किसी शहर को देखने और किसी का शहर देखने में फर्क होता है।
पहली बार आप जगह देखते हैं—सड़कें, cafés, बाज़ार, monuments, views. कुछ तस्वीरें लेते हैं, दो-चार चीज़ें खरीदते हैं और लौट आते हैं। लेकिन जब कोई अपना आपको उसी शहर में लेकर घूमता है, तो धीरे-धीरे जगहें पीछे छूटने लगती हैं और उनके पीछे छुपा हुआ इंसान दिखाई देने लगता है। वह किस मोड़ पर गाड़ी अपने-आप धीमी कर देता है, किस दुकान वाले को नाम से जानता है, कौन-सी सड़क पर बिना वजह मुस्कुरा देता है और किस जगह पहुँचकर अचानक बोलना कम कर देता है।
शायद हम जगहों से उतना नहीं जुड़ते, जितना अपने उन versions से जुड़ते हैं जिन्हें कभी वहाँ जीया होता है।
और उस सुबह मुझे अचानक एक अजीब-सी जल्दी थी।
मैं चाहता था Ananya सब देखे।
McLeodganj.
Bhagsu.
Dharamkot.
Gallu.
Naddi.
वो cafés जहाँ मैं घंटों बैठा रहता था। वो रास्ते जहाँ बिना destination निकल जाता था। वो छोटे viewpoints जहाँ कोई tourist शायद पाँच minute रुकता, लेकिन मैंने कई-कई घंटे बिताए थे।
चार दिन बहुत कम थे।
और मेरे पास उसे दिखाने के लिए जैसे पूरी एक ज़िन्दगी पड़ी थी।
Breakfast करते हुए मैं phone में map देख रहा था। Ananya सामने बैठी toast पर butter लगा रही थी और पिछले पाँच minute में कम-से-कम तीन बार मेरी तरफ़ देख चुकी थी। आखिरकार उसने cup table पर रखा और पूछा,
“क्या कर रहे हो?”
“Planning।”
“किसकी?”
मैंने phone उसकी तरफ़ घुमा दिया। “पहले McLeodganj. वहाँ से Bhagsu. फिर Dharamkot. अगर तुमने बीच में drama नहीं किया तो Gallu तक walk कर सकते हैं। शाम को Naddi sunset।”
वो कुछ seconds screen को देखती रही, फिर मेरी तरफ़।
“हम घूमने आए हैं या तुम्हारा geography practical है?”
मैं हँस पड़ा। “बहुत कुछ बाकी है।”
“कल भी McLeodganj गए थे।”
“वो proper नहीं था।”
“Proper McLeodganj क्या होता है?”
“तुम्हें नहीं पता।”
“Obviously. तभी तो local guide hire किया है।”
“Free guide।”
“Free चीज़ें सबसे महँगी पड़ती हैं।”
मैं मुस्कुराया और plate उसकी तरफ़ खिसका दी। “खा लो। आज बहुत चलना है।”
वो toast का bite लेते हुए मुझे देखती रही। “ये सब आज ही करना ज़रूरी है?”
“हाँ।”
“क्यों?”
मैंने बिना सोचे कह दिया, “ताकि तुम कुछ miss ना करो।”
Sentence निकलने के बाद शायद मुझे खुद भी उसका weight समझ आया।
वो कुछ देर मुझे देखती रही।
मैंने नज़र plate पर कर ली।
सच कहूँ तो मैं खुद भी नहीं जानता था कि मुझे इतनी जल्दी क्यों थी। जगहें कहीं जा नहीं रही थीं। Dharamshala कल भी यहीं रहता, अगले साल भी, शायद कई साल बाद भी। लेकिन मेरे पास उसके साथ इन्हें देखने का time सीमित था।
शायद मुझे डर था कि जो आज नहीं दिखा पाया, उसे फिर कब दिखाऊँगा—पता नहीं।
“चलो,” Ananya ने अचानक कहा।
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
“Ready?”
“नहीं।”
वो मुस्कुराई।
“लेकिन तुम्हें देखकर लग रहा है अगर आज मैं तैयार नहीं हुई तो तुम मुझे blanket समेत car में डाल दोगे।”
“Possible.”
“पाँच minute।”
“तुम्हारे पाँच minute—”
“हाँ, हाँ। Dangerous हैं।”
वो उठकर चली गई।
मैं उसे जाते हुए देखता रहा और जाने क्यों मुस्कुराता रहा।
McLeodganj की सुबह धीरे खुलती है।
कुछ दुकानों के shutters ऊपर हो चुके होते हैं, कुछ आधे खुले होते हैं। छोटे Tibetan restaurants के बाहर steam उठने लगती है। कहीं coffee की smell, कहीं freshly बने bread की। Prayer flags गलियों के ऊपर हवा में हिलते रहते हैं और बीच सड़क पर पड़े dogs को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि उनकी वजह से traffic थोड़ा सा रुक रहा है।
Ananya लगभग हर चीज़ notice कर रही थी।
किसी दुकान के बाहर लटकी handmade earrings.
किसी café की दीवार पर बना छोटा-सा painting.
किसी balcony से नीचे गिरती creeper.
Prayer wheels घुमाती हुई एक बूढ़ी Tibetan lady.
एक छोटा बच्चा जो school uniform में momos खा रहा था।
उसकी यही बात मुझे शायद हमेशा अच्छी लगी थी।
दुनिया उसे आसानी से boring नहीं लगती थी।
Office में भी बाकी लोग किसी दिन को बस दिन की तरह निकाल देते थे; Ananya उसमें कोई छोटी-सी चीज़ ढूँढ़ लेती थी जिसे शाम तक याद रखा जा सके।
“ये देखो।”
वो एक दुकान के बाहर रुक गई।
“Hmm।”
“अच्छा है?”
उसके हाथ में एक छोटी silver ring थी।
“ठीक।”
वो मुझे घूरने लगी। “तुम shopping के समय इतने useless क्यों हो?”
“क्योंकि तुम खुद decide कर चुकी हो।”
“तो तारीफ़ कर सकते हो।”
“बहुत सुंदर है।”
“अब fake लग रहा है।”
“तो क्या बोलूँ?”
वो ring वापस रखकर आगे बढ़ गई। “कुछ नहीं।”
मैं मुस्कुरा दिया। “Favourite answer मेरा था।”
“अब नहीं।”
कुछ कदम बाद उसका हाथ मेरे हाथ में आ गया।
बिना किसी तैयारी के।
बिना इस बात के कि किसने पहले हाथ बढ़ाया।
बस आ गया।
और मुझे अचानक लगा कि कितनी जल्दी यह चीज़ normal हो गई थी।
एक दिन पहले तक उसके हर touch को दिमाग़ अलग से register करता था। अब crowd में चलते हुए उसका हाथ अपने-आप मेरे हाथों में आ जाता था। सड़क cross करते समय मैं उसे थोड़ा अपने पास कर लेता। कोई ऊँचा step आता तो मैं हाथ बढ़ाता और वह बिना देखे पकड़ लेती।
शायद कुछ आदतें बनने में महीनों नहीं लगते।
सिर्फ़ सही इंसान लगता है।
एक छोटी-सी bookshop के बाहर Ananya रुक गई।
दुकान अंदर से इतनी भरी हुई थी कि shelves और किताबों के बीच मुश्किल से चलने की जगह बची थी। पुरानी किताबों की वह अलग-सी smell थी जो एक साथ कागज़, धूल और समय जैसी लगती है।
मैं एक तरफ़ travel section देखने लगा। Ananya poetry की तरफ़ चली गई।
कुछ देर बाद वो मेरे पास एक postcard लेकर आई।
Black-and-white photograph थी Dhauladhar की।
“ये ले रही हूँ।”
“क्यों?”
उसने मुझे ऐसे देखा जैसे सवाल ही बेवकूफ़ी का हो।
“क्योंकि अच्छा है।”
“तुम्हारे phone में इससे better twenty photos होंगी।”
“Photos में smell नहीं आती।”
मैं हँस पड़ा। “Postcard में आती है?”
उसने postcard को हल्का-सा nose के पास किया।
“अभी नहीं।”
“फिर?”
“कुछ साल बाद old paper की आएगी।”
मैं उसे देखता रहा।
उसने postcard फिर देखा और बहुत casually कहा,
“और शायद मुझे ये दिन याद आए।”
मैंने कोई जवाब नहीं दिया।
वो bill कराने चली गई।
लेकिन उसके sentence ने मेरे भीतर कहीं बहुत धीरे से जगह बना ली थी।
मैं पहली बार notice कर रहा था कि Ananya इस trip से छोटी-छोटी चीज़ें जमा कर रही थी।
Bracelet.
Photos.
अब postcard.
जैसे उसे पहले से मालूम हो कि कुछ दिनों बाद memories को हाथ लगाने के लिए कुछ चीज़ों की ज़रूरत पड़ेगी।
एक second के लिए मन हुआ उससे कहूँ—
अभी से याद क्यों बना रही हो?
अभी तो हम यहीं हैं।
फिर लगा…
मैं भी तो यही कर रहा हूँ।
बस मैं चीज़ें नहीं खरीद रहा था।
मैं moments जमा कर रहा था।
Bhagsu की तरफ़ जाते हुए crowd बढ़ने लगा।
छोटे cafés, guesthouses, tattoo studios, दुकानों के बाहर खड़े tourists और waterfall की तरफ़ बढ़ते लोग। मेरे लिए वह कोई बड़ा trek नहीं था।
Ananya के लिए शायद Everest base camp.
“और कितना?”
उसने तीसरी बार पूछा।
“बस थोड़ा।”
वो रुक गई।
“तुम पिछले बीस minute से यही बोल रहे हो।”
“अभी तो walk शुरू हुई है।”
“मुझे तुमसे नफ़रत है।”
मैंने पीछे मुड़कर देखा। “कल रात तो ऐसा नहीं लग रहा था।”
उसका expression एकदम बदल गया।
“Cheap।”
उसने पास आकर मेरे arm पर मारा।
मैं हँसते हुए आगे बढ़ गया।
“बहुत funny है?”
“थोड़ा।”
“आज रात अपने room में सोना।”
मैं तुरंत रुक गया।
वो आगे निकल गई।
मैं उसके पीछे चलते हुए बोला, “Personal attack allowed नहीं है।”
उसकी हँसी सुनाई दी।
कुछ दूर एक stone step थोड़ा ऊँचा था। मैंने बिना पीछे देखे हाथ बढ़ाया।
उसने पकड़ लिया।
ऊपर आने के बाद मैंने हाथ छोड़ा नहीं।
वो भी नहीं।
कुछ कदम बाद मैंने पूछा,
“अब छोड़ सकती हो।”
वो सामने देखते हुए बोली,
“मन नहीं।”
मैं उसकी तरफ़ देखने लगा।
उसने मेरी तरफ़ देखा भी नहीं।
जैसे उसने कोई बड़ी बात कही ही न हो।
मैंने उसके हाथ की पकड़ थोड़ी और मजबूत कर ली।
Waterfall के पास भीड़ ज़्यादा थी, इसलिए हम main crowd से थोड़ा हटकर rocks के बीच एक quieter जगह पर जाकर बैठ गए। पानी नीचे पत्थरों से टकराकर आ रहा था, लेकिन आवाज़ इतनी तेज़ नहीं थी कि बात करनी पड़े तो चिल्लाना पड़े।
Ananya ने बैठते ही shoes की तरफ़ देखा।
“मेरे पैर तुम्हें गालियाँ दे रहे हैं।”
“इतने में?”
“Corporate लोगों की यही problem है।”
“क्या?”
“Weekend में एक trek करके खुद को mountain goat समझने लगते हैं।”
मैं हँस पड़ा। “मैं corporate से पहले भी mountain वाला था।”
“आज वही verify कर रही हूँ।”
उसने मेरे हाथ से bottle ली और पानी पी लिया।
मैंने हाथ बढ़ाया।
उसने bottle वापस नहीं की।
“मेरी है।”
“अब हमारी।”
“बहुत जल्दी socialism आ गया।”
वो हँस दी।
पास के पानी में उसने हाथ डाला और अगले ही second अपनी ठंडी fingers मेरी wrist पर लगा दीं।
“Ananya!”
वो हँसते हुए पीछे हुई।
मैंने उसका हाथ पकड़ लिया।
“मत करो।”
“क्यों?”
उसने दूसरा हाथ फिर पानी की तरफ़ बढ़ाया।
मैंने वो भी पकड़ लिया।
अब उसके दोनों हाथ मेरे हाथों में थे।
वो हँस रही थी।
मैंने उसे थोड़ा अपनी तरफ़ खींच लिया।
हँसी धीरे-धीरे कम हो गई।
हम दोनों के बीच बस कुछ inches का फासला था।
उसने आसपास देखकर कहा,
“Public place है।”
मैं मुस्कुराया।
“आज याद है?”
“हाँ।”
“कल नहीं था?”
उसने आँखें छोटी करके मुझे देखा।
“बहुत बोल रहे हो।”
मैंने उसके forehead पर kiss किया और पीछे हो गया।
दो seconds वो मुझे देखती रही।
फिर उठने से पहले मेरे cheek पर हल्का-सा kiss किया।
“चलो, local expert।”
मैं वहीं बैठा मुस्कुराता रह गया।
Affection अब हमारे बीच किसी special event की तरह नहीं आ रहा था।
वो बातचीत के बीच आता।
Walking के बीच।
किसी joke के बाद।
किसी silence के पहले।
शायद यही closeness की सबसे dangerous बात है।
वो इतनी जल्दी normal लगने लगती है कि आप भूल जाते हैं…
कुछ दिन पहले तक यही चीज़ impossible लगती थी।
Bhagsu से Dharamkot की तरफ़ बढ़ते हुए धीरे-धीरे बाहर की हलचल कम होने लगी।
दुकानें पीछे छूट गईं। Cars कम हो गईं। Cafés के बीच की दूरी बढ़ने लगी और कुछ देर बाद सड़क के साथ सिर्फ़ ऊँचे pine और deodar के पेड़ रह गए। हवा उन पेड़ों से गुजरती तो एक लगातार धीमी-सी सरसराहट होती, जैसे पहाड़ खुद बहुत धीरे बोल रहे हों।
रास्ते के कुछ हिस्से चीड़ की सूखी पत्तियों से ढके हुए थे। उन पर चलते हुए हमारे कदम भी जैसे हल्के हो जाते थे—ना जूतों की वही कठोर आवाज़, ना सड़क की खुरदरी गूँज। बस नीचे दबती सूखी पत्तियों की धीमी-सी चरमराहट और आसपास हवा।
Ananya भी धीरे-धीरे शांत होने लगी।
पहले कुछ minute मुझे लगा शायद थक गई है।
फिर मैंने पूछा,
“अब क्यों चुप हो?”
“सुन रही हूँ।”
“क्या?”
उसने आसपास देखा।
“पता नहीं।”
थोड़ा रुककर बोली,
“शायद यही।”
मैं मुस्कुराया।
“अब समझ आया?”
“थोड़ा।”
“क्या?”
उसने मेरी तरफ़ देखा।
“तुम यहाँ वापस क्यों आते हो।”
मैंने तुरंत कहा, “भागकर नहीं आता।”
वो मुस्कुराई।
“हाँ। वापस आते हो।”
मेरी ही line मेरे खिलाफ़ इस्तेमाल कर दी।
“Good student।”
“Teacher बहुत repeat करता है।”
हम दोनों हँस दिए।
Dharamkot में car एक तरफ़ छोड़ी और मैं उसे एक छोटे से रास्ते पर ऊपर ले गया।
“अब कहाँ?”
“बस एक जगह।”
“नाम?”
“कुछ नहीं।”
“नाम नहीं है?”
“हर जगह Google Maps पर नहीं होती।”
वो मेरी तरफ़ देखकर हँसी। “आज तुम full mountain baba mode में हो।”
“तुम्हें adventurous life दिखा रहा हूँ।”
“वही क्यों दिखानी है?”
मैं चलते-चलते रुक गया।
“क्या?”
वो भी रुक गई।
“सुबह से।”
“क्या सुबह से?”
“यहाँ गया हूँ।”
“वहाँ trek किया है।”
“इस road से रात में आया हूँ।”
“उस café में घंटों बैठा हूँ।”
“वहाँ बारिश में फँसा था।”
“वो रास्ता सिर्फ़ locals जानते हैं।”
उसने मेरी mimicry करते हुए कहा।
मैं हँसने लगा।
वो serious थी।
“तुम prove क्या कर रहे हो?”
“कुछ नहीं।”
“झूठ।”
मेरी हँसी थोड़ी कम हुई।
मैंने उसके चेहरे की तरफ़ देखा। Walk की वजह से cheeks हल्के लाल थे और हवा बाल बार-बार उसके चेहरे पर ला रही थी।
मैंने मज़ाक में कहा,
“तुम्हें लगे मेरी life बहुत cool रही है।”
उसने मुझे कुछ seconds घूरा।
“वही लग रहा था।”
“तो काम हो गया।”
वो सिर हिलाकर आगे चल दी।
मैं उसके साथ चलने लगा।
कुछ steps बाद उसने मेरा हाथ पकड़ लिया।
“लेकिन एक problem है।”
“क्या?”
वो सामने देखते हुए बोली,
“मैं तुम्हारी adventurous life देखने नहीं आई।”
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
“फिर?”
उसने बिल्कुल casually कहा,
“तुम्हारे साथ आने आई हूँ।”
मैं कुछ seconds बोल नहीं पाया।
वो चलते रही।
मेरा हाथ उसके हाथ में था, इसलिए मैं भी चलता रहा।
कई बार हम complicated answers ढूँढ़ते रहते हैं।
और सामने वाला बहुत simple sentence बोलकर पूरी problem खत्म कर देता है।
Gallu की तरफ़ trail शुरू होने से पहले एक छोटी-सी tea shop थी।
पुरानी wooden benches. Steel के glasses. एक छोटे stove पर चाय। सामने mountains के बीच खुलती valley.
मैंने owner को देखते ही smile किया।
“Namaste uncle।”
उन्होंने कुछ seconds मुझे देखा।
फिर पहचान गए।
“अरे! बहुत दिनों बाद।”
Ananya की गर्दन तुरंत मेरी तरफ़ घूमी।
“आप जानते हैं इन्हें?”
Uncle हँस पड़े। “ये पहले यहाँ बैठकर आधा-आधा दिन निकाल देता था।”
मैंने तुरंत कहा,
“Uncle exaggerate कर रहे हैं।”
Ananya के चेहरे पर वैसी खुशी आ गई जैसे उसे मेरे against कोई पुराना secret document मिल गया हो।
“आधा दिन?”
“कभी-कभी।”
“करते क्या थे?”
“Chai।”
“छह घंटे?”
“बहुत अच्छी chai है।”
Uncle फिर हँस दिए।
मैंने उनकी तरफ़ देखा। “आप chai बनाओ।”
Ananya bench पर मेरे पास बैठ गई।
“Seriously, क्यों बैठते थे यहाँ?”
“बस।”
“फिर बस।”
मैंने chai का पहला sip लिया।
“हर चीज़ की कोई बड़ी कहानी नहीं होती।”
“तुम्हारी होती है।”
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
“तुम्हें कैसे पता?”
उसने cup दोनों हाथों में पकड़ा और मेरी आँखों में देखते हुए कहा,
“क्योंकि तुम चीज़ें छुपाते बहुत हो।”
मैं कुछ seconds उसे देखता रह गया।
यह line पहले भी सुनी थी।
बहुत साल पहले।
एक शादी में।
जब उसने मेरे tattoo को पहली बार ध्यान से देखा था।
बस design है या कहानी भी है?
मैंने तब हँसकर बात टाल दी थी।
Story लंबी है।
शायद कुछ लोगों को हमारे answers से ज़्यादा वो बातें याद रहती हैं जिनका जवाब हमने कभी दिया ही नहीं।
Chai के बाद हम trail पर थोड़ा और आगे गए।
Triund तक जाना उस दिन practical नहीं था। ना तैयारी थी, ना time. लेकिन मैं चाहता था कि वह उस रास्ते का थोड़ा हिस्सा ज़रूर देखे जहाँ मैं बहुत बार अकेले चला था।
जैसे-जैसे हम आगे बढ़े, Dharamkot की बची हुई आवाज़ें भी पीछे छूटती गईं। कुछ देर बाद सिर्फ़ हमारे कदमों की आवाज़, हवा और कभी-कभी किसी पक्षी की आवाज़ सुनाई दे रही थी।
एक turn के बाद अचानक पेड़ों के बीच से पूरी Kangra valley खुल गई।
Ananya वहीं रुक गई।
“Wow…”
इस बार उसके पास immediately phone नहीं गया।
बस खड़ी रही।
मैंने शायद पहली बार notice किया कि उसने तस्वीर लेने से पहले view को देखा।
काफी देर तक।
फिर मेरे पास आकर खड़ी हो गई।
“तुम यहाँ अकेले आते थे?”
“हाँ।”
“क्यों?”
“सुकून।”
“मिल जाता था?”
मैंने सामने valley की तरफ़ देखा।
“कुछ देर।”
“फिर?”
“फिर नीचे चले जाते हैं।”
उसने मेरी तरफ़ देखा।
“मैं रास्ते की बात नहीं कर रही।”
मैं चुप हो गया।
उसके सवाल कई बार problem यही करते थे।
जहाँ मैं एक simple जवाब देकर निकल सकता था, वो वहीं से एक और दरवाज़ा खोल देती थी।
मैंने थोड़ा समय लिया।
“फिर वही सब शुरू हो जाता था।”
“क्या?”
मैंने कहा, “दिमाग।”
वो कुछ नहीं बोली।
कुछ seconds बाद उसने बहुत softly पूछा,
“बहुत चलता है?”
मैं हँस पड़ा।
“तुम्हें अब पता चला?”
वो मुस्कुराई।
“हाँ, लेकिन तुम दिखाते नहीं।”
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
“दिखाकर क्या होगा?”
उसने तुरंत कोई जवाब नहीं दिया।
फिर बस अपना हाथ मेरे हाथ में डाल दिया।
“कुछ नहीं।”
कुछ देर बाद बोली,
“बस अकेले कम लगेगा।”
मैंने उसका हाथ और कस लिया।
और उस moment मेरे पास पहली बार कोई बेहतर answer नहीं था।
वापसी में मैं फिर itinerary पर आ गया।
“Naddi sunset कर सकते हैं।”
“नहीं।”
मैंने सोचा मैंने गलत सुना।
“क्या?”
“नहीं जाना।”
“क्यों?”
“थक गई।”
“Car से जाना है।”
“फिर भी।”
“वहाँ से sunset अलग दिखता है।”
“यहाँ से भी sunset होता है।”
“तुम समझ नहीं रही।”
“तुम समझ नहीं रहे।”
मैं चलते-चलते रुक गया।
वो भी रुकी।
“Sugandh…”
“Hm?”
“तुम्हें हर जगह आज ही क्यों दिखानी है?”
मैंने बिना सोचे कहा,
“Time कम है।”
और sentence वहीं हवा में रुक गया।
मेरी अपनी आवाज़ मुझे अचानक कुछ ज़्यादा साफ़ सुनाई दी।
Ananya के चेहरे की मुस्कान धीरे-धीरे कम हुई।
मैंने नीचे रास्ते की तरफ़ देखा।
शायद यही असली वजह थी।
मैं उसे places नहीं दिखा रहा था।
मैं समय के खिलाफ़ भाग रहा था।
जैसे एक दिन में दस जगह दिखाकर मैं किसी तरह उन चार सालों का compensation कर सकता हूँ जो हमारे सामने खड़े थे।
कुछ seconds बाद Ananya मेरे पास आई।
उसने मेरी jacket सामने से पकड़ ली।
“चार दिन में पूरा Sugandh cover करना है?”
मैं उसकी तरफ़ देखने लगा।
उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी।
लेकिन आँखों में नहीं।
मैंने भी हल्का-सा मुस्कुराकर कहा,
“कोशिश कर रहा हूँ।”
वो कुछ नहीं बोली।
बस मेरे गले से लग गई।
मैंने arms उसके around कर दीं।
Trail पर लोग हमारे पास से निकल रहे थे, लेकिन उस समय मुझे फर्क नहीं पड़ा।
उसका चेहरा मेरी jacket के पास था।
कुछ देर बाद उसने बहुत धीमे से कहा,
“मैं कुछ miss नहीं कर रही।”
मैंने उसके बालों के ऊपर से पूछा,
“कैसे पता?”
वो थोड़ा पीछे हुई।
मेरी तरफ़ देखा।
“क्योंकि तुम हो।”
बस।
इतना ही।
और पहली बार मुझे लगा कि शायद मैं उसे गलत चीज़ दिखाने की कोशिश कर रहा था।
मैं चाहता था वह mountains देखे।
Roads.
Cafés.
Treks.
मेरी stories.
मेरी पुरानी adventures.
शायद इसलिए कि मैं चाहता था वह समझे कि मैं कौन हूँ।
लेकिन उसे geography नहीं चाहिए थी।
उसे मैं चाहिए था।
और अजीब बात ये थी कि शायद उसे मुझसे ज़्यादा जल्दी समझ आ गया था।
उस शाम हम Naddi नहीं गए।
ना Dal Lake.
ना मेरी list वाला दूसरा café.
Dharamkot में एक छोटी-सी जगह थी जहाँ outdoor seating trees के बीच थी। दूर mountains दिखाई दे रहे थे। शाम की धूप अब तेज़ नहीं थी; पेड़ों के बीच से छनकर wooden tables पर गिर रही थी।
Ananya मेरे सामने बैठी।
दो minute बाद अपनी chair उठाकर मेरे बिल्कुल पास ले आई।
मैंने पूछा,
“वहाँ क्या problem थी?”
“दूर थे।”
“तीन feet।”
“बहुत।”
मैं हँस पड़ा।
उसने अपना सिर मेरे shoulder पर रख दिया।
मेरी arm अपने-आप उसके around चली गई।
कुछ देर तक हम वैसे ही बैठे रहे।
पास वाली table पर कोई किताब पढ़ रहा था। कहीं दूर guitar बज रहा था। हवा में coffee और wood की मिली-जुली smell थी। कोई जल्दी नहीं थी।
मेरे phone में पूरा plan पड़ा था।
Naddi.
एक छोटा monastery stop.
एक road जो Palampur side निकलती थी।
एक café जहाँ से रात में lights बहुत अच्छी दिखती थीं।
मैंने phone निकाला।
List देखी।
फिर screen बन्द करके phone table पर उल्टा रख दिया।
Ananya ने पूछा,
“अब कहाँ?”
मैंने सामने पहाड़ों की तरफ़ देखा।
“कहीं नहीं।”
उसने तुरंत सिर उठाया।
“Really?”
“हाँ।”
“Local expert हार गया?”
मैंने मुस्कुराकर कहा,
“Tourist समझदार निकली।”
वो हँसी और वापस मेरे shoulder पर सिर रख दिया।
बहुत देर तक हम वहीं बैठे रहे।
पहली बार उस दिन मैं उसे कुछ दिखाने की कोशिश नहीं कर रहा था।
और शायद उसी समय उसने उस जगह को सबसे ज्यादा महसूस किया।
शहर में शायद हमें हर चीज़ को optimise करने की बीमारी लग जाती है।
कम time में ज़्यादा काम।
Shortest route.
Quick lunch.
Back-to-back meetings.
Weekend में maximum places.
Vacation में checklist.
और शायद उसी आदत में मैं इन चार दिनों को भी optimise करने लगा था।
मुझे लगता था अगर उसे दस जगह दिखा दूँगा तो trip better हो जाएगी।
अगर हर hour किसी memory से भर दूँगा तो जाने के बाद खालीपन थोड़ा कम लगेगा।
लेकिन Ananya उस दिन मेरे पास बैठकर कुछ नहीं कर रही थी।
और मुझे पहली बार समझ आया—
कभी-कभी किसी के साथ कुछ ना करना भी memory होती है।
शायद सबसे बड़ी।
Sun थोड़ा नीचे जाने लगा था।
Ananya अब भी मेरे shoulder पर थी।
कुछ देर बाद उसने पूछा,
“कल कहाँ?”
मैंने हँसते हुए कहा,
“अभी तो तुमने मेरा पूरा plan cancel कराया।”
“आज का।”
“कल?”
“कल फिर तुम्हारी सुन लेंगे।”
मैंने सामने दूर mountains की तरफ़ देखा।
मेरे दिमाग़ में एक जगह आई।
बहुत famous नहीं।
बहुत दूर भी नहीं।
एक ऐसी जगह जहाँ tourists के लिए शायद सिर्फ़ एक अच्छा view था।
लेकिन मेरे लिए…
उससे बहुत ज़्यादा।
“कल एक जगह।”
मैंने कहा।
उसने सिर उठाया।
“बस एक?”
“हाँ।”
“Promise?”
“हाँ।”
“कहाँ?”
“कल।”
वो मुझे घूरने लगी।
“फिर mystery।”
“थोड़ी।”
“क्या special है?”
मैंने जवाब नहीं दिया।
बस सामने mountains की तरफ़ देखता रहा।
कुछ देर बाद उसने फिर सिर मेरे shoulder पर रख दिया।
“ठीक है।”
“इतनी आसानी से?”
“Trust कर रही हूँ।”
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
वो सामने देख रही थी।
उसके लिए शायद ये एक normal sentence था।
मेरे लिए नहीं।
Trust.
वही चीज़ जिसे हमने सबसे पहले खोया था।
और अब शायद उसी को बहुत धीरे-धीरे वापस बना रहे थे।
मैंने उसका हाथ अपने हाथ में लिया।
उसने fingers हल्के से मेरी हथेली पर बन्द कर दीं।
वापस Dharamshala drive करते हुए वो काफी देर खिड़की के बाहर देखती रही।
Road के एक तरफ़ mountains की dark होती outlines थीं और दूसरी तरफ़ valley में lights धीरे-धीरे दिखाई देने लगी थीं। शाम का वो हिस्सा मुझे हमेशा अच्छा लगता था जब पहाड़ पूरी तरह गायब भी नहीं होते और साफ़ दिखाई भी नहीं देते।
बीच में कहीं।
जैसे memory बनने से ठीक पहले का moment.
Ananya ने अचानक कहा,
“आज अच्छा था।”
मैंने steering से नज़र हटाए बिना पूछा,
“बस अच्छा?”
“बहुत।”
कुछ seconds बाद उसने खुद ही जोड़ दिया,
“हालाँकि तुमने मुझे बहुत चलाया।”
“Adventure।”
“कल अगर फिर forty-minute trek निकला ना…”
“बस एक जगह है।”
“और अगर वहाँ कुछ special नहीं हुआ?”
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
“View अच्छा है।”
वो मुस्कुराई।
“मुझे view की guarantee नहीं चाहिए।”
“फिर?”
उसने अपना हाथ मेरी तरफ़ बढ़ा दिया।
मैंने पकड़ लिया।
“Company अच्छी होनी चाहिए।”
मैं हँस पड़ा।
“उसकी भी guarantee नहीं।”
वो भी हँस दी।
कुछ minute बाद उसका सिर seat पर पीछे था और उसकी eyes बन्द थीं।
हाथ अब भी मेरे हाथ में।
मैंने speed थोड़ी कम कर दी।
Mountain roads पर रात जल्दी उतरती है।
और शायद प्यार में भी।
एक moment में धूप होती है।
दूसरे में अचानक realise होता है कि दिन खत्म होने लगा है।
घर पहुँचकर Ananya ने अपनी सारी photos देखनी शुरू कर दीं।
मैं bed के पास बैठा shoes उतार रहा था।
कभी वो कोई photo zoom करती।
कभी delete.
कभी मुझे दिखाती।
“ये देखो।”
“Hmm.”
“Hmm क्या?”
“अच्छी है।”
“तुम हर photo पर अच्छी बोलते हो।”
“तो खराब बोलूँ?”
“Honest बोलो।”
मैंने phone लेकर photo देखी।
Bhagsu वाली थी।
वो हँस रही थी और पीछे पानी था।
“तुम अच्छी लग रही हो।”
उसने phone वापस ले लिया।
“ये honest था?”
“हाँ।”
“ठीक।”
कुछ seconds बाद उसने दूसरी दिखाई।
हम दोनों थे।
Dharamkot में।
मुझे याद भी नहीं था photo कब ली।
उसका सिर मेरे shoulder पर था और मैं शायद किसी बात पर हँस रहा था।
मैं कुछ देर उसे देखता रहा।
उसने पूछा,
“क्या?”
“कुछ नहीं।”
वो मुस्कुराई।
“झूठ।”
मैंने phone वापस उसकी तरफ़ किया।
“रख लो।”
“Obviously।”
उसने phone side में रख दिया और मेरे पास आकर बैठ गई।
कुछ देर बाद अपना सिर फिर मेरे shoulder पर रख दिया।
मैंने पूछा,
“आज इतनी बार यहाँ ही क्यों?”
उसने आँखें बन्द कर लीं।
“Comfortable है।”
“मैं?”
“Shoulder।”
“अच्छा।”
वो हँसी।
फिर बिना आँख खोले बोली,
“तुम भी।”
मैं चुप हो गया।
शायद यह trip मुझे यही सिखा रही थी।
Ananya को impress करने के लिए मुझे उसे हर जगह ले जाने की ज़रूरत नहीं थी।
कई बार बस उसके पास रहना काफ़ी था।
लेकिन अगले दिन…
मैं फिर भी उसे उस एक जगह ले जाना चाहता था।
क्योंकि कुछ जगहें सिर्फ़ दिखाई नहीं जातीं।
उनके बारे में बताया जाता है।
और कुछ जगहें ऐसी होती हैं जिन्हें किसी को दिखाना…
असल में अपने बारे में कुछ ऐसा बता देना होता है जो आपने वर्षों तक शब्दों में कभी नहीं कहा।
Ananya को अभी नहीं पता था कि जिस पहाड़ को अगले दिन वह सामने बैठकर देखने वाली थी…
उसी जगह के coordinates वह मुझे वर्षों से अपने शरीर पर लेकर घूमते हुए देखती आई थी।
उसने कहानी कई बार पूछी थी।
मैंने हर बार टाल दी थी।
शायद अब पहली बार…
कहानी सुनाने का समय आ गया था।
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