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तुझको

क्या थी मैं…
जो एक दिन, एक पल भी
तुमसे बात किए बिना नहीं रह पाती थी।

और क्या हो गई हूँ आज…
कि चालीस दिन बीत गए,
और मैं अब भी ज़िंदा हूँ।

याद है?
कैसे मैं खुद को रोकती थी,
तुम्हारे मैसेज ignore करती थी,
बार-बार…
सिर्फ इसलिए क्योंकि मुझे डर था—
अगर एक बार तुम्हारी तरफ पूरी तरह मुड़ गई,
तो फिर कभी खुद तक वापस नहीं लौट पाऊँगी।

तुमने फिर भी कर लिया ना मुझे अपनी तरफ…
धीरे-धीरे,
मेरी हर आदत में उतरकर,
मेरी हर रात में बसकर।

मैं सोचती थी,
कैसे कोई किसी के बिना सो सकता है?
कैसे कोई छुए बिना, बात किए बिना,
इतना अपना लग सकता है?

पर तुमने मुझे सिखा दिया
कि इंसान किसी के अंदर
घर भी बना सकता है…
और वही घर एक दिन
उसे उजाड़ भी सकता है।

तुमसे निकलना…
शायद मेरी ज़िंदगी की सबसे मुश्किल चीज़ है।

हर आँसू जैसे
मेरे अंदर से तुम्हारा एक टुकड़ा बहाकर ले जाता है।
हर साँस जैसे
तुम्हारे बिना चलना सीख रही है।

आज somehow ये चालीस दिन निकल गए…
पर आगे के दिन कैसे निकलेंगे,
मुझे नहीं पता।

बस इतना जानती हूँ—
मैंने तुमसे मोहब्बत
यूँ ही नहीं की थी।

शायद इसलिए
तुमसे दूर जाना
मुझे एक ही बार में नहीं,
हर रोज़ थोड़ा-थोड़ा तोड़ रहा है।

चालीस दिन हो गए…
और मैंने हर दिन
तुम्हारे बिना जीना
नहीं, बस काटना सीखा है।

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