पायल

सावन का वो सोमवार

मैं कई सालों बाद आज उससे मिलने वाला था।

ऐसा लग रहा था जैसे महादेव की मुझ पर कृपा हो गई हो। जो काम इतने बरसों में नहीं कर पाया, आज करने जा रहा था—उससे मिलने। कुछ चीज़ें याद बनकर मन में ऐसी समा जाती हैं कि समय भी उन्हें मिटा नहीं पाता। हाँ, समय रूपी धूल की परत उन्हें ढक ज़रूर देती है। फिर किसी दिन बस एक हवा का झोंका आता है, धूल उड़ती है और वही पुराना पन्ना दोबारा खुल जाता है। सब कुछ फिर उतना ही साफ़ दिखाई देने लगता है।

मैं बेसब्री से उससे मिलने का इंतज़ार कर रहा था। आज मैंने black shirt और black pant पहनी थी। Sunglasses लगाए अपनी Black Thar drive करते हुए उसके office की तरफ़ जा रहा था। सबसे अजीब इत्तेफ़ाक़ तो यही था कि इतने सालों बाद वह मुझसे मिलने के लिए तैयार हो गई थी।

Drive करते-करते पुराने दिन याद आने लगे। बारिश होने लगी थी।

कई साल पहले… ( 21 August 2012)

College August में शुरू हुआ था। Orientation वाले दिन बारिश हो रही थी। नए students के लिए गुलाब जामुन बँट रहे थे। सारे new joiners खा-पी रहे थे, बस एक चश्मिश को छोड़कर।

मैंने उस पर एक सरसरी निगाह डाली और अपने रास्ते चल दिया। तब कहाँ पता था कि वही सरसरी निगाह आने वाले कई सालों तक मेरे साथ रहने वाली है।

हमारे college में सफ़ेद marble का एक छोटा-सा मंदिर था। वहाँ ज़्यादा लोग नहीं जाते थे। एक सोमवार मैंने उसी चश्मिश को मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़ते देखा। शायद सावन ही था। फिर सोमवार का वह सिलसिला सावन के बाद भी चलता रहा। वह हर सोमवार आती। हाथ में ताँबे का लोटा होता। मंदिर में जाकर भोलेनाथ को जल चढ़ाती।

और मैं? मैं hostel की balcony में बनियान पहने, हाथ में सिगरेट लिए उसे देखा करता था। जब तक वह मंदिर से निकलकर चली नहीं जाती, मेरी नज़र उसी पर रहती।

उसके पैर हमेशा सूने-सूने से लगते थे। नंगे पैर वह marble पर चलती थी। मैं सोचता—धूप में यह marble कितना गर्म हो जाता होगा। इसके मुलायम-से पैर जलते नहीं होंगे? और फिर न जाने क्यों मन में एक अजीब-सी ख़्वाहिश आती—

कभी इसके पैरों में पायल पहना दूँ।

वह बाल धोकर आती, सिर पर दुपट्टा रखती और पूरी श्रद्धा से भगवान से न जाने क्या माँगती। मैं बिना नहाए, बिस्तर से उठकर, हाथ में सिगरेट लिए balcony से उसे देखता और मन ही मन सोचता—

पता नहीं भोलेनाथ से कैसा पति माँग रही है। किसी दिन मुझे ही न माँग ले।

वह IT branch में थी। कई बार सोचा, एक दिन जाकर उससे बात करूँगा।

एक दिन।

बस यही “एक दिन” चार साल तक नहीं आया।

College ख़त्म हो गया। सबकी jobs लग गईं। मुझे Masters के लिए बाहर जाना था। और मैं उससे न मिल पाया। न ठीक से बात कर पाया। न अपना नाम बता पाया।

फिर ज़िंदगी आगे बढ़ गई।

कई साल बाद… ( 24 July 2026)

काफ़ी साल बीत चुके थे। एक दिन LinkedIn पर college के किसी पुराने परिचित ने तुम्हारी promotion वाली post पर Congratulations लिखा।

Promoted to Lead Developer.

तुम्हारी तस्वीर सामने आई और अचानक मुझे वे सारे सोमवार याद आ गए—वह मंदिर, ताँबे का लोटा, तुम्हारा कुछ न खाना, वह चश्मिश और पैरों में पायल पहनाने की मेरी वह बेवकूफ़-सी ख़्वाहिश।

मैंने तुम्हें LinkedIn पर message कर दिया। Message भेजने के बाद ख़ुद ही सोचने लगा—इतने साल बाद क्या इसे समझ आएगा कि एक लगभग अनजान आदमी इसे message क्यों कर रहा है? फिर सोचा, छोड़ो। ज़िंदगी में कुछ बातें कम-से-कम एक बार कह देनी चाहिए।

मरने से पहले इस लड़की से एक बार बात तो करनी है।

एक हफ़्ते बाद तुम्हारा reply आया। मैंने फिर message किया। फिर लगभग एक हफ़्ते बाद तुम्हारा reply आया। मैं message करके छोड़ देता और तुम अपनी आदत के मुताबिक़—या शायद LinkedIn की आदत के मुताबिक़—हफ़्ते भर बाद जवाब देतीं।

Instagram पर बहुत ढूँढ़ा। नहीं मिलीं। एक दोस्त से पूछवाया तो पता चला account deactivated है। मैं हँसा।

मेरी ही क़िस्मत ख़राब है शायद।

फिर LinkedIn पर इंतज़ार करता रहा। एक हफ़्ता निकला। फिर दूसरा। आख़िर एक दिन भोलेनाथ से कह ही दिया—

“हे भोलेनाथ, एक बार तो मिलवा दो।”

और बस। पता नहीं उस दिन मेरे भोले भंडारी का क्या मन हुआ, लेकिन रास्ता खुल गया।

आज मैं तुमसे मिलने के लिए लगभग 40 km drive करके तुम्हारे office जा रहा था।

Times Internet Ltd.

फिर वो आई

शाम के पाँच बजे मैं तुम्हारे office के बाहर था। मैंने call किया।

“Gym में हूँ… बस आई।”

इतने सालों बाद पहली बार तुम्हारी आवाज़ सुनी। अजीब बात थी। लगा जैसे आवाज़ बदली ही नहीं।

मैं गाड़ी से उतरकर Gate No. 1 के बाहर चला गया। दोनों हाथ जेब में डाले तुम्हारा इंतज़ार करने लगा। Office से लगातार लोग बाहर निकल रहे थे।

और फिर—तुम आईं।

माथे पर चंदन का टीका। Blue polka-dot top. मैं कुछ पल बस तुम्हें देखता रह गया। वही चश्मिश। बस अब चश्मा नहीं था।

मैं मुस्कुराया। तुमने मुझे देखा और ऐसा लगा जैसे तुरंत पहचान गईं। शायद बाहर खड़े होकर बात करना तुम्हें awkward लगा, इसलिए आते ही मेरे साथ-साथ चलने लगीं।

“सुनो, तुम गाड़ी से बाहर क्यों आ गए? कोई देख लेगा तो मेरे पति से कह देगा—देखो, किसके साथ घूम रही है।”

मुझे हँसी आ गई।

“हाँ, तो मेरी भी बीवी है। वो तुम्हें नहीं छोड़ेगी।”

तुम खिलखिलाकर हँस पड़ीं।

मैंने तुम्हें Thar में चढ़ने के लिए हाथ दिया। तुमने बिना सोचे मेरा हाथ पकड़ा और अंदर बैठते ही बच्चों जैसी excitement में बोलीं—

“यार! मेरा Thar में बैठने का कब से मन था! And honestly, तुम 120 kg की chest pull और press कैसे कर लेते हो? मुझसे तो 30 kg भी नहीं होता।”

मैं तुम्हें देखता रह गया। मुझे नहीं पता था कि चश्मिश इतना बोलती भी है। तुम अब भी मेरा हाथ पकड़े बैठी थीं। शायद पाँच seconds बाद तुम्हें ख़ुद एहसास हुआ कि technically मैं अभी भी तुम्हारे लिए लगभग एक अनजान आदमी हूँ।

मैंने बात बदल दी।

“अरे, बहुत अच्छा लिखती हो यार तुम। लिखा करो। College से कितने fans हैं तुम्हारे। अच्छा बोलती थीं, अच्छा लिखती थीं। Comic timing भी कमाल की थी। Stage पर सारे competitions जीत जाती थीं।”

तुमने मुझे हैरानी से देखा।

“College में cool हुआ करती थीं तुम।”

“ओह please! ज़्यादा buttering मत करो।
जैसा तुम सोच रहे हो वैसा बिल्कुल नहीं होने वाला”

मैं हँस पड़ा।

“अरे चश्मिश…”

“कौन चश्मिश?”

“वही जो Director के against strike में बैठी थी।”

तुम चुप हो गईं।

“और IPEC News की hidden admin।”

अब तुम्हारी आँखें बड़ी हो गईं।

“तुम ही भेजती थीं न सारे college की news WhatsApp पर?”

“Oh my God! तुम्हें कैसे पता?”

“अरे, सब पता है मुझे तुम्हारे बारे में।”

तुम मुझे घूरने लगीं।

“College में तो मैंने आज तक नहीं देखा तुम्हें।”

“तब इतना handsome नहीं दिखता था न मैं।”

“Oh please. आज भी नहीं दिखते।”

वही तुम्हारा पुराना अंदाज़। जैसे बात काट भी रही हो और मुस्कुरा भी रही हो।

तभी मैंने कहा, “अच्छा, मैं तुम्हारे लिए कुछ लाया हूँ।”

तुम एकदम मेरी तरफ़ मुड़ीं।

“क्या? दिखाओ, क्या लाए हो?”

मैंने जेब में हाथ डाला और दो चाँदी की पायल निकालीं। तुम्हारी आँखों के सामने उन्हें पकड़कर हल्का-सा सिर झुकाया।

“याद है, तुम सोमवार को मंदिर में जल चढ़ाने जाती थीं? नंगे पैर?”

तुम मुझे देखने लगीं।

“मैं सोचता था… इन पैरों में पायल पहना दूँ।”

तुम कुछ seconds चुप रहीं।

“तुम भी आते थे क्या?”

मैं hostel की balcony वाली अपनी हालत याद करके मुस्कुरा दिया।

“आता नहीं था। देखता था।”

“कहाँ से?”

“Balcony से।”

फिर थोड़ा रुककर कहा, “महादेव से माँगता तो था तुम्हें।”

तुमने तुरंत जवाब दिया—

“अच्छा? और बात करने आज आए हो मुझसे?”

मेरे पास इसका कोई अच्छा जवाब नहीं था। इसलिए मैंने गाड़ी start कर दी।

“कहाँ चलोगी?”

“तुम्हारे office चलते हैं। वहीं job लगवा रहे हो न मेरी?”

मैं हँस दिया।

रास्ते भर College

हम मेरे office की तरफ़ निकले और रास्ते भर college खुलता चला गया। एक-एक किस्सा। एक-एक कांड। मुझे तुम्हारे college के इतने किस्से याद थे कि तुम ख़ुद shock में थीं। हर दूसरी बात पर अपनी कोहनी car door पर टिकातीं, हथेली माथे पर रखतीं और कहतीं—

“Oh God! So embarrassing!”

मैंने कहा, “अच्छा, तुम्हें याद है तुम्हारे लिए तुम्हारे boyfriend ने paper तक leak करवा दिया था? और अगले दिन पूरा hostel exam hall के बाहर तुम्हारी entry पर hooting कर रहा था?”

“ओह please! Boyfriend नहीं था मेरा।”
तुम मुस्कुराती हुई बोली, जैसे उस आशिक का चेहरा तुम्हें याद आया हो

“पागल तो था यार तेरे पीछे।”

तुमने थोड़ा सोचकर कहा, “हाँ… ये कह सकते हो।”

फिर हँसते हुए मेरे कंधे पर मार दिया।

“ये देखो। ये ग़लत बात है। तुमने मुझे बिना permission के कैसे छुआ?”

तुमने मुझे दोबारा मारा और फिर जानबूझकर मेरे कंधे पर हाथ रख दिया।

“अब बोल।”

मैं मज़ाक में car door की तरफ़ सिमटने लगा। तुम हँसने लगीं।

कुछ देर बाद मेरा office आ गया।

“कब लगवा रहा है मेरी job?”

“अरे, मेरा जुगाड़ है। करवा दूँगा। तू tension मत ले।”

वहाँ से मैं तुम्हें पास के एक café ले गया। SMALL TALK गाड़ी बाहर park की।

“Wow! कितनी सुंदर aesthetic जगह है यार। कैसे ढूँढ़ी?”

“मेरे office के पीछे ही है।”

तुमने मुझे घूरा और मैं हँसने लगा।

वो पायल

मैं गाड़ी से उतरकर तुम्हारी तरफ़ आया। तुम दोनों पैर बाहर निकालकर उतरने ही वाली थीं कि अचानक बोलीं—

“ला, पायल दे।”

“क्यों?”

“अरे दे ना।”

तुमने हाथ आगे बढ़ाया। मैंने पायल तुम्हें नहीं दी।

मैं नीचे झुका और तुम्हारी black pant को टखने से थोड़ा ऊपर किया। इतने सालों बाद भी तुम्हारे पैर वैसे ही मुलायम थे जैसे मेरी याद में थे। मैंने हल्का-सा छेड़ा तो तुम चौंककर हिलीं। आँखें एकदम बड़ी हो गईं।
मैने तुम्हारा पैर अपनी तरफ खिंचा और मैंने अपना एक पैर Thar के footrest पर रखा और तुम्हारा पैर अपने घुटने पर। फिर एक-एक करके दोनों पैरों में पायल पहना दी।

पहली। फिर दूसरी।

मैंने ऊपर देखा। तुम्हारी आँखों में आँसू थे। तुम होंठ भींचकर उन्हें रोकने की कोशिश कर रही थीं। फिर गाड़ी से उतरीं और बिना कुछ कहे सीधे मेरे गले लग गईं।

मैंने भी तुम्हें कसकर पकड़ लिया।

और उसी वक़्त parking वाला पर्ची काटने आ गया।

तुम झट से अलग हो गईं। लेकिन उस एक पल में मुझे लगा—College की balcony में बैठकर किए गए मेरे सारे “ॐ नमः शिवाय” शायद पूरी तरह बेकार नहीं गए थे।

जैसे पहले देखता था

मैंने कहा, “अच्छा, मैं सिगरेट पीकर आता हूँ। तू पिएगी?”

“नहीं यार, मैं नहीं पीती।”

“तो तू नारियल पानी पी लेना। चल।”

मैं थोड़ी दूर खड़ा होकर सिगरेट पीने लगा। फिर अचानक महसूस हुआ कि तुम मुझे देख रही हो।

मैं सिगरेट पीते-पीते तुम्हारी तरफ़ आया और धुआँ दूसरी ओर छोड़ दिया। ठीक वैसे ही जैसे कभी तुम मंदिर जाती थीं और मैं दूर balcony से तुम्हें देखा करता था। फ़र्क बस इतना था कि तब तुम्हें पता नहीं था। आज पता था।

मैं तुम्हारी आँखों में देखता रहा। तुम कभी मेरी तरफ़ देखतीं, कभी पेड़ों की तरफ़। फिर एक पल के लिए हमारी नज़रें मिलीं। पता नहीं क्यों, तुम्हारी आँखों में मुझे एक ख़ालीपन-सा दिखाई दिया।

मैंने कुछ नहीं पूछा।

सिगरेट ख़त्म की और हम café के अंदर जाने लगे। तुम्हारा हाथ मेरी तरफ़ बढ़ते-बढ़ते रुक गया। मैंने तुम्हारे लिए दरवाज़ा खोला। तुम एक पल को ठिठक गईं, जैसे किसी ने बहुत समय से तुम्हारे लिए ऐसा किया न हो।

मैं हल्का-सा झुका।

“After you.”

तुम blush करने लगीं और मेरा confidence एकदम pump हो गया।

हम table तक पहुँचे।

“यार, मेरे लिए जगह नहीं है। Table खिसकानी पड़ेगी।”

“हाँ, इसीलिए तो 120 kg उठाता हूँ।”

और एक झटके में table पीछे कर दी। तुमने मुझे ऐसे देखा जैसे पहली बार थोड़ा impress हुई हो।

हम बैठ गए। तुम मेरी आँखों में देखते हुए पैरों से नई पायल बजाने लगीं। उसकी हल्की-सी छन-छन सुनकर मुझे फिर वही सफ़ेद marble वाला मंदिर याद आ गया।

हमने coffee पी। Avocado toast खाया। और मैंने तुमसे वे सारी बातें कीं जिन्हें कहने में मुझे चौदह साल लग गए थे।

तुमने मुझे अपने दोनों बच्चों की तस्वीरें दिखाईं।

“Cute हैं।”

फिर थोड़ा रुककर मैंने कहा, “तुम्हारी तरह। बस तुमसे थोड़े कम।”

तुम मुस्कुरा दीं।

वापसी

शाम ढलने लगी तो मैं तुम्हें घर छोड़ने निकला। गाड़ी में बैठते हुए तुमने bag खोला और पानी की bottle निकालने लगीं। उसी के साथ medicines की एक छोटी-सी strip नीचे गिर गई। मैंने झुककर उठा ली।

“ये क्या है?”

तुमने मेरी तरफ़ देखा, फिर मेरे हाथ में strip देखकर एक पल के लिए चुप हो गईं।

“ये दवाई कैसी है? किसलिए खाती हो तू?”

तुमने strip मेरे हाथ से ली और बिना मेरी तरफ़ देखे बोलीं, “यार… depression में हूँ। ऐसा नहीं है कि कुछ कमी है life में। सब है। बच्चे हैं, काम है… सब ठीक है। बस मैं ठीक नहीं हो पा रही।”

मेरे हाथ steering पर ही रुक गए। इस बार तुम्हारी आवाज़ में वो हँसी नहीं थी जो अब तक हर मुश्किल बात को हल्का कर देती थी।

तुमने पानी की bottle खोली और tablet निकालते हुए कहा, “Medication start हो गई है। एक week हुआ है। It makes me so drowsy, यार। पूरा दिन ऐसा लगता है जैसे body कहीं और है और दिमाग कहीं और। लेकिन अब खानी ज़रूरी है। हालत खराब हो रही है… कोई और option नहीं है अभी।”

तुमने पानी के साथ दवाई निगल ली।

पता नहीं क्यों, उस एक sentence के बाद मुझे थोड़ी देर पहले तुम्हारी आँखों में दिखा वही खालीपन याद आ गया। तब मैंने कुछ नहीं पूछा था।

इस बार steering से हाथ हटाकर तुम्हारा हाथ पकड़ लिया—कसकर।

“तू मेरे साथ रह। ज़्यादा overthink मत कर। मैं हूँ न… धीरे-धीरे सब ठीक करेंगे।”

तुमने कुछ seconds मुझे देखा। शायद कुछ बोलना चाहती थीं, लेकिन बोली नहीं। बस अपना हाथ मेरे हाथ में रहने दिया।

रास्ते भर तुम मेरा हाथ पकड़े रहीं। एक red light पर मैंने अपनी बीवी को call किया। उसी दौरान मैंने देखा कि तुम बार-बार कंधे उचका रही थीं।

“क्या हुआ?”

“कुछ नहीं यार। आज ज़्यादा weight उठा लिया शायद। बहुत दर्द हो रहा है।”

मैंने तुम्हारे कंधे दबाने शुरू किए। Pressure points दबाए तो तुमने आँखें बंद कर लीं।

“हाँ… बस… वहीं। दबा दे यार, बहुत दर्द हो रहा है।”

मैं हँसते हुए दबाता रहा।

हमारे सामने सड़क पर एक JCB की crane चल रही थी।

जिसपर बहुत ही ज्यादा बड़ी, बड़ी, चमकदार Lights लगी हुई थी , आसपास की lights देखकर तुम अचानक बोलीं—

“लो, बारात वाली lights भी आ गईं।”

“चल, शादी रख लेते हैं।”

मैंने हाथ हटा लिया। तुमने तुरंत मेरा हाथ पकड़ लिया।

कुछ देर बाद मेरे हाथों को देखकर बोलीं, “Gloves पहना कर। देख, छिल गए हैं तेरे हाथ।”

“लड़की नहीं हूँ मैं।” तुम फिर हँस पड़ीं।

और बातों-बातों में तुम्हारा घर आ गया।

सच कहूँ तो तुम्हें जाने देने का मन नहीं था। चौदह साल किसी से मिलने का इंतज़ार करो और फिर कुछ घंटे ऐसे निकल जाएँ जैसे कुछ minutes रहे हों—तो शायद ऐसा ही लगता है।

तुम गाड़ी से उतरीं। फिर वापस झुकीं, मेरा एक गाल खींचा और मुस्कुराकर मुझे विदा कर दिया।

मैं तुम्हें जाते हुए देखता रहा। पैरों में वही पायल छनक रही थी जिसे मैंने कभी college की balcony में बैठकर सिर्फ़ imagine किया था।

तुम चली गईं।

मैं वहीं कुछ पल बैठा रहा। सामने सड़क थी। पीछे चौदह साल। और बीच में सावन का एक सोमवार।

कुछ कहानियों को बस एक मुलाक़ात चाहिए होती है। एक ऐसा दिन, जब समय की सारी धूल हट जाए और हम उस पुराने पन्ने को एक बार फिर साफ़-साफ़ पढ़ सकें।

महादेव ने मिलवा तो दिया।

अब अगली मुलाक़ात उनके भरोसे।

बस एक सवाल अभी भी बाकी है—

चश्मिश, अब कब मिलेगी?


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Author: Onesha

She is the funny one! Has flair for drama, loves to write when happy! You might hate her first story, but maybe you’ll like the next. She is the master of words, but believes actions speak louder than words. 1sha Rastogi, founder of 1shablog.com.

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