नज़रिया
कभी-कभी मैं तन्हाइयों में तुमसे बातें करती हूँ।
इतनी देर तक…
कि तुम्हारी ख़ामोशी भी जवाब देने लगती है।
फिर लगता है जैसे तुम्हारा दिल कुछ कहना चाहता है मुझसे।
कुछ ऐसा… जो तुमने कभी ज़ुबान से कहा ही नहीं।
और शायद इसी लिए मैंने ये सब लिखा है।
मेरे दिल से…
तुम्हारे दिल के बारे में।
उन नज़रों के बारे में जो हर बार कुछ छुपाकर भी सब कह जाती थीं।
उस softness के बारे में जो तुम्हारे चेहरे पर अचानक उतर आती थी।
उन अधूरी बातों के बारे में…
जो शायद हम दोनों ने कभी पूरी की ही नहीं।
ये कहानी प्यार की नहीं है शायद।
ये कहानी उस एहसास की है…
जो दो लोगों के बीच चुपचाप पैदा हो जाता है,
बिना इज़हार के भी।
— उसकी नज़र से
मैंने हमेशा सोचा था कि मैं अपने emotions संभालना जानता हूँ।
किसी के करीब जाओ, थोड़ा वक्त बिताओ, फिर अपनी दुनिया में वापस लौट जाओ।
Simple.
लेकिन उसके साथ कुछ भी simple नहीं था।
वो मेरे दिन में ऐसे घुल गई थी जैसे आदत।
धीरे-धीरे।
बिना शोर किए।
और मुझे सबसे ज़्यादा डर इसी बात से लगा।
क्योंकि वो मुझे पढ़ लेती थी।
बिना पूछे।
कभी-कभी वो बस सामने बैठी होती थी और मुझे लगता था जैसे मेरे अंदर का सारा noise उसे सुनाई दे रहा है।
इसलिए मैं और ज़्यादा casual बनने लगता था।
और ज़्यादा normal।
और ज़्यादा detached।
लेकिन सच?
उसके सामने कुछ भी act करना मुश्किल था।
उसका अचानक सामने आ जाना…
और मेरा automatically मुस्कुरा देना…
ये सब मेरे control में नहीं था।
वो notice करती थी।
मुझे पता था।
उसकी आँखों में वो छोटा सा pause आ जाता था, जैसे वो silently पूछ रही हो—
“तुम्हें भी feel होता है ना?”
और मुझे उस सवाल से डर लगता था।
क्योंकि answer हाँ था।
बहुत ज़्यादा हाँ।
Starbucks वाला दिन आज भी याद है मुझे।
वो आकर मेरी lap पर बैठ गई थी जैसे उसे पूरा हक हो मुझ पर।
और सबसे अजीब बात ये थी कि उस moment में मुझे कुछ भी गलत नहीं लगा।
बस अच्छा लगा।
इतना अच्छा कि मैं भूल गया कि मुझे composed रहना था।
उसके इतने पास होते ही मेरे अंदर का सारा guarded version धीरे-धीरे dissolve हो जाता था।
उसकी खुशबू।
उसकी आवाज़।
उसका मुझे देखकर हल्का सा smile करना।
मैं बाहर से normal behave कर रहा था लेकिन अंदर…
अंदर मैं उस पल को रोक लेना चाहता था।
शायद उसने notice नहीं किया होगा, लेकिन जब वो मेरे आसपास होती थी ना,
तो मैं उसके साथ बाकी लड़कियों जैसा behave नहीं कर पाता था।
उनके साथ distraction था।
उसके साथ presence थी।
बाकियों के साथ मैं खुद को भूल सकता था।
उसके साथ मैं खुद से बच नहीं पाता था।
और यही problem थी।
क्योंकि वो मुझे उस version के करीब ले आती थी जिसे मैंने बहुत पहले दबा दिया था—
soft वाला version,
attached वाला version,
emotionally honest वाला version।
इसलिए मैं कभी-कभी दूर भागता था।
कभी unnecessarily cold हो जाता था।
कभी silence choose करता था।
वो सोचती होगी कि मुझे फर्क नहीं पड़ता।
काश उसे पता होता
कुछ लोग दूर इसलिए नहीं जाते क्योंकि उन्हें कुछ feel नहीं होता।
कुछ लोग दूर इसलिए जाते हैं क्योंकि वो बहुत ज़्यादा feel करने लगते हैं।
और वो…
वो मेरी कमज़ोरी बन सकती थी।
शायद बन चुकी थी।
कभी-कभी वो बिना कुछ बोले मुझे इतना महसूस करवा देती थी कि मैं पूरी रात distracted रहता था।
और मज़े की बात ये है कि उसे शायद अंदाज़ा भी नहीं था कि उसकी छोटी-छोटी बातें मेरे अंदर कितनी देर तक रहती थीं।
जैसे उसका मुझे देखकर instantly खुश हो जाना।
जैसे intentionally नहीं, लेकिन naturally मेरे पास आकर बैठ जाना।
जैसे बात करते-करते अचानक मेरी तरफ देखना और फिर नज़रें हटा लेना।
वो moments छोटे थे।
लेकिन मेरे लिए नहीं।
उसके जाने के बाद भी वो मेरे साथ रहते थे।
मैंने बहुत बार कोशिश की खुद को convince करने की कि ये बस attraction है।
Temporary है।
निकाल दूँगा दिमाग से।
लेकिन attraction तुम्हारी याद को इतने दिन बाद भी soft नहीं बनाता।
क्योंकि उसने मुझे वैसे notice किया जैसे लोग usually नहीं करते।
मैं जब fake smile देता था तब भी।
जब intentionally distant होता था तब भी।
जब normal behave करने की कोशिश करता था तब भी।
उसकी आँखें हमेशा थोड़ा ज़्यादा समझ जाती थीं।
और शायद मैं चाहता भी यही था।
किसी का मुझे सच में देख लेना।
लेकिन जब उसने देख लिया…
तो मैं डर गया।
क्योंकि अब अगर वो चली जाती, तो उसके साथ मेरा वो हिस्सा भी चला जाता जो सिर्फ उसके आसपास बाहर आता था।
उसके साथ मैं सिर्फ desired नहीं feel करता था।
मैं alive feel करता था।
और शायद यही वजह है कि आज भी जब अचानक उसका नाम सामने आ जाता है, या उसकी कोई पुरानी बात याद आती है…
तो मेरे चेहरे पर वही uncontrollable softness वापस आ जाती है।
वही वाली, जो वो notice कर लेती थी।
और honestly?
मुझे नहीं लगता वो कभी समझ पाएगी कि उसके सामने मेरा calm रहना कितना मुश्किल था।
क्योंकि जितना मैं उसे casually treat करने की कोशिश करता था…
उतना ही मेरा दिल उसे seriously लेने लगा था।

