आदत
शायद मैं तुम्हें उतना भूल नहीं पाया
जितना दिखाया।
सच कहूँ?
तुम्हारे जाने के बाद मैंने सबसे पहले
अपने आप से झूठ बोलना शुरू किया था।
लोगों से नहीं।
खुद से।
मैंने खुद को समझाया कि
ये बस एक phase है,
थोड़ी दूरी है,
थोड़ा ego है,
थोड़ा silence है।
लेकिन अंदर कहीं मुझे शुरू से पता था
कि तुम्हारी कमी “temporary” नहीं होने वाली।
तुम्हें block होने के बाद पहली बार महसूस हुआ
कि access खत्म होना और connection खत्म होना
दो अलग चीज़ें होती हैं।
तुम कहीं दिखाई नहीं देती थी,
फिर भी हर जगह थी।
काम के बीच।
Late night scrolls में।
Random songs में।
Office के उन corners में जहाँ तुम याद आ जाओ।
और सबसे ज़्यादा…
उस silence में जिससे बचने के लिए मैं हर दिन कुछ ना कुछ करता रहा।
मैंने खुद को busy रखा।
जानबूझकर।
क्योंकि जैसे ही दिमाग खाली होता,
तुम शुरू हो जाती।
तुम्हारी आँखें।
तुम्हारी आदतें।
तुम्हारा मुझे notice करना।
तुम्हारा बिना बोले समझ जाना।
तुम्हें पता है सबसे बुरा क्या था?
तुम्हारी याद नहीं।
तुम्हारी absence की आदत पड़ना।
पहले हर चीज़ में instinctively तुम्हारा ख्याल आता था।
फिर धीरे-धीरे दिमाग खुद को रोकने लगा।
और उसी चीज़ ने डराया मुझे।
क्योंकि मैं तुम्हें भूलना नहीं चाहता था…
मैं बस इतना feel नहीं करना चाहता था।
कई रातें ऐसी गईं
जहाँ phone हाथ में लेकर सिर्फ ये सोचता रहा
कि अगर अभी message करूँ तो क्या होगा।
फिर ego बीच में आ जाता।
फिर डर।
डर कि शायद तुम सच में move on कर चुकी हो।
डर कि शायद तुम्हें अब फर्क नहीं पड़ता।
डर कि शायद मैं जितना महसूस कर रहा हूँ,
उतना तुम कभी कर ही नहीं रही थी।
और शायद इसी insecurity में
मैंने खुद को और ज्यादा emotionally बंद कर लिया।
हाँ, distractions थे।
लोग थे।
हँसी भी थी।
Attention भी मिला।
लेकिन कोई भी चीज़ उस जगह तक पहुँची ही नहीं
जहाँ तुम रह गई हो।
मैंने कोशिश की खुद को convince करने की
कि attraction था, बस attachment था।
लेकिन अगर सिर्फ attraction होता
तो तुम्हारी याद रात के 2 बजे इतनी भारी नहीं लगती।
फिर वो moments आते थे
जहाँ अचानक तुम्हारी बहुत कमी महसूस होती थी।
कोई खास reason नहीं।
बस एकदम से अंदर खालीपन उतर आता था।
और उस वक़्त सबसे ज़्यादा गुस्सा खुद पर आता था।
इसलिए नहीं कि मैंने तुम्हें खो दिया।
इसलिए कि जब तुम थी,
तब मैंने उतना express नहीं किया
जितना महसूस करता था।
तुम्हें शायद कभी समझ भी ना आए
कि कितनी बार मैंने तुम्हें casually treat किया
जबकि अंदर तुम मेरे लिए casual थी ही नहीं।
मैं बस vulnerable दिखना नहीं चाहता था।
और अब irony देखो —
जिस चीज़ से बचता रहा,
आज वही सबसे ज़्यादा महसूस होती है।
तुम।
कभी-कभी लगता है तुम वापस आ जाओगी।
कभी लगता है तुम अब पहले जैसी नहीं रही होगी।
कभी लगता है मैंने बहुत देर कर दी।
लेकिन एक बात आज भी honestly नहीं बदलती —
मैंने तुम्हें अपने दिमाग से ज़्यादा
अपनी आदतों में खोया है।
और आदतें…
इतनी आसानी से नहीं जातीं।

