियाँ घबराहट में मेरी chain के pendant से खेलने लगीं—मेरी वो पुरानी आदत जो सिर्फ़ उसके ख़्यालों में जागा करती थी। उसने बहुत धीरे से अपना
हाथ बढ़ाकर मेरे pendant को सहलाया और मेरी उँगलियों को अपने हाथ में lock कर दिया।
उसका चेहरा दोबारा मेरे करीब आया। उसकी घनी पलकों का मेरे गालों को छूना, उसकी नाक की गरम सांसें मेरे होठों पर बिखरना… मुझे अपनी ही सुध-बुध भुला रहा था। उसके lips मेरे गालों से सरकते हुए, मेरी आँखों के कोनों को चूमते हुए मेरी कान के पीछे और गर्दन पर उतर आए। उसकी बंद आँखों और गरम सांसों के साथ मेरी गर्दन पर kisses की एक ऐसी गहरी, intense trail बन रही थी जिसने मेरी पूरी body में एक सिहरन दौड़ा दी।
कमरे के सन्नाटे में हमारी टूटती-जुड़ती सांसों के अलावा कोई और आवाज़ नहीं थी। Our bare skin met like a long-awaited confession. उसके शरीर की वो बेकाबू warmth और bare skin जब मुझसे Touch हुआ, तो मेरा सारा control जैसे खत्म हो गया। उसने मुझे बहुत आराम से, जैसे मैं कोई काँच की चीज़ हूँ, अपनी बाहों में उठाया और bed पर ले गया।
उस रात हमारे बीच कोई जल्दबाज़ी नहीं थी। हर एक touch इतना धीमा, इतना गहरा था कि बिस्तर की सिलवटों में हमारी कहानियाँ दर्ज हो रही थीं। जब उसने झुककर मुझे अपनी बाहों में लिया, तो ऐसा लगा जैसे a beautiful, seamless melting of boundaries was happening। दो भटकती हुई रूहें सदियों के सफ़र के बाद आख़िरकार अपने सही ठिकाने पर आ मिली थीं। उसकी उँगलियों का मेरी कमर को छूना और मेरा उसकी छुअन के आगे पूरी तरह surrender कर देना… सब कुछ इतना perfect था कि मेरी आँखों से एक आंसू फिसलकर तकिए में गायब हो गया। वो Lust से परे, एक ऐसी ‘once in a lifetime’ वाली रात थी, जहाँ हम दोनों एक-दूसरे में इस तरह खो रहे थे कि जिस्म और रूह का फर्क ही मिट गया था।
बाक़ी रात मेरी यादों में शब्दों की तरह नहीं, एहसासों की तरह बस गई। मुझे सिर्फ़ इतना याद है कि बहुत समय बाद मुझे किसी के साथ पूरी तरह safe महसूस हुआ था। और शायद… उसी एहसास ने मुझे सबसे ज़्यादा डरा दिया।
सुबह जब मेरी आँख खुली, कमरे में हल्की-सी धूप उतर रही थी। मैं कुछ देर उसे सोते हुए देखती रही। उसके चेहरे पर वही सुकून था, जो जागते हुए कभी दिखाई नहीं देता था। मैं मुस्कुराई। बहुत धीरे से उठी। एक आख़िरी बार उसे देखा… और बिना उसे जगाए वहाँ से चली आई।
मैं डर गई थी। मुझे पता था… अगर वो जाग गया… अगर उसने एक बार भी मुझे रोक लिया… तो शायद मैं कभी जा ही नहीं पाऊँगी।
Flashback की वो सुनहरी धुंध अचानक टूटी, और मैं वापस आज की हक़ीक़त में आ गई। कल रात की उस club वाली मुलाकात में, जब उसने मेरी लट को पीछे किया था, इस बार वो आँखें झुका नहीं रहा था। इस बार वो मुझे ही देख रहा था।
हमारी नज़रें मिलीं। ना वो मुस्कुराया, ना मैं। लेकिन जाने क्यों… उस एक पल में मुझे लगा जैसे हम दोनों के बीच जितनी भी बातें कभी नहीं हुईं, वो सब हमारी आँखें एक-दूसरे से कह रही थीं। And maybe… just maybe… यही ख़ामोशी मुझे उससे सबसे ज़्यादा मोहब्बत करवा चुकी थी।

