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अपराजिता

तुम्हारे मेरे मिलने का सिलसिला चलता रहा, मेरी शामें हसीन और रातें रंगीन हो गयी । हर सुबह तुम्हारा चेहरा देखे बिना लगता ही नहीं था जैसे सवेरा हुआ हो । तुम्हें अपने आगोश में भर कर, तुम्हारे होठों को छू कर मेरी हर सुबह में तुमने अपनी रूह की जो महक मेरे मन में छोड़ दी थी

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Autumn

I am reminded of your face, that darn cute face, with deep brown eyes to die for. I am still infatuated at the first sight of you. Such a delight.

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खुशी

इंदु सास की मन से सेवा करती फिर भी दिल नहीं जीत पायी । उनके लिए उनकी प्यारी बहु सुमित्रा ही थी । कई साल गुज़र गए । बच्चे बड़े होने लगे । इंदु को अब अपने खून की कमी खलने लगी । कभी कभी दिल बहलाने के लिए बच्चों को ममता भरी नज़रों से देख लेती थी ।

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सिफारिश

क्या जानती थी वो भी की उन दोनों की आखिरी मुलाक़ात अंतिम मुलाक़ात बन जाएगी । जीवन भर के प्यार की कसमें झूठी सिद्ध हो जाएँगी । उम्र भर साथ निभाने का वादा अधूरा रह जाएगा । हर एक प्रेम कहानी की तरह इसका भी यूँ ही अंत हो जाएगा । प्रेम की मंज़िल के करीब आकर यूँ जुदाई और बिछड़के केवल एक गुज़रा हुआ अतीत रह जाएगा ।

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अंतर्द्वंद

तुम्हारी हाँ सुनने के बाद सातवें आसमान पर था मैं । प्यार हो गया था तुमसे । जानता ही नहीं था ऐसा भी होता है प्यार में, न दिन न रात न सुबह न शाम कुछ नहीं कटता । तुम्हें देखे बिना मैं रह नहीं पाता था । थोड़ी सी भी दूरी सहन नहीं होती थी । हर पल, हर वक़्त बस तेरे संग रहने को तड़पता रहता था । तुम्हारी आवाज़ जैसे मेरा संगीत , कुछ और नहीं सुहाता था । जाने कैसा नशा सा था, बेसब्री , बेहद और बेहताशा इश्क़ ।

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निःशब्द

मेरे पास शब्द नहीं थे, कैसे कोई समझ सकता है किसी दिलदार के जाने का दुःख । इस दुनिया में इससे बड़ा कोई दुःख नहीं । मैं किससे कहता अपने दिल की बात, मुझे तुम ही चाहिए थी ये बताने को की कितना अधूरा हूँ मैं तुम्हारे बिना, आ जाओ वापस मेरे पास, कह दो ये एक झूठा सपना था ।

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ख़त

एक तरफ़ा मोहब्बत की दर्द ऐ दास्तान ।

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समन्वय

मुँह से सिगरेट का धुआँ छोड़ते हुए , तुम्हारी हँसी , कुछ अनायास सा ही मैं खींच सा गया तुम्हारी ओर । तुम सिगरेट और चाय पीने अक्सर आया करती थी । कुछ तो था तुम्हारे अंदर, जो औरों में नहीं था । एक नयापन, ज़िंदगी में कुछ अलग करने का जज़्बा, सब कुछ कर जाने की चाहत, कहीं भी न रुकने की आदत, गज़ब का जूनून । मैं भी फीका सा लगता था तुम्हारे आगे ।

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सुकून

निमृत मैडम और हमारे चर्चे हुआ करते थे । सभी को लगता था निमृत मैडम हम पर फ़िदा हैं , क्या करें अब चीज़ ही ऐसी हैं हम, इतिहास के टीचर और शायर, कौन दूर रहेगा हमसे भला , खाना पकवान सब सही बना लेते थे , नित्य ही खिलाया करते थे सभी को, सौम्या मैडम को छोड़ कर ।

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दस्तखत

मेरी ज़िन्दगी पर कर दो बस अपना हक़ ,
कर दो इस दिल पर अपने प्रेम के दस्तखत ।