मैंने कल रात के messages देखे और मैं हंसने लगी। आज भी हमारे बीच वही पुरानी, अधूरी और अजीब सी formal बातचीत थी। मैंने दो-तीन बार फोन को लॉक-अनलॉक किया, जैसे बार-बार देखने से उसका कोई नया रिप्लाई आ जाएगा। मेरा दिल बिना किसी इख़्तियार के बेसब्री से उसके message का इंतज़ार करने लगा—आख़िर उसे मुझसे क्या बात करनी थी? वो क्या था, जो वो कहना चाहता था?
हर Sunday की तरह, मैं सुबह Yoga सिखाने के लिए निकली। मैंने गाड़ी निकाली और drive करते हुए बहुत सालों बाद वो गाना चलाया, जिसे सुनते ही मैं हमेशा सीधे अतीत के उसी एक ख़ास लम्हे में पहुँच जाती थी। वो गाना, जो सीधे मुझे उस रात की यादों में ले जाता था। जैसे ही म्यूज़िक बजा, I was transported to the exact same moment.
मैं अभी यादों के फेर में कुछ सोच ही रही थी कि अचानक मेरे आगे से एक बस गुज़री। मेरी नज़र उसके पीछे पड़े बड़े-बड़े अक्षरों पर ठिठक गई—उस पर लिखा था ‘S.U.G.A.N.D.H’। मैं बगल से गुज़रती उस बस को देखकर थोड़ी surprise भी हुई और हैरान भी। एक पल को तो लगा जैसे मैं सड़क पर नहीं, अपनी ही यादों के किसी थिएटर में ड्राइव कर रही हूँ। ख़ैर, मैं जैसे-तैसे yoga class पहुँची। कार park करते ही अचानक मेरी नज़र सामने खड़ी एक गाड़ी पर पड़ी, जिसका नंबर था—HP 90A 0413। मेरा दिल ज़ोर से धड़का; मुझे अच्छी तरह याद था कि Sugandh भी हिमाचल का ही था। ब्रह्मांड के इन अजीब इत्तेफ़ाक़ों पर मैं मन ही मन मुस्कुराए बिना नहीं रह सकी। ऐसा लग रहा था जैसे आज पूरा शहर मिलकर मुझे सिर्फ उसी का नाम याद दिला रहा हो।
Yoga class ख़त्म हुई, तो अगली क्लास के बीच आधे घंटे का break था। हमेशा की तरह मैं break room में गई और fridge में से ठंडे पानी की bottle निकाली। तभी मेरी नज़र fridge पर लगे दो-चार magnets पर टिक गई। पहले तो मैंने उन्हें ignore कर दिया, लेकिन पानी पीते हुए जब गौर से देखा, तो मेरे हाथ रुक गए। वो धर्मशाला, भागसूनाग waterfall, भागसूनाग temple और तिब्बती कॉम्प्लेक्स के fridge magnets थे। उन्हीं में से एक magnet पर एक लड़का बाइक पर बैठा था, जिसके background में धौलाधार की वादियाँ थीं।
मैंने एक-एक करके उन सारे magnets को देखा और हमेशा की तरह, यादों की एक तेज़ लहर मुझे फिर से Sugandh की तरफ बहा ले गई। मैं उन ख़यालों में खो गई, जो मैंने कभी उसके साथ देखने के सपने बुने थे—हिमाचल में उसके घर जाने के सपने। वो जगह जिसका नाम था—धर्मशाला, धौलाधार। उन magnets पर अपनी उँगलियाँ रखते हुए मैंने सोचा, “आख़िर आज सुबह से universe मुझे Sugandh को लेकर इतने सारे signs क्यों दे रहा है? भगवान आख़िर चाहते क्या हैं?”
मैंने तुरंत अपनी जेब से अपना phone देखा—na उसका कोई call था, ना कोई message। स्क्रीन पर कोई नोटिफिकेशन न देखकर जो एक हल्की सी मायूसी होती है ना, बस वही महसूस हुई।
मैंने गाड़ी निकाली और घर की तरफ drive करने लगी। रास्ते में मुझे अचानक उसकी Instagram stories याद आने लगीं—जब वो पहाड़ों के पीछे, किसी waterfall पर बैठकर तस्वीरें डालता था। छोटे-छोटे फूलों के साथ उसकी वो कहानियां… लाल फूल, peela फूल, ‘You are beautiphool’ वाला उसका वो मज़ाकिया कैप्शन। मैं तब अक्सर सोचा करती थी कि एक playboy या प्लेयर छवि रखने वाले लड़के को इतनी छोटी सी आइटम, प्रकृति की ये मासूम चीज़ें कैसे पसंद आ सकती हैं?
उसी Sugandh को, उस जगह को महसूस करने के लिए मैं खुद एक बार धर्मशाला गई थी जहाँ का वो था। वो जगह बिल्कुल वैसी ही थी जैसी मैं चाहती थी—peaceful, serene, calm. बिल्कुल उसकी तरह। हज़ारों ज़िम्मेदारियों के बोझ तले भी अपनी जगह से ना हिलने वाला। वो सुगंध, जिसे मैंने हमेशा दूसरों की बातों से और उसके खुद के लापरवाह लहज़े से judge किया था, लेकिन जिसे मैंने महसूस किया था, वो तो बिल्कुल अलग था। वो सुगंध सिर्फ़ मेरा था।
मुझे याद आया, उसके tattoo पर कुछ coordinates लिखे हुए थे। शायद धौलाधार के, या पता नहीं किसी ऐसी जगह के जहाँ उसकी ज़िंदगी का कोई life-changing moment हुआ हो। लाख पूछने पर भी उसने कभी मुझे वो कहानी नहीं सुनाई थी। सोचते-सोचते मुझे एक हल्की-सी हँसी आ गई और उसका वो मज़ाकिया अंदाज़ मेरे ज़हन में आ गया। उसके साथ रहने पर मेरा नाचने का मन करता था; मन करता था कि हम दोनों बस पी लें, और सारी शिकायतें, सारे दर्द उस dance floor पर नाच-नाच कर निकाल दें। एक ऐसा डांस जहाँ कोई रीटेक न हो, कोई जज करने वाला न हो, और फिर वैसे ही खड़े हो जाएँ, जैसे हमारे दिल जनम-जनम से जुड़े हुए थे।
वक़्त धीरे-धीरे मुझे पीछे खींच रहा था। वही हो रहा था जिससे मुझे सबसे ज़्यादा डर था। धूल पड़े पन्ने वापस हवा से उठकर झूमने लगे थे, मिट्टी उड़ने लगी थी और प्यार अपनी गिरहें खोल रहा था।
मुझे याद आया… दफ़्तर में मेरे उस आख़िरी दिन, मैंने green color की dress पहनी थी और उसने blue shirt। क्या कमाल का इत्तेफ़ाक़ था, जिस रात उसने मुझे पहली बार छुआ था, उस रात भी—एक ऐसी party में जहाँ हम दोनों बिना बुलाए crash कर गए थे—वहाँ भी हम दोनों ने हूबहू इसी रंग के कपड़ों में थे। वही मेरा green और उसका blue… जैसे कोई कोड हो जो सिर्फ हम दोनों को पता था। प्रकृति ने विदाई के उस आख़िरी दिन भी हमें उसी green और blue के इत्तेफ़ाक़ में रंगकर विदा किया, यह जताने के लिए कि ये लम्हे अब दोबारा लौटकर नहीं आएंगे। कपड़ों के वो दो रंग जैसे चीख-चीखकर कह रहे थे कि हम दूर होकर भी एक-दूसरे की ही चॉइस हैं।
शायद नियति हमें तभी से कोई इशारा दे रही थी। बस timing ख़राब थी हम दोनों की उस वक़्त… वरना, we were both just so perfect for each other.
