Chapter 29

हर इंसान के पास कोई न कोई ऐसी जगह होती है जहाँ वह दुनिया से नहीं, खुद से मिलने जाता है।

किसी के लिए वह बचपन का घर होता है, किसी के लिए कोई beach, कोई पुरानी सड़क, कोई मंदिर, कोई café की वही corner वाली seat. कुछ लोग गाड़ी लेकर बिना destination निकल जाते हैं, कुछ headphones लगाकर इतनी देर चलते रहते हैं जब तक उनके अंदर चल रही बातें थोड़ी धीमी न पड़ जाएँ।

मेरे लिए हमेशा पहाड़ रहे।

यहाँ आकर मेरी problems कभी खत्म नहीं हुई थीं। Saba का जाना कम painful नहीं हुआ था। Amsterdam जाने का डर खत्म नहीं हुआ था। Office की problems नीचे Dharamshala में मेरा इंतज़ार करना नहीं छोड़ती थीं। अब Japan भी सिर्फ़ इसलिए कहीं गायब नहीं होने वाला था क्योंकि मैं Dhauladhar के सामने बैठ गया था।

लेकिन यहाँ आकर चीज़ें थोड़ी छोटी लगने लगती थीं।

शायद इसलिए नहीं कि वे सच में छोटी होती थीं, बल्कि इसलिए कि सामने कुछ ऐसा खड़ा होता था जो मुझसे बहुत पहले से था और मेरे बाद भी रहने वाला था।

पहाड़ answers नहीं देते।

बस कुछ देर आपके सवालों का बोझ हल्का कर देते हैं।

और शायद कई बार इंसान को answer से ज्यादा उसी की जरूरत होती है।

उस सुबह मैं Ananya को ऐसी ही एक जगह दिखाने ले जा रहा था।

एक ऐसी जगह, जिसके बारे में मैंने उसे कभी ठीक से नहीं बताया था।

Breakfast के समय वो मेरे सामने बैठी मेरी plate से खाना चुरा रही थी।

मैंने दूसरी बार उसका हाथ रोका।

“तुम्हारी अपनी plate है।”

“पता है।”

“तो मेरी क्यों?”

उसने मेरी plate से toast उठाते हुए कहा, “तुम्हारी better लग रही है।”

“Same bread है।”

“तुम्हें नहीं समझ आएगा।”

“क्या?”

“Relationship logic।”

मैं कुछ seconds उसकी तरफ़ देखता रह गया।

उसके हाथ में toast वैसे ही रुका था।

शायद उसे भी एक पल बाद महसूस हुआ कि उसने कौन-सा word casually बोल दिया है।

Relationship.

पिछले कुछ दिनों में हम उस word के आसपास कई बार घूम चुके थे। कभी girlfriend मज़ाक में निकल गया था, कभी boyfriend. हर बार हम दोनों ने या तो हँसकर बात बदल दी थी या pretend किया था कि कोई खास बात नहीं हुई।

इस बार उसने sorry नहीं कहा।

मैंने भी correction नहीं किया।

बस उसके होंठों पर हल्की-सी मुस्कान आई और मैंने plate उसकी तरफ़ थोड़ा और खिसका दी।

“ले लो।”

“इतनी आसानी से?”

“Relationship logic।”

वो हँस पड़ी।

शायद कुछ words को बहुत देर तक दरवाज़े के बाहर खड़ा रखो, तो एक दिन वो खुद अंदर चले आते हैं।

“आज कहाँ?” उसने chai उठाते हुए पूछा।

“एक जगह।”

“बस एक?”

“हाँ।”

उसने suspicious तरीके से मुझे देखा। “कल भी तुमने इसी tone में बहुत कुछ बोला था।”

“कल पूरा Dharamshala चार घंटे में दिखाना चाहता था।”

“आज enlightenment हो गया?”

“आज तुमने सिर्फ़ एक जगह की permission दी है।”

“Walking कितनी?”

“थोड़ी।”

उसने cup table पर रख दिया।

“तुम्हारे ‘थोड़े’ पर भरोसा नहीं है।”

मैं मुस्कुरा दिया।

वो तुरंत बोली, “ये smile और dangerous है।”

“चलो।”

“पहले distance बताओ।”

“Trust me।”

वो chair से उठते हुए बोली, “इस trip में सबसे महँगे दो words यही पड़े हैं।”

मैं हँस पड़ा।

Dharamkot से थोड़ा आगे तक car जा सकती थी।

उसके बाद रास्ता पैदल था।

सुबह साफ़ थी। रात की नमी अभी मिट्टी में बची हुई थी और deodar के ऊँचे पेड़ों के बीच से धूप कहीं-कहीं रास्ते पर गिर रही थी। हवा ठंडी थी, लेकिन उसमें वो सुबह वाली freshness थी जो चेहरे को सुन्न नहीं करती, बस आपको पूरी तरह जगा देती है।

Ananya आज unusually शांत थी।

कल तक वह हर थोड़ी देर में कुछ पूछ रही थी। यह road कहाँ जाती है, वो café कौन-सा है, यह पेड़ कौन-सा है, नीचे कौन-सा village है। आज वो मेरे पीछे आराम से चल रही थी, जैसे पहली बार उसे हर चीज़ का नाम जानने की जल्दी नहीं थी।

मैंने पीछे मुड़कर देखा।

“ठीक हो?”

“हाँ।”

“थक गई?”

“अभी से?”

“कल complain तुम कर रही थीं।”

“आज mentally prepared हूँ।”

मैं हँस दिया।

कुछ दूर बाद वो मेरे बराबर आ गई।

“तुम हमेशा ऐसे ही चलते हो?”

“कैसे?”

“जैसे तुम्हें exact पता है रास्ता कहाँ जा रहा है।”

“इस रास्ते का पता है।”

“बाकी life का?”

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

“बिल्कुल नहीं।”

“Good।”

“क्यों?”

“वरना बहुत irritating होते।”

“अभी कम हूँ?”

उसने थोड़ा सोचने का नाटक किया।

“Manageable।”

मैंने उसका हाथ पकड़ लिया।

वो मेरी तरफ़ देखे बिना मुस्कुरा दी।

हम कुछ देर वैसे ही चलते रहे।

रास्ते पर कहीं-कहीं चीड़ की सूखी पत्तियाँ बिछी थीं। उन पर पैर पड़ते तो कदमों की आवाज़ अपने-आप धीमी हो जाती। आसपास इतनी शांति थी कि कभी किसी दूर के पक्षी की आवाज़ साफ़ सुनाई देती, कभी सिर्फ़ पेड़ों से गुजरती हवा।

शहर में silence भी पूरी तरह silent नहीं होता।

यहाँ कभी-कभी लगता था जैसे पहाड़ आपको सुनने के लिए जगह दे रहे हों।

एक जगह रास्ता थोड़ा steep हुआ।

मैं आगे चढ़कर मुड़ा और हाथ बढ़ाया।

Ananya ने मेरा हाथ पकड़कर खुद को ऊपर खींचा।

ऊपर पहुँचकर उसने साँस छोड़ी।

“अगर तुम्हारी special जगह average निकली ना…”

“तो?”

“आज का बाकी दिन मैं decide करूँगी।”

“Done।”

उसने मेरी तरफ़ देखा।

“इतना confidence?”

“मुझे जगह पर है।”

“अपने ऊपर नहीं?”

“वो तो हमेशा है।”

“वही problem है।”

मैं हँस पड़ा।

कुछ और आगे जाने पर trees अचानक थोड़े कम होने लगे।

पहले उनके बीच से बस आसमान दिखाई दिया।

फिर एक turn आया।

और अगले ही पल सामने पूरा Dhauladhar खुल गया।

Ananya वहीं रुक गई।

उसने कुछ नहीं कहा।

बस खड़ी रही।

और शायद यही उसकी सबसे बड़ी reaction थी।

सामने बर्फ़ से ढकी चोटियाँ थीं। नीचे गहरे हरे ridges एक-दूसरे के पीछे उतरते हुए Kangra valley में खो रहे थे। कुछ छोटे clouds mountains के बीच ऐसे अटके थे जैसे उन्हें भी किसी destination तक पहुँचने की जल्दी ना हो। धूप peaks पर थी, लेकिन हमारी तरफ़ हवा में अभी भी ठंड बाकी थी।

Ananya ने phone निकाला।

Camera खोला।

फिर बिना photo लिए phone वापस pocket में रख दिया।

मैंने पूछा, “Photo नहीं?”

“बाद में।”

मैं मुस्कुराया।

कल तक हर view phone में पहले जाता था।

आज शायद उसने पहली बार decide किया था कि कुछ चीज़ें पहले आँखों में रखनी चाहिए।

वो धीरे-धीरे आगे बढ़ी।

एक flat rock के पास बैठ गई।

मैं उसके पास पहुँचा।

“यही?”

“हाँ।”

“यही special जगह?”

मैंने सिर हिलाया।

“नाम क्या है?”

“कोई proper नाम नहीं।”

वो मुस्कुराई।

“तुम्हें बिना नाम की चीज़ें बहुत पसंद हैं।”

मैं भी उसके पास बैठ गया।

“शायद।”

कुछ देर बाद वो मेरे और करीब आ गई। उसने मेरी jacket अपने shoulders के चारों तरफ़ कर ली और फिर आराम से मेरी बाँहों के बीच बैठ गई। उसकी पीठ मेरे सीने से लगी हुई थी और मेरे हाथ उसकी कमर के आसपास।

सामने mountains थे।

मेरी बाँहों में Ananya.

और उस जगह पर पहली बार मुझे सिर्फ़ सुकून महसूस नहीं हो रहा था।

कुछ और था।

जैसे कोई अधूरी तस्वीर अचानक पूरी दिखाई देने लगी हो।

मैं उस feeling का नाम नहीं देना चाहता था।

पिछले कुछ दिनों में नाम देने की जल्दी ने वैसे भी हमारी काफी problems बनाई थीं।

“तुम यहाँ बहुत आते थे?”

उसने सामने देखते हुए पूछा।

“एक time पर बहुत।”

“क्यों?”

“बस बैठने।”

वो हल्के से हँसी।

“आज ‘बस’ वाला जवाब नहीं चलेगा।”

“तुम rules बहुत जल्दी बना लेती हो।”

“और तुम जवाब बहुत देर से देते हो।”

मैं कुछ देर चुप रहा।

वो wait करती रही।

उसकी यही एक अच्छी और irritating बात थी।

वो कई बार मेरी silence से uncomfortable होकर उसे भरती नहीं थी।

बस वहीं रहती थी।

जब तक मैं खुद कुछ बोलूँ।

“जब दिमाग बहुत चलता था,” मैंने आखिर कहा।

“किस बारे में?”

“सब।”

“ये भी vague answer है।”

मैं मुस्कुराया।

फिर सामने Dhauladhar देखते हुए कहा, “Saba के बाद बहुत आया। Amsterdam जाने से पहले भी। वापस आने के बाद भी। कभी office की कोई problem होती थी, कभी घर की। कई बार कुछ होता भी नहीं था। बस अंदर से लगता था यहाँ आना है।”

Ananya पीछे मुड़कर मेरी तरफ़ देखने लगी।

“और यहाँ आकर सब ठीक हो जाता था?”

“नहीं।”

वो शायद उस जवाब की उम्मीद नहीं कर रही थी।

शायद उसे किसी और, थोड़ा रूमानी जवाब की उम्मीद थी।

मैंने उसके बालों को चेहरे से हटाते हुए कहा, “बस यहाँ बैठकर लगता था कि ठीक होना इतना urgent नहीं है।”

उसकी आँखें कुछ seconds मेरी आँखों पर रहीं।

फिर वो वापस सामने देखने लगी।

मैंने अपना चेहरा उसके बालों के पास रखा।

“पहाड़ों की यही अच्छी बात है।”

“क्या?”

“इन्हें जल्दी नहीं होती।”

मैंने सामने peaks की तरफ़ देखा।

“Cloud आएँगे, चले जाएँगे। Snow आएगी, melt होगी। मौसम बदलेगा। लोग आएँगे, चले जाएँगे। इन्हें कोई hurry नहीं।”

Ananya मेरी बाँहों पर fingers धीरे-धीरे फेरती रही।

“इसीलिए पसंद हैं?”

“शायद।”

“क्योंकि ये कहीं नहीं जाते?”

मैं हँसा।

“मैं खुद तो हमेशा कहीं ना कहीं जाता रहता हूँ।”

“Exactly।”

उसका जवाब तुरंत आया।

मैं चुप हो गया।

वो थोड़ा मेरी तरफ़ मुड़ी।

“तुम खुद कहीं टिकते नहीं। Delhi, Amsterdam, Dharamshala… अब Japan।”

“Hm.”

“लेकिन शायद तुम्हें ऐसी चीज़ें पसंद हैं जो तुम्हारे लौटने तक वहीं रहें।”

मैंने कुछ नहीं कहा।

वो सामने देखती रही।

फिर बहुत धीरे से बोली,

“शायद लोग भी।”

बात उसने बिना complaint के कही थी।

शायद इसीलिए ज्यादा अंदर तक गई।

उसकी उँगलियाँ मेरी बाँह पर धीरे-धीरे नीचे आईं।

मेरी sleeve थोड़ी ऊपर खिसकी हुई थी।

फिर अचानक उसकी fingers रुक गईं।

मैंने नीचे देखा।

वो tattoo को देख रही थी।

Coordinates.

सालों से मेरी skin पर लिखे हुए।

उसने मेरी कलाई हल्के से अपनी तरफ़ घुमाई। Numbers को ध्यान से देखा। फिर सामने mountains को।

फिर वापस tattoo.

उसके चेहरे पर पहले confusion था।

फिर अचानक कुछ याद आया।

वो एकदम मेरी तरफ़ मुड़ी।

“Sugandh…”

“Hm?”

“ये coordinates…”

उसकी finger tattoo पर ही थी।

उसने सामने पहाड़ की तरफ़ देखा।

“यहाँ के हैं?”

मैंने तुरंत जवाब नहीं दिया।

अजीब था।

इतने साल एक बात को avoid करने के बाद उसका जवाब सिर्फ़ एक शब्द था।

“हाँ।”

वो कुछ seconds मुझे देखती रही।

“Seriously?”

“हाँ।”

“तुमने कभी बताया क्यों नहीं?”

मैंने मुस्कुराकर कहा, “तुमने कभी—”

“Don’t.”

मैं हँस पड़ा।

“क्या?”

“ये मत बोलना मैंने कभी पूछा नहीं।”

“मैं वही बोलने वाला था।”

“मैंने पूछा था।”

“याद है।”

“एक बार नहीं।”

“वो भी याद है।”

“और तुम हमेशा कहते थे story लंबी है।”

मैं मुस्कुराया।

“हाँ।”

उसने मेरी arm पर हल्का-सा मारा।

“Idiot।”

इस बार मैं हँस रहा था।

वो नहीं।

“अब बताओ।”

मैंने tattoo की तरफ़ देखा।

फिर सामने Dhauladhar.

“Actually story बहुत छोटी है।”

“तो इतने साल क्यों छुपाई?”

मैंने थोड़ा सोचा।

“शायद मुझे लगता था सुनने में stupid लगेगी।”

“वो मैं decide करूँगी।”

मैं कुछ seconds चुप रहा।

फिर बोला, “Saba के बाद जब सब थोड़ा… खराब था, मैं यहाँ बहुत आता था।”

उसने कोई reaction नहीं दिया।

बस सुनती रही।

“एक दिन यहीं बैठा था। Phone में location खोली। Coordinates सामने थीं। पता नहीं क्यों screenshot ले लिया।”

“फिर?”

“कुछ time बाद tattoo करा लिया।”

वो फिर numbers देखने लगी।

“क्यों?”

मैंने सामने पहाड़ों की तरफ़ देखा।

“ताकि याद रहे कि अगर कभी सब बहुत ज्यादा हो जाए…”

मैं थोड़ा रुका।

“…तो कहीं है जहाँ मैं वापस आ सकता हूँ।”

Ananya बिल्कुल चुप हो गई।

उसकी fingertips अभी भी tattoo पर थीं।

कुछ seconds बाद उसने बहुत धीरे से पूछा,

“घर?”

मैंने shoulder हल्के से उठा दिया।

“शायद।”

वो मेरी arm को देखती रही।

फिर मेरे चेहरे को।

उसकी आँखों में अचानक एक अजीब-सी softness आ गई।

“मतलब तुम इतने सालों से अपने शरीर पर घर लेकर घूम रहे हो।”

मैं उसकी तरफ़ देखता रह गया।

मैंने उस tattoo को हजारों बार देखा था।

लेकिन कभी उस तरह नहीं।

कई बार हम अपनी कहानी के इतने करीब होते हैं कि उसका अर्थ हमें खुद दिखाई नहीं देता।

कोई दूसरा आता है।

एक line बोलता है।

और वही चीज़ अचानक दूसरी लगने लगती है।

Ananya फिर मेरी बाँहों के बीच आकर बैठ गई।

लेकिन इस बार उसका एक हाथ मेरी forearm पर था।

उसकी fingertips coordinates पर धीरे-धीरे घूम रही थीं।

कुछ देर बाद उसने कहा,

“अब समझ आया।”

“क्या?”

“तुम।”

मैं हँस दिया।

“दो दिन में बहुत समझने लगी हो।”

वो पीछे मुड़ी।

“मैं serious हूँ।”

मेरी हँसी रुक गई।

वो सामने mountains देखते हुए बोलने लगी।

“Office वाला Sugandh पता था।”

“कैसा?”

“थोड़ा overconfident।”

“गलत।”

“बहुत flirt।”

“Allegation।”

“और बहुत irritating।”

“Defamation।”

वो मुस्कुरायी।

फिर उसकी आवाज़ थोड़ी नरम हो गई।

“Amsterdam वाला थोड़ा stories से पता था। वो Sugandh भी पता था जो हर serious बात के बीच joke डाल देता है। जो लोगों को अपने बहुत पास आने देता है… लेकिन फिर भी पता नहीं कैसे एक छोटा-सा हिस्सा हमेशा बचाकर रखता है।”

मैंने कोई defence नहीं दिया।

शायद इसलिए क्योंकि वो गलत नहीं थी।

“लेकिन ये वाला नहीं पता था।”

“कौन-सा?”

उसने सामने देखते हुए कहा,

“जो यहाँ आकर चुप हो जाता है।”

मैं उसे देखने लगा।

“जो किसी chai वाले uncle के पास आधा दिन बैठ सकता है। जिसे रास्ते का नाम याद हो या ना हो, लेकिन ये याद है कि किस मोड़ के बाद mountains दिखते हैं। जो दुनिया भर घूम सकता है, लेकिन जब अंदर कुछ बहुत heavy हो जाए तो आखिरकार यहीं लौटता है।”

उसकी उँगलियाँ फिर tattoo पर आ गईं।

“और जो इतना attached है इस जगह से कि coordinates अपने हाथ पर लिखवा लेता है… लेकिन बाकी दुनिया के सामने ऐसे behave करता है जैसे attachment कोई बीमारी हो।”

“मैंने ऐसा कभी नहीं कहा।”

वो हल्के से मुस्कुरायी।

“तुमने कहने की जरूरत ही नहीं छोड़ी।”

मैं चुप हो गया।

उसकी बात में कोई शिकायत नहीं थी।

कोई accusation नहीं।

बस समझ थी।

और शायद किसी का आपको judge करना उतना uncomfortable नहीं होता…

जितना किसी का आपको सही-सही समझ लेना।

कुछ देर बाद मैंने पूछा,

“चलें?”

“कहाँ?”

“Naddi जा सकते हैं।”

“नहीं।”

“Dal Lake?”

“नहीं।”

“नीचे एक café—”

वो पूरी तरह मेरी तरफ़ मुड़ गई।

“Sugandh।”

“क्या?”

“मुझे कहीं नहीं जाना।”

मैंने eyebrow उठाई।

“कल तक हर जगह photo चाहिए थी।”

“आज नहीं।”

“क्यों?”

वो कुछ seconds मुझे देखती रही।

फिर बहुत धीरे से कहा,

“जिसे देखने आई थी… वो तो देख लिया।”

मेरे चेहरे पर अपने-आप मुस्कान आ गई।

मैंने उसके चेहरे से हवा में आती एक लट हटाई।

“तुम पहले ऐसी बातें नहीं करती थीं।”

उसकी आँखों में हल्की-सी शरारत आई।

“शायद पहले तुम्हारे इतना करीब भी नहीं थी।”

उसके बाद मेरे पास कहने के लिए कुछ खास बचा नहीं।

मैंने बस उसे अपनी बाँहों में थोड़ा और समेट लिया।

वो मेरे सीने पर सिर रखकर सामने पहाड़ों को देखने लगी।

कुछ देर बाद मुझे लगा—

शायद मैं पिछले दो दिनों से उसे गलत चीज़ दिखाने की कोशिश कर रहा था।

मैं चाहता था वो मेरी adventures देखे।

मेरे treks.

मेरी roads.

मेरे cafés.

वो जगहें जहाँ मैं बारिश में फँसा था। वो trails जहाँ बिना planning निकल गया था। मैं उसे दिखाना चाहता था कि मेरी life कितनी बड़ी रही है, कितनी unpredictable, कितनी free.

शायद impress करने के लिए नहीं।

मैं चाहता था वो समझे मैं कौन हूँ।

लेकिन Ananya ने मेरी सारी adventures के बीच उस एक आदमी को ढूँढ़ लिया था जो किसी पहाड़ के सामने अकेला बैठकर खुद को ठीक करने की कोशिश करता रहा था।

शायद वही मेरा सबसे सच वाला version था।

और शायद मैं उसे ही सबसे ज्यादा छुपाता रहा था।

हम वहीं बैठे रहे।

एक घंटा।

शायद दो।

मैंने समय नहीं देखा।

पहाड़ों पर clouds धीरे-धीरे नीचे से ऊपर आने लगे थे। कुछ देर पहले जो peak पूरी दिखाई दे रही थी, अब उसका आधा हिस्सा सफेद धुंध में छुप गया था। हवा थोड़ी और ठंडी हुई तो Ananya मेरे और करीब आ गई।

उसने सामने देखकर कहा,

“देखो।”

“क्या?”

“Mountain।”

मैं हँसा। “हाँ, तीन दिन से वही देख रहे हैं।”

“नहीं।”

उसने सामने इशारा किया।

“अभी वही mountain है… बस दिख कम रहा है।”

मैं उसकी तरफ़ देखकर मुस्कुराया।

“तुम्हें भी metaphor वाली बीमारी हो गई।”

वो हँसी।

“तुमसे लगी है।”

मैंने उसके बालों पर हल्का-सा kiss किया।

कुछ देर बाद उसने पूछा,

“तुम्हें mountains में सबसे ज्यादा क्या पसंद है?”

“View।”

“झूठ।”

“अब तुम मुझे मुझसे ज्यादा जानती हो?”

“Fast learner।”

मैंने थोड़ा सोचा।

“शायद ये कि ये कुछ पूछते नहीं।”

वो चुप हो गई।

मैंने आगे कहा, “जब चाहे आ जाओ। कोई explanation नहीं। कोई complaint नहीं।”

इस बार उसने बहुत धीरे से कहा,

“यही तो problem है।”

मैं उसकी तरफ़ देखने लगा।

“क्या?”

वो मेरी बाँहों के अंदर थोड़ा घूमकर मेरी तरफ़ हुई।

“तुम्हें ऐसी चीज़ें पसंद हैं जो तुमसे सवाल नहीं करतीं।”

मैं कुछ बोलने वाला था, लेकिन उसने आगे कहना शुरू कर दिया।

“तुम दो साल बाद वापस आओ, ये नहीं पूछेंगे कहाँ थे। चार साल बाद आओ, नाराज़ नहीं होंगे। इन्हें छोड़कर चले जाओ, ये hurt नहीं होंगे।”

वो वापस Dhauladhar देखने लगी।

“और जब वापस आओगे… जहाँ छोड़ा था, वहीं मिलेंगे।”

मैंने सामने देखा।

पहाड़ वही थे।

लेकिन उसकी बात के बाद अचानक वे मुझे थोड़ा अलग लगने लगे।

शायद यही relationship मैं लोगों से भी चाहता रहा था।

मैं चला जाऊँ।

जब चाहूँ।

Amsterdam.

Dharamshala.

अब Japan.

अपनी life पूरी तरह जीऊँ।

और जब लौटूँ तो दूसरा इंसान वहीं मिले।

उसी जगह।

उसी feeling के साथ।

कोई सवाल नहीं।

कोई शिकायत नहीं।

कोई change नहीं।

जैसे मैंने उसे छोड़ा था, वैसे ही।

मैंने कभी consciously ये नहीं सोचा था।

लेकिन शायद मेरे decisions में यही expectation छुपी रहती थी।

लोग mountains नहीं होते।

वे इंतज़ार में खड़े नहीं रहते।

उन्हें भी जिंदगी जीनी होती है।

वे बदलते हैं।

नई चीज़ें चाहते हैं।

नई जगहें देखते हैं।

कभी नए लोगों से मिलते हैं।

कभी feelings भी बदल जाती हैं।

और शायद प्यार का सबसे मुश्किल हिस्सा सामने वाले को अपने पास रखना नहीं होता।

उसे इंसान रहने देना होता है।

मैंने Ananya को थोड़ा और अपने पास कर लिया।

उसने पूछा,

“क्या हुआ?”

मेरे मुँह से habit में निकला,

“कुछ नहीं।”

वो हँस पड़ी।

“अब नहीं मानूँगी।”

मैं भी हल्का-सा मुस्कुराया।

फिर काफी देर बाद बोला,

“शायद तुम सही हो।”

“एक minute।”

उसने imaginary phone निकालने का अभिनय किया।

“Record करूँ?”

“Serious हूँ।”

उसकी smile धीरे-धीरे कम हो गई।

मैं सामने देखते हुए बोला, “Japan जाकर शायद कहीं ना कहीं मेरे अंदर ये expectation होगी कि जब मैं वापस आऊँ… तो सब ऐसा ही हो।”

वो चुप रही।

“तुम भी।”

मैंने उसके हाथ की तरफ़ देखा।

“मैं भी।”

फिर सामने mountains.

“हम भी।”

Ananya ने कुछ seconds बाद कहा,

“नहीं होंगे।”

Simple sentence था।

फिर भी अंदर कुछ खिंच गया।

शायद उसने मेरे चेहरे पर पढ़ लिया।

वो तुरंत मेरी तरफ़ घूमी।

“मैं ये नहीं कह रही कि हम नहीं होंगे।”

मैं चुप रहा।

“मैं कह रही हूँ हम ऐसे नहीं होंगे।”

उसने मेरा हाथ पकड़ लिया।

“चार साल बहुत होते हैं, Sugandh।”

मैं उसे देखता रहा।

“तुम बदलोगे।”

“मैं बदलूँगी।”

“तुम्हारी life वहाँ अलग होगी।”

“मेरी यहाँ।”

“तुम नए लोगों से मिलोगे।”

“मैं भी।”

“Jobs बदलेंगी। Priorities बदलेंगी। शायद dreams भी।”

मैंने धीरे से पूछा,

“और हम?”

वो कुछ देर मेरी आँखों में देखती रही।

“हम जो भी होंगे…”

उसने मेरे हाथ को दोनों हाथों में ले लिया।

“…कम-से-कम सच होंगे।”

उस line पर मैंने कुछ नहीं कहा।

वो आगे बोली,

“मुझसे ये promise मत माँगना कि चार साल बाद मैं exactly यही Ananya रहूँगी।”

शायद मेरे भीतर का कोई हिस्सा वही promise चाहता था।

एक stupid, romantic certainty.

Wait for me.

Always.

Forever.

लेकिन हम दोनों शायद अब तक enough life देख चुके थे ये जानने के लिए कि words बहुत आसानी से बोल दिए जाते हैं।

चार साल आसानी से नहीं गुजरते।

“और मैं तुमसे भी नहीं माँगूँगी कि Tokyo जाकर अपनी जिंदगी रोक दो,” उसने कहा।

“मतलब?”

“मतलब मुझे miss करना।”

उसके होंठों पर हल्की-सी मुस्कान आई।

“बहुत करना।”

मैं भी मुस्कुरा दिया।

“Call करना।”

“Hm.”

“लड़ना।”

“वो तो होगा।”

“लेकिन अपनी life मेरे लिए बचाकर मत रखना।”

इस बार मैं उसकी तरफ़ देखने लगा।

वो बिल्कुल serious थी।

“अपने dreams पूरे करना। Travel करना। दोस्त बनाना। जो चीज़ें तुम्हें Sugandh बनाती हैं, उन्हें मेरे नाम पर मत छोड़ना।”

मैंने काफी देर कोई जवाब नहीं दिया।

फिर पूछा,

“और तुम?”

“मैं?”

“मेरे जाने को अपनी life की tragedy मत बना लेना।”

वो थोड़ा मुस्कुरायी।

“Try करूँगी।”

“Try?”

“Honest answer है।”

मैं हँसा।

“Fair.”

कुछ देर बाद Ananya ने कहा,

“एक promise कर सकते हैं।”

“हमने promises नहीं करने थे।”

“ये अलग है।”

“क्या?”

“Disappear नहीं करेंगे।”

मैं हँस पड़ा।

“Important।”

“Block नहीं करेंगे।”

“Definitely.”

“Silent treatment नहीं।”

मैंने थोड़ा सोचा।

“Depends तुमने क्या किया।”

उसने elbow मेरी ribs पर मारी।

“Okay, okay. नहीं।”

वो फिर serious हो गई।

“और अगर कभी feelings बदलें…”

उसका sentence बीच में रुक गया।

मैंने उसे देखा।

शायद पहली बार पूरे conversation में उसे भी वही डर लगा था जो मुझे लग रहा था।

मैंने धीरे से पूछा,

“तो?”

“बोल देंगे।”

यह आसान promise नहीं था।

यह romantic भी नहीं था।

कम-से-कम उन promises जैसा नहीं जो फिल्मों में लोग पहाड़ों के सामने करते हैं।

लेकिन शायद सबसे real यही था।

मैंने सिर हिलाया।

“ठीक।”

वो कुछ seconds मुझे देखती रही।

मैंने पूछा,

“और अगर नहीं बदलीं?”

इस बार उसकी मुस्कान धीरे-धीरे लौट आई।

“वो भी बोल देंगे।”

मैंने उसके माथे पर kiss किया।

वो मेरे गले से लग गई।

कुछ देर तक मैं बस उसे पकड़े रहा।

शायद यही पहला promise था जो हमने एक-दूसरे को बाँधने के लिए नहीं किया था।

बस अपने बीच सच के लिए एक रास्ता खुला रखने के लिए।

मैंने पूछा,

“अगर कल तुम्हें कोई बहुत बड़ा opportunity मिले?”

“ले लूँगी।”

“कहीं और जाना पड़े?”

“जाऊँगी।”

“Good।”

वो मेरी तरफ़ घूम गई।

“इतनी आसानी से?”

“क्या?”

“तुम रोक नहीं सकते।”

मैंने मुस्कुराकर कहा,

“मैंने कब कहा रोकूँगा?”

“मन करेगा?”

इस बार मैंने answer देने में थोड़ा समय लिया।

“शायद।”

उसकी आँखें मेरी आँखों पर थीं।

“लेकिन रोकूँगा नहीं।”

उसका चेहरा थोड़ा soften हुआ।

“मैं भी।”

“मतलब?”

उसने सामने mountains की तरफ़ देखा।

“अगर तुम Japan नहीं जाते तो शायद मुझे अच्छा लगता।”

मैं कुछ नहीं बोला।

“बहुत अच्छा।”

फिर वो मेरी तरफ़ देखने लगी।

“लेकिन अगर मेरी वजह से नहीं जाते…”

वो कुछ seconds रुकी।

“…तो शायद कुछ साल बाद मुझे खुद से नफ़रत होती।”

मैं चुप हो गया।

उसने मेरी उँगलियाँ पकड़ लीं।

“मैं तुम्हारे अंदर की वो चीज़ नहीं खत्म करना चाहती जो तुम्हें Amsterdam ले गई थी। जो तुम्हें नई जगहें देखने के लिए बेचैन करती है। जो तुम्हें mountains पर लेकर आती है। जो Japan के लिए हाँ बोल सकती है।”

उसकी fingers फिर tattoo पर चली गईं।

“पहले मुझे लगता था तुम्हारी ये restlessness problem है।”

“अब?”

उसने Dhauladhar की तरफ़ देखा।

“अब लग रहा है… शायद यही सब मिलकर तुम बनते हो।”

कुछ देर तक मैंने उसे सिर्फ़ देखा।

फिर उसके बालों के ऊपर अपने होंठ रख दिए।

उसने आँखें बन्द कर लीं।

और शायद उस समय Ananya ने पहली बार Japan को accept नहीं किया था।

वो अभी भी नहीं चाहती थी कि मैं जाऊँ।

लेकिन उसने उस Sugandh को accept करना शुरू कर दिया था जो जाना चाहता था।

शायद फर्क वहीं था।

और शायद प्यार में वही फर्क सबसे मुश्किल होता है।

कुछ देर बाद clouds और नीचे आ गए।

हवा में अचानक नमी बढ़ गई।

Ananya ने मेरा tattoo फिर देखा।

फिर बहुत धीरे से पूछा,

“जब Japan में बहुत मुश्किल हो…”

“होगी।”

“जब बहुत अकेला लगे…”

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

“Hm.”

“जब दिमाग बहुत चले…”

मैं हँसा।

“वो guaranteed है।”

उसने मेरी बाँह पर बने coordinates को हल्के से छुआ।

“यहाँ आ जाना।”

मैंने आसपास देखा।

“Japan से Dharamshala?”

वो मुस्कुरा दी।

फिर tattoo पर tap किया।

“यहाँ।”

बस एक word.

मैं अपनी arm की तरफ़ देखने लगा।

इतने साल मैंने इन coordinates को एक जगह की तरह देखा था।

एक escape.

एक reminder कि अगर सब खराब हो जाए तो मेरे पास कहीं वापस आने को है।

मैंने Ananya की तरफ़ देखा।

उसकी आँखें मेरे चेहरे पर थीं।

मैंने बहुत धीरे से कहा,

“शायद अब अकेला नहीं आऊँगा।”

वो कुछ seconds मुझे देखती रही।

उसने पूछा नहीं इसका मतलब क्या था।

ना मैंने explain किया।

बस वो मेरे गले से लग गई।

और शायद सही भी यही था।

कुछ lines को समझाने लगो तो उनका meaning छोटा हो जाता है।

हमने उस दिन बाकी कोई जगह नहीं देखी।

मेरी सारी lists, सारे plans, सारे “बस ये एक जगह और” phone के अंदर पड़े रहे।

करीब दो घंटे हम वहीं बैठे रहे।

कभी बातें कीं।

कभी नहीं।

Ananya कभी mountains की photo लेती, फिर phone side में रख देती। एक बार मैंने उसे सामने देखते हुए photo लेने की कोशिश की तो उसने camera notice कर लिया।

“Candid खराब कर दिया।”

“मेरी permission?”

“Memory के लिए।”

उसने मुस्कुराकर कहा,

“Photos में smell नहीं आती।”

मैं हँस पड़ा।

“Postcard वाली line?”

“काम की line है।”

फिर थोड़ी देर बाद उसकी आवाज़ धीमी हो गई।

“शायद postcard सिर्फ़ Dharamshala याद रखने के लिए नहीं लिया था।”

“फिर?”

उसने मेरी तरफ़ देखा।

“तुम्हें याद रखने के लिए।”

मैंने कोई clever जवाब नहीं दिया।

बस उसका हाथ पकड़ लिया।

उसके हाथ मेरे हाथों में आकर जैसे खुद-ब-खुद कैद हो गए।

एक strange बात थी।

पहले मैं चाहता था ये चार दिन उसके लिए unforgettable हों।

अब मुझे डर लग रहा था कि शायद सच में हो रहे थे।

नीचे उतरते हुए हम एक साथ चल रहे थे।

इस बार मैं आगे नहीं भाग रहा था।

ना मुझे जल्दी नीचे पहुँचना था।

Ananya कहीं रुकती तो मैं भी रुक जाता। किसी छोटे flower को देखती तो उसके साथ खड़ा हो जाता। किसी turn पर valley अच्छी लगती तो हम कुछ देर वहीं रह जाते।

मैंने कोई जल्दी नहीं की।

शायद पहली बार मैंने उस trip में रास्ते को destination से कम important नहीं माना।

एक जगह उसका पैर थोड़ा फिसला और वो लगभग मेरे ऊपर आ गिरी।

मैंने उसे पकड़ लिया।

वो हँसने लगी।

“Adventure दिखा रहे थे ना?”

“Bonus था।”

“Refund चाहिए।”

“Japan से भेज दूँगा।”

Sentence निकलते ही हँसी दोनों की थोड़ी कम हो गई।

पहले शायद मैं तुरंत कोई joke मारकर उस silence से निकल जाता।

इस बार नहीं।

हमने तय किया था uncomfortable बातें भी हमारे साथ रहेंगी।

Ananya ने बस मेरा हाथ पकड़ लिया।

थोड़ा ज्यादा कसकर।

मैंने भी।

और हम नीचे चलते रहे।

Car तक पहुँचते-पहुँचते सूरज नीचे जाने लगा था।

आसमान पहले हल्का yellow था, फिर orange होने लगा। दूर की ridges dark होती जा रही थीं। नीचे valley में कुछ houses में lights जल चुकी थीं।

Ananya bonnet से टिककर sunset देखने लगी।

मैं उसके पास खड़ा हो गया।

कुछ देर बाद उसने अपना सिर मेरे shoulder पर रख दिया।

मैंने पूछा,

“आज कुछ miss किया?”

“बहुत कुछ।”

“Naddi।”

“Hm.”

“Dal Lake.”

“Hm.”

“एक café था।”

“Hm.”

“Regret?”

“नहीं।”

“क्यों?”

वो मेरी तरफ़ मुड़ी।

उसकी आँखों में sunset की हल्की orange reflection थी।

“अगली बार।”

मैं कुछ seconds उसे देखता रहा।

शायद उसने खुद भी line बोलने के बाद उसका meaning महसूस किया।

अगली बार।

कोई promise नहीं।

कोई date नहीं।

कोई guarantee नहीं।

बस future की तरफ़ थोड़ा-सा खुला हुआ दरवाज़ा।

मैंने बहुत धीरे से पूछा,

“अगली बार?”

उसने shoulders हल्के से ऊपर किए।

“इतनी सारी जगहें जानबूझकर छोड़ी हैं।”

मैं मुस्कुराया।

“जानबूझकर?”

“हाँ।”

“क्यों?”

वो मेरे और करीब आई।

“वापस आने की वजह चाहिए।”

इस बार मैंने कुछ नहीं कहा।

उसके माथे पर kiss किया।

वो मेरे गले से लग गई।

और शायद पहली बार मुझे लगा कि प्यार का मतलब हर बार किसी को अपने पास रोक लेना नहीं होता।

कई बार प्यार इतना-सा होता है कि दोनों अपनी-अपनी राह पर चले जाएँ…

लेकिन एक रास्ता वापस आने के लिए खुला छोड़ दें।

Mountains ने मुझे हमेशा लौटना सिखाया था।

Ananya शायद पहली इंसान थी जिसने मुझे यह समझाया कि लौटने का कोई अर्थ तभी है…

जब सामने वाले को भी जाने की आज़ादी हो।

Car में बैठकर Ananya gallery देखने लगी।

पिछले कुछ दिनों की इतनी photos थीं कि शायद हमें खुद याद नहीं था कौन-सी कहाँ की है।

Bir.

Paragliding.

McLeodganj.

Bhagsu.

Dharamkot.

हमारी random selfies.

Wildflowers.

Roadside chai.

आज की ridge.

एक photo पर वो कुछ seconds रुकी।

मेरी forearm foreground में थी।

Tattoo साफ़ दिखाई दे रहा था।

पीछे Dhauladhar blur था।

उसने phone मेरी तरफ़ किया।

“ये रखूँ?”

मैंने photo देखा।

“तुम्हारा phone है।”

“Tattoo तुम्हारा है।”

मैं हँस दिया।

“रखो।”

उसने photo को favourite कर दिया।

फिर कुछ देर gallery में कुछ करती रही।

मैंने पूछा,

“क्या कर रही हो?”

“कुछ नहीं।”

“ये मेरा answer था।”

“अब copyright खत्म।”

मैंने car start की।

लेकिन screen बन्द होने से ठीक पहले मेरी नज़र उसके phone पर चली गई।

उसने नया album बनाया था।

Four Days.

मैंने सामने road की तरफ़ देखा।

कुछ नहीं कहा।

वो भी शायद समझ गई थी कि मैंने देख लिया है, लेकिन उसने explain नहीं किया।

कुछ minute हम चुप रहे।

फिर उसका हाथ मेरी तरफ़ आया।

मैंने पकड़ लिया।

Road नीचे Dharamshala की तरफ़ उतर रही थी। Valley में lights एक-एक करके जल रही थीं। ऊपर आसमान का आख़िरी रंग भी धीरे-धीरे गहरा हो रहा था।

कुछ देर बाद Ananya ने पूछा,

“कल?”

मैंने steering से नज़र हटाए बिना कहा,

“क्या?”

“कल आख़िरी पूरा दिन है?”

मेरे अंदर कहीं बहुत हल्का-सा resistance आया।

जैसे अगर मैं answer ना दूँ तो शायद calendar बदल जाए।

लेकिन नहीं बदलना था।

“हाँ।”

बस।

वो चुप हो गई।

उसका हाथ मेरे हाथ में थोड़ा और कस गया।

मैंने भी पकड़ मजबूत कर ली।

हम दोनों पूरे trip में pretend करते रहे थे कि हम days count नहीं कर रहे।

शायद दोनों कर रहे थे।

बस अलग-अलग।

और पहली बार मुझे समझ आया—

countdown हमेशा numbers में नहीं चलता।

कभी-कभी सामने वाला आपका हाथ पहले से थोड़ा ज्यादा देर तक पकड़े रखता है।

कभी goodbye वाली बात पर हँसी एक second जल्दी खत्म हो जाती है।

कभी कोई अनजाने में “अगली बार” बोल देता है।

और कभी किसी phone में चार दिनों का album बन जाता है…

जब चौथा दिन अभी खत्म भी नहीं हुआ।

तब समझ आ जाता है।

वक़्त कम है।

बहुत कम।


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Author: Onesha

She is the funny one! Has flair for drama, loves to write when happy! You might hate her first story, but maybe you’ll like the next. She is the master of words, but believes actions speak louder than words. 1sha Rastogi, founder of 1shablog.com.

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