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अकेला

कल फिर तुम्हारी याद में मैंने बहुत शराब पी।
सुबह से लेकर शाम तक… हर घूंट में बस तुम्हारा नाम था।
ऐसा लग रहा था जैसे शराब नहीं, तुम्हारी कमी उतर रही हो मेरे अंदर।

दिल के अंदर जैसे कोई दीवार लगातार टूट रही थी।
तुम्हारे नाम का हर अक्षर सीने पर खुदता जा रहा था।
कानों में शोर था, दिल चीख रहा था…
पर सुनने वाला कोई नहीं था।
समझने वाला भी कोई नहीं था।

तुम हमेशा कहते थे —
“मैं सबका इतना अच्छा सोचता हूँ, फिर भी आखिर में अकेला रह जाता हूँ।”

पर क्या तुमने कभी सोचा…
मैं कितनी अकेली थी?

तुम्हारे साथ रहकर भी मैं कितनी अकेली थी।

शायद तुम कभी समझ ही नहीं पाए कि तुम मेरे लिए क्या थे।
मेरे अंदर कितना गहरा अंधेरा था।
कितनी बेचैनी थी।
कितना खालीपन था…
और उस खालीपन में सिर्फ तुम थे।

अगर समझ पाते…
तो शायद कभी ये नहीं कहते कि तुम अकेले थे।

मैं हर पल बस यही सोचती रही कि तुम्हारा दुख कैसे कम कर दूँ।
तुम्हें वो सब कैसे दे दूँ जिसकी कमी तुम्हें अंदर से तोड़ती थी।

तुम्हें खुद से दूर तो कर दिया…
पर दिल से कभी दूर नहीं कर पाई।

आज भी दिन-रात यही सोचती रहती हूँ —
तुम क्या कर रहे हो…
क्या सोच रहे हो…
खुश हो या नहीं…
परेशान हो या नहीं…

और सबसे दर्दनाक बात पता है क्या है?

तुम्हारा दुख देखकर मुझे दुख होता है।
तुम्हारी बेचैनी मुझे बेचैन कर देती है।

ये कैसा लगाव था तुमसे?

तुम Instagram पर बस एक story डालते हो।
एक गाना।
एक आधा सा वीडियो।
और मैं…

मैं उस गाने के lyrics तक महसूस करने लगती हूँ।
उस फिल्म को पूरा जाकर देख डालती हूँ।
तुम्हारी story zoom करके देखती हूँ —
उसमें क्या था?
गाड़ी?
शीशा?
तुम्हारे हाथ?
फोन?

फिर खुद से पूछती हूँ —
क्या फोन देखते वक्त तुम्हें मेरी याद आई थी?

और मैं घंटों उसी सवाल में उलझी बैठी रहती हूँ।

कभी-कभी खुद को देखती हूँ तो डर लगता है।
मैं ज़िंदा हूँ।
दो बच्चों की माँ हूँ।
पत्नी हूँ।
किसी की बेटी हूँ।
किसी की बहन हूँ।
एक employee हूँ।

पर तुम्हें चाहने में…
मैं खुद को ही भूल गई।

इतना टूटकर, इतना खोकर…
शायद मैंने कभी किसी से प्यार नहीं किया।

पता नहीं इसे प्यार कहूँ…
दीवानापन कहूँ…
या वो खिंचाव जिसका कोई जवाब नहीं होता।

बस ऐसा लगता है जैसे कोई अदृश्य डोर मुझे लगातार तुम्हारी तरफ खींच रही है।
और मैं पूरी ताकत से उसे रोकने की कोशिश कर रही हूँ।

पर वो डोर हाथ से फिसलती जा रही है।

ऐसा लगता है जैसे मैं किसी ऐसे दरिया में उतर गई हूँ जिसमें पानी नहीं… आग बहती है।

न ठीक से जल पा रही हूँ।
न डूब पा रही हूँ।
न बच पा रही हूँ।
न बाहर निकल पा रही हूँ।

और शायद सबसे दुखद बात यही है…

कि तुम्हें कभी अंदाज़ा भी नहीं हुआ
कि कोई तुम्हें इस हद तक चाह सकता है।

अभी भी लगता है जैसे शराब का नशा उतरा नहीं है।
तुम्हारे इश्क़ की तरह…
तुम्हारे होने की तरह…
तुम्हारी साँसों की तरह…

धीरे-धीरे मेरे अंदर उतरता जा रहा है।
बहता जा रहा है।
फैलता जा रहा है।

कभी-कभी सोचती हूँ…
क्या तुम भी कभी मेरे बारे में ऐसे सोचते हो?

या फिर तुम्हारी दुनिया बस वहीं तक सीमित है —
वो पहाड़ियाँ,
तुम्हारे घर की गलियाँ,
तुम्हारे दोस्त,
तुम्हारा काम,
और शायद… वो मकान जिसे तुम घर कहते हो।

और मैं?

मैं बस तुम्हारी यादों में अटकी हुई एक आवाज़ हूँ शायद।
एक ऐसा नाम…
जो कभी-कभी तुम्हारे दिमाग़ से टकरा जाता होगा,
फिर रोज़मर्रा की ज़िंदगी के शोर में खो जाता होगा।

पर मैं…
मैं अब भी वहीं अटकी हूँ।

तुम्हारे एक गाने में।
एक स्टोरी में।
एक अधूरी बात में।
एक ऐसे एहसास में…
जिसका अंत शायद कभी लिखा ही नहीं गया।

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