Ananya ke farewell ki रात के बाद
मैं रोज़ की तरह ऑफिस पहुँचा। आदतें बड़ी अजीब होती हैं, इंसान बदल जाए, हालात बदल जाएँ, लेकिन आदतें नहीं बदलतीं। Bag अपनी Desk पर रखने से पहले ही मेरी नज़र Ananya की सीट की तरफ चली गई। मुझे पता था कि वह अब वहाँ नहीं होगी। मुझे यह भी पता था कि उसने नौकरी छोड़ दी है। फिर भी दिल ने एक बार देखने की ज़िद की, जैसे उसे अब भी किसी चमत्कार का इंतज़ार हो।
उसकी कुर्सी खाली थी।
मैं कुछ Second तक वहीं देखता रहा। फिर अपनी सीट पर आकर बैठ गया, laptop खोला और Screen पर नज़रें टिकाने की कोशिश करने लगा। लेकिन काम पर ध्यान देना आज शायद सबसे मुश्किल काम था। हर थोड़ी देर में मेरी नज़र फिर उसी खाली सीट पर चली जाती। ऐसा लग रहा था जैसे दिमाग अब भी इस सच को मानने से इंकार कर रहा हो कि अब वह रोज़ सुबह सामने बैठी दिखाई नहीं देगी। उस खाली कुर्सी ने पहली बार एहसास कराया कि किसी एक इंसान के चले जाने से सिर्फ़ जगह खाली नहीं होती, दिन भी खाली हो जाते हैं।
Saturday की रात के बाद से मैं बस उसी से मिलने का इंतज़ार कर रहा था। मैंने कभी नहीं सोचा था कि अगली बार जब मैं Office आऊँगा, तो वह यहाँ होगी ही नहीं। समझ नहीं आ रहा था कि उसने मुझे हर जगह block क्यों कर दिया। अगर वह मुझसे दूर ही जाना चाहती थी, तो उस रात मेरी आँखों में इतने यक़ीन से क्यों देख रही थी? अगर वह सिर्फ़ एक खूबसूरत इत्तेफ़ाक़ था, तो मैं उसे भूल क्यों नहीं पा रहा था? पिछले दो दिनों से मैंने खुद को न जाने कितनी बार समझाया था कि बस एक रात थी, आगे बढ़ जाओ। लेकिन दिल हर बार उसी जगह लौट आता, जहाँ वह मुझे छोड़कर गई थी।
मैं अपनी सीट पर बैठा तो सामने laptop खुला था, लेकिन Screen पर खुली हुई mails का एक भी शब्द समझ नहीं आ रहा था। मैं पढ़ने की कोशिश करता, फिर जाने कब मेरी नज़र अपने-आप Ananya की खाली सीट पर चली जाती। ऐसा पिछले दस मिनट में शायद पाँचवीं बार हुआ था। मैं खुद पर हल्का-सा मुस्कुरा दिया। इंसान भी कितना अजीब होता है। जिसे मालूम हो कि सामने कोई नहीं है, वह भी उसे ढूँढ़ना नहीं छोड़ता।
Office में सब कुछ पहले जैसा ही चल रहा था। किसी की हँसी सुनाई दे रही थी, कोई call पर था, कोई सुबह की coffee लेकर अपनी सीट तक जा रहा था। दुनिया किसी एक इंसान के चले जाने से नहीं रुकती, यह बात उस दिन पहली बार इतनी साफ़ समझ आई। रुकता है तो सिर्फ़ उसका वक़्त, जो उस इंसान को अपने दिन का हिस्सा बना चुका होता है।
मैं भी शायद वही कर चुका था।
मुझे खुद नहीं पता चला कि कब Ananya मेरी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बन गई थी। सुबह Office आते ही उसे देख लेना, कभी Corridor में अचानक टकरा जाना, Lunch के वक़्त उसका दिख जाना या शाम को उसकी हँसी सुन लेना… ये सब इतनी छोटी-छोटी बातें थीं कि कभी महसूस ही नहीं हुआ कि मैं इनका आदी हो चुका हूँ। लेकिन उसकी खाली कुर्सी मुझे हर कुछ मिनट बाद यही याद दिला रही थी कि कुछ आदतें तब तक दिखाई नहीं देतीं, जब तक वो छिन नहीं जातीं।
शायद इसी बेचैनी से बचने के लिए मैं अपनी कुर्सी से उठा और बिना किसी से कुछ कहे नीचे Smoking Area की तरफ चला गया। सुबह के करीब साढ़े दस बजे होंगे। वहाँ हमेशा की तरह कुछ लोग खड़े होकर cigarette के साथ ऑफिस, client, manager और deadline की बुराई कर रहे थे। मैं उनसे थोड़ा दूर जाकर खड़ा हो गया। उस वक़्त मुझे किसी से बात करने का बिल्कुल मन नहीं था।
मैंने जेब से cigarette निकाली, लाइटर जलाया और पहला कश लिया। धुआँ अंदर गया, लेकिन सीने में जो घुटन थी, वह वहीं की वहीं रही। कभी-कभी लगता है कि लोग cigarette पीते नहीं, उससे अपने अंदर की ख़ामोशी को थोड़ी देर के लिए धोखा देते हैं।
धुआँ हवा में छोड़ते हुए मैंने जेब से फोन निकाला। शायद मुझे पहले से ही पता था कि कुछ नहीं मिलने वाला, फिर भी दिल उम्मीद छोड़ने को तैयार नहीं था।
सबसे पहले मैंने Instagram खोला।
उसका नाम टाइप किया।कुछ नहीं आया।मैंने दोबारा search किया।फिर spelling बदलकर search किया।फिर उसकी पुरानी chat खोली।
User not found.
कुछ Second तक मैं स्क्रीन को देखता रहा। ऐसा नहीं था कि मुझे समझ नहीं आया था क्या हुआ है। समझ तो पहली बार में ही आ गया था। लेकिन दिल बड़ी अजीब चीज़ है, उसे सच एक बार में कभी समझ नहीं आता। वह बार-बार उसी दरवाज़े पर दस्तक देता है, जिसके बंद होने की आवाज़ वह खुद सुन चुका होता है।
मैंने WhatsApp खोला। हमारी आख़िरी बातचीत वहीं पड़ी थी। मैंने उसे शनिवार रात के बाद न जाने कितने messages किए थे। हर बार यही सोचकर कि शायद वह जवाब दे दे। शायद वह गुस्से में हो। शायद उसे थोड़ा वक़्त चाहिए। लेकिन अब लग रहा था कि शायद यहाँ भी मैं blocked था। अगर नहीं भी था, तो उसके जवाब न देने का मतलब शायद उससे भी ज़्यादा साफ़ था।
मैंने फोन लॉक किया और वापस जेब में रख लिया। दो कदम चला, फिर जाने क्यों दोबारा निकाल लिया। शायद इंसान उम्मीद से नहीं, आदत से हारता है। मुझे लग रहा था कि अभी फोन बजेगा… अभी उसका message आएगा… अभी वह लिखेगी, “Sugandh, हमें बात करनी चाहिए।”
लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ।
उस सुबह पहली बार मुझे महसूस हुआ कि मैं उसे सिर्फ़ याद नहीं कर रहा था… मैं उसे ढूँढ़ रहा था। हर उस जगह जहाँ वह अब थी ही नहीं।
और यही बात मुझे सबसे ज़्यादा डरा रही थी।
मैं ऐसा कभी नहीं था।
मैंने कभी किसी के पीछे भागने की कोशिश नहीं की। हमेशा यही मानता था कि जो जाना चाहता है, उसे रोकना नहीं चाहिए। रिश्ते अगर रोकने से बचते, तो दुनिया में कोई किसी से बिछड़ता ही नहीं। शायद इसलिए मैंने कभी किसी को मनाने की आदत भी नहीं डाली।
फिर आज ऐसा क्या बदल गया था?
एक लड़की, जिससे मैं कुछ ही दिनों पहले मिला था… जिसके साथ मैंने मुश्किल से कुछ घंटे बिताए थे… उसके चले जाने से मेरे अंदर इतना खालीपन कैसे आ गया?
इस सवाल का जवाब मेरे पास नहीं था।
लेकिन शायद…
मेरे अतीत के पास था।
शायद मैं Ananya के जाने का दुख नहीं जी रहा था।
शायद वह तो बस एक वजह थी।
असल दर्द कहीं और था।
मैंने बुझती हुई cigarette को नीचे फेंका और जूते से मसल दिया। धुएँ की आख़िरी लकीर हवा में घुलती रही और मैं उसे कुछ देर तक बस देखता रहा। जाने क्यों उस धुएँ को देखते-देखते एक पुराना नाम भीतर कहीं से उठकर सामने आ गया।
Saba.
कई साल हो गए थे यह नाम अपने आप मेरे ज़हन में आए हुए। मैं उससे जुड़ी यादों से भागता नहीं था, लेकिन उन्हें अपने पास बैठने भी नहीं देता था। मैंने उन्हें अपनी ज़िंदगी के एक ऐसे कमरे में बंद कर दिया था, जहाँ मैं खुद भी बहुत कम जाता था। बाहर से सब कुछ बिल्कुल सामान्य दिखाई देता था। लोग मुझे देखकर यही समझते थे कि मैं आगे बढ़ चुका हूँ। सच तो यह था कि मैंने आगे बढ़ना नहीं सीखा था, मैंने बस पीछे मुड़कर देखना छोड़ दिया था।
कहते हैं, पहला प्यार कभी नहीं भूलता।
मुझे लगता है, पहली मोहब्बत नहीं… पहला टूटा हुआ दिल कभी नहीं भूलता।
मैंने Saba से बेइंतहा मोहब्बत की थी। इतनी कि उसके बाद अपने अंदर बचा हुआ प्यार भी मुझे अधूरा लगने लगा था। उस उम्र में मुझे लगता था कि मोहब्बत का मतलब हमेशा साथ रहना होता है। अगर दो लोग एक-दूसरे से प्यार करते हैं, तो आख़िर में वही एक-दूसरे के हो जाते हैं। दुनिया की सबसे बड़ी ग़लतफ़हमी शायद यही होती है।
वह चली गई।
इतनी ख़ामोशी से कि मुझे समझने में महीनों लग गए कि वह सचमुच जा चुकी है।
उसके बाद मेरी ज़िंदगी खत्म नहीं हुई। मैं रोज़ की तरह उठता था, office जाता था, दोस्तों से मिलता था, हँसता भी था। ऊपर से सब कुछ बिल्कुल ठीक दिखाई देता था। लेकिन अंदर कुछ ऐसा टूट गया था, जिसे दोबारा जोड़ने की इच्छा भी नहीं बची थी।
धीरे-धीरे मैंने अपने लिए जीने का एक आसान तरीका ढूँढ़ लिया।
दिल को ज़्यादा काम ही मत करने दो।
किसी के इतना करीब मत जाओ कि उसके चले जाने से साँस लेना मुश्किल हो जाए।
शुरुआत में यह एक फैसला था।
फिर आदत बन गया।
उसके बाद जो भी मेरी ज़िंदगी में आया, मैंने उसे उतनी ही जगह दी, जितनी आसानी से वापस ली जा सके। रिश्ते बने, कुछ महीने चले, फिर खत्म हो गए। किसी ने सवाल नहीं पूछा, मैंने जवाब नहीं दिया। लोगों ने मुझे player कहा, किसी ने emotionally unavailable, किसी ने commitment issues वाला लड़का। मुझे फ़र्क नहीं पड़ता था। क्योंकि मुझे लगता था कि मैं जीत रहा हूँ।
अब कोई मुझे छोड़कर नहीं जा सकता था।क्योंकि मैं किसी को अपने अंदर आने ही नहीं देता था।और सच कहूँ…यह तरीका काम भी कर रहा था।कम से कम तब तक…
जब तक Ananya मेरी ज़िंदगी में नहीं आई।
उसने कोई कोशिश नहीं की थी मुझे बदलने की।उसने मुझसे कभी यह नहीं कहा कि अपने दिल के दरवाज़े खोल दो।उसने मुझसे प्यार का इज़हार भी नहीं किया।
उसने बस…मेरे साथ कुछ घंटे बिताए।और जाने कैसे, उन कुछ घंटों में वह वहाँ पहुँच गई, जहाँ पहुँचने में Saba को सालों लगे थे।शायद इसलिए मैं डर गया था।
मैं Ananya नहीं डर रहा था।मैं उस Sugandh से डर रहा था, जिसे मैंने बहुत मुश्किल से दफनाया था।और जो अब… फिर से ज़िंदा होने लगा था।
मैं वापस अपनी सीट पर आकर बैठ गया, लेकिन अब काम करने का दिखावा भी नहीं कर पा रहा था। Laptop खुला हुआ था, Gmail पर नई mails आती जा रही थीं, लेकिन मेरी उँगलियाँ Keyboard पर रखी होने के बावजूद एक शब्द भी टाइप नहीं कर रही थीं। ऐसा लग रहा था जैसे मेरा पूरा शरीर ऑफिस में बैठा हो, लेकिन दिमाग कहीं और अटका रह गया हो।
मैंने कुर्सी पर सिर टिकाकर आँखें बंद कर लीं।
“देखा?” दिमाग ने धीरे से कहा। “यही वजह थी कि तुमने अपने और लोगों के बीच दूरी बनानी शुरू की थी। तुम जानते थे कि एक दिन यही होगा।”
दिल ने कोई जवाब नहीं दिया।
“Saba के बाद कितने साल लगे थे खुद को संभालने में? भूल गए? कितनी मुश्किल से खुद को समझाया था कि अब किसी को इतना हक़ नहीं देना है कि उसके जाने से तुम्हारी दुनिया हिल जाए। फिर वही गलती क्यों की?”
मैंने गहरी साँस ली।
गलती…
क्या सचमुच गलती थी?
दिल पहली बार बोला।
“मैंने कुछ किया ही कहाँ था? मैं तो उससे बस मिला था।”
“यही तो परेशानी है,” दिमाग ने बिना देर किए जवाब दिया। “तुम्हें लगा था कि इस बार तुम सब कंट्रोल कर लोगे। तुमने सोचा था कि तुम पहले वाले इंसान नहीं रहे। लेकिन देखो खुद को। एक लड़की, जिससे मिले हुए मुश्किल से कुछ दिन हुए हैं, उसके जाने के बाद तुम उसका Instagram search कर रहे हो, WhatsApp खोल रहे हो, उसकी खाली कुर्सी देख रहे हो। क्या बदल गया?”
मैंने आँखें खोल दीं।
सवाल दिमाग मुझसे पूछ रहा था, लेकिन जवाब मेरे पास भी नहीं था।सच तो यह था कि मैं खुद को समझ ही नहीं पा रहा था।इतने सालों तक मैं जिस चीज़ से भागता रहा, उसी में वापस कैसे गिर गया? मैंने तो कभी ऐसा होने ही नहीं दिया था।
Saba के बाद मैंने अपने लिए एक नियम बना लिया था—No Strings Attached.
वह नियम किसी और के लिए नहीं था।वह मेरे लिए था।ताकि मुझे दोबारा कभी किसी के जाने का दुख न सहना पड़े।
मैंने रिश्ते बनाए, लेकिन अपने दिल तक किसी को पहुँचने नहीं दिया। लोग आए, कुछ दिन रहे, चले गए। किसी के जाने से फ़र्क नहीं पड़ा। मैं खुद से यही कहता रहा कि यही सही तरीका है। जितनी कम उम्मीद होगी, उतना कम दर्द होगा।
शायद इसलिए लोगों को मैं player दिखाई देता था।लेकिन उन्हें क्या पता था कि यह कोई attitude नहीं था…यह मेरी ढाल थी।मैं प्यार से नहीं भाग रहा था।मैं दर्द से भाग रहा था।
दिमाग फिर बोला, “और अब? अब क्या करोगे?”
मैं चुप रहा।
“अगर वह कभी वापस नहीं आई तो?”
इस सवाल ने जैसे भीतर कुछ खामोश कर दिया।
मैंने पहली बार उस Possibilty के बारे में सोचा।
क्या सचमुच अब मैं उससे कभी नहीं मिलूँगा?
क्या उस रात के बाद वही आख़िरी बार था जब मैंने उसे इतने पास से देखा था?
दिल ने इस बार बहुत धीरे से जवाब दिया।
“अगर सच में आख़िरी बार था…
तो शायद मैं उसे बताए बिना ही उससे प्यार करने लगा।”
उस एक ख़याल के बाद जैसे मेरे अंदर सब कुछ शांत हो गया।मैं उससे प्यार करने लगा था।यह बात शायद पहली बार मैंने खुद से कही थी।किसी और से नहीं।
खुद से।
अजीब बात यह थी कि इस एहसास से मुझे सुकून नहीं मिला। डर लगा। वही पुराना डर, जो Saba के जाने के बाद मेरे अंदर हमेशा के लिए घर बना चुका था। मुझे ऐसा लगने लगा था कि ज़िंदगी जब भी मुझे किसी इंसान के करीब लेकर जाती है, आख़िर में उसे मुझसे दूर कर देती है। शायद इसलिए पिछले कुछ सालों से मैंने किसी को अपनी ज़िंदगी में इतनी जगह दी ही नहीं थी कि उसके जाने का दर्द महसूस हो।
मैंने हमेशा यही समझा कि मैं बदल गया हूँ।
मैं practical हो गया हूँ। Emotional नहीं रहा।लेकिन आज समझ आ रहा था कि इंसान बदलता नहीं है, बस अपने ज़ख्मों के हिसाब से जीना सीख जाता है।
मैंने भी वही किया था।
मैंने अपने दिल के चारों तरफ दीवारें बना ली थीं। इतनी ऊँची कि बाहर वाले लोगों को लगता था, मुझे किसी की ज़रूरत ही नहीं है। मैं अकेला खुश हूँ। मुझे किसी रिश्ते की तलाश नहीं। मुझे किसी से प्यार नहीं चाहिए।
लेकिन यह आधा सच था।
या शायद…
झूठ।
मैंने कभी प्यार से नफ़रत नहीं की थी।मैं सिर्फ़ उसके बाद आने वाले दर्द से डरने लगा था।लोग अक्सर पूछते हैं, “यार, तुम्हें प्यार की इतनी ज़रूरत क्यों महसूस होती है? अकेले क्यों नहीं रह सकते?”
पहले मैं भी यही जवाब देता था कि मुझे किसी की ज़रूरत नहीं है।
लेकिन उस दिन पहली बार लगा…
शायद मुझे खुद से झूठ बोलते-बोलते बहुत साल हो गए हैं।मैं अकेले रह सकता हूँ।मैंने रहकर देखा है।मैंने अपने सपने अकेले पूरे किए हैं।अपने डर अकेले झेले हैं।अपनी लड़ाइयाँ अकेले लड़ी हैं।मैंने किसी के बिना जीना सीख लिया है।
लेकिन…
जी लेना और जीना…
दो अलग बातें हैं।
कुछ शामें ऐसी होती हैं जब ऑफिस से निकलते वक़्त बस इतना मन करता है कि कोई पूछ ले, “घर पहुँच गए?” कुछ जीतें ऐसी होती हैं जिनकी खुशी किसी के साथ बाँटे बिना अधूरी लगती है। कुछ हारें ऐसी होती हैं जिनमें सिर्फ़ किसी का चुपचाप पास बैठ जाना भी काफ़ी होता है।
और कुछ सफ़र…
ऐसे होते हैं जिन्हें अकेले तय तो किया जा सकता है, लेकिन याद हमेशा किसी के साथ ही बनती है।शायद प्यार की ज़रूरत इसी का नाम है।कमज़ोरी नहीं।साथ की इच्छा।मुझे पहली बार समझ आया कि मैं किसी ऐसे इंसान की तलाश में नहीं था जो मेरी ज़िंदगी बदल दे।मैं बस किसी ऐसे इंसान की तलाश में था जिसके साथ अपनी ज़िंदगी बाँट सकूँ।
और शायद…
Ananya के जाने के बाद पहली बार मुझे एहसास हुआ कि मैंने अनजाने में उसके लिए अपने अंदर वह जगह बना दी थी।
वही जगह…
जहाँ कभी Saba रहती थी।
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