एक लड़का है
थोड़ा-सा खोया-खोया रहता है।
दिन भर काम की धूप में चलता है,
और शाम ढले
जाने किस ख़याल में उतर जाता है।
एक मैं हूँ
थोड़ी-सी खोई,
थोड़ी-सी सोई रहती हूँ।
मगर मेरी नज़र
हर भीड़ में
उसी को तलाशती रहती है।
वो कभी एक पल को
पलटकर देख ले,
तो नज़रें झुक जाती हैं।
कभी यूँ ही
नज़र से नज़र मिल जाए,
तो दिल पागल-पागल हो उठता है।
और अगर वही नज़र
हल्की-सी मुस्कुराकर ठहर जाए…
तो दिल
घायल-घायल हो जाता है।
कभी
इंस्टाग्राम की स्टोरी पर
कोई गाना छोड़ जाता है।
उस गाने के बोल
मुझे समझ नहीं आते,
मगर जाने क्यों लगता है,
वो उसके दिल के बहुत क़रीब है।
इसलिए
मैं भी उसे
बार-बार सुनती रहती हूँ,
शायद किसी धुन में
उसकी ख़ामोशी का मतलब मिल जाए।
जाने किसे
वो फूल थमा आता है,
जाने किसकी हथेली पर
अपनी मुस्कान रख आता है।
बस इतना जानती हूँ
उसके हाथों से गुज़रने वाला
हर एक फूल,
मेरे दिल में
काँटा बनकर चुभ जाता है।
और जब
बरसात की किसी शाम,
सफ़ेद लिबास पहने
वो सामने से गुज़रता है…
तो इतना भाता है,
इतना भाता है,
कि जी चाहता है
उसे बस देखती रहूँ,
अपनी आँखों में उतार लूँ,
और फिर…
बरसात के पानी की तरह
उसे कहीं
बह जाने न दूँ।
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