Part 18 — Ananya POV

मैं नए office की building के बाहर खड़ी थी। सुबह की धूप सामने लगे बड़े-बड़े glass panels पर पड़ रही थी और उनमें मेरी ही परछाई बार-बार दिखाई दे रही थी। हाथ में joining folder था, कंधे पर laptop bag और दिल में एक ऐसी घबराहट, जिसे मैं खुद भी समझ नहीं पा रही थी। लोग बिना रुके अंदर जा रहे थे। कोई coffee लेकर अपनी team के साथ हँसते हुए lift की तरफ़ बढ़ रहा था, कोई phone पर किसी meeting की बात कर रहा था, किसी के चेहरे पर नए office का excitement था। मैं उन सबको देख रही थी और सोच रही थी कि क्या हर नई शुरुआत इतनी ही आसान होती है, या सिर्फ़ मुझे ही हर बार अपनी ज़िंदगी फिर से शुरू करनी पड़ती है।

नया office सिर्फ़ एक नई company नहीं होता। इसका मतलब होता है फिर से लोगों के बीच अपनी जगह बनाना, फिर से अपना introduction देना, फिर से यह समझना कि किससे कितनी बात करनी है, किस पर भरोसा किया जा सकता है, किसके सामने अपनी हँसी सच्ची होगी और किसके सामने सिर्फ़ professional मुस्कान। सबसे मुश्किल काम काम सीखना नहीं होता, सबसे मुश्किल होता है उन लोगों को छोड़ना जिनके साथ रोज़ जीने की आदत हो चुकी हो। मैं अभी तक पुराने office से बाहर ही कहाँ निकल पाई थी। वहाँ की हर छोटी-सी चीज़ मेरी आदत बन चुकी थी। सुबह का वही रास्ता, pantry की वही coffee, lunch table की वही बातें, शाम की वही भागदौड़… और उन सबके बीच एक इंसान, जिसकी मौजूदगी मेरे दिन का सबसे शांत हिस्सा बन चुकी थी।

Reception के सामने रखे sofa पर बैठते ही मैंने अपना phone निकाल लिया। बिना किसी वजह के screen unlock की, WhatsApp खोला, फिर बंद कर दिया। दोबारा unlock किया। Contacts खोले। कुछ नामों पर उँगलियाँ जाकर रुक गईं, लेकिन किसी को call करने की हिम्मत नहीं हुई। पता नहीं मैं किससे बात करना चाहती थी। शायद किसी ऐसे इंसान से जो मुझे यह कह दे कि सब ठीक हो जाएगा। तभी जाने क्यों, बिना किसी कोशिश के, मेरे मन में Sugandh का नाम आया। जैसे किसी ने भीड़ के बीच धीरे से उसका नाम लेकर मुझे पुकार लिया हो। दिल के अंदर एक कसक-सी उठी। मैंने phone अपनी गोद में रख दिया और कुछ पल तक उसे देखती रही। मैंने उसे block क्यों कर दिया था?

सवाल नया नहीं था। पिछले कई हफ़्तों से मेरे भीतर था। लेकिन आज पहली बार उसने इतनी ज़ोर से मुझे घेरा कि मैं उससे बच नहीं पाई। शायद इसलिए क्योंकि आज पहली बार मैं उस जगह पर नहीं थी जहाँ वह कहीं-न-कहीं मेरे आसपास हुआ करता था। चाहे हम पूरे दिन बात न करें, चाहे वह अपने काम में डूबा रहे, चाहे मैं अपनी screen से सिर भी न उठाऊँ, फिर भी एक अजीब-सा सुकून रहता था कि वह यहीं है… बस कुछ कदम दूर।

Office का पूरा शोर धीरे-धीरे मेरे कानों से दूर होने लगा और मेरा मन अपने-आप उसी floor पर पहुँच गया जहाँ मेरी seat के ठीक सामने Sugandh बैठा करता था। कितनी बार ऐसा हुआ था कि मैं किसी Task में उलझी होती और सामने से उसकी आवाज़ आती। वह Aarti को कुछ समझा रहा होता, किसी client के साथ call पर होता या अपनी team के साथ किसी discussion में। मुझे उसके शब्द याद नहीं रहते थे, लेकिन उसकी आवाज़ याद रहती थी। उसमें एक अजीब-सी softness थी। ऐसा लगता था जैसे किसी ने पूरे office के शोर में मेरे लिए एक शांत कोना बचाकर रखा हो। कई बार मैं जान-बूझकर screen से नज़रें नहीं उठाती थी, लेकिन कान हमेशा उसकी तरफ़ लगे रहते थे। वह हँसता था तो जाने क्यों मेरे होंठ भी बिना वजह मुस्कुरा देते थे। वह किसी बात को लेकर serious होता तो मेरा मन भी जाने क्यों बेचैन हो जाता था। शायद प्यार धीरे-धीरे ऐसे ही आता है। किसी बड़े इज़हार से नहीं, किसी फ़िल्मी पल से नहीं… किसी की आदत बन जाने से।

उसकी सबसे खूबसूरत बात उसका चेहरा नहीं था, उसकी मुस्कान भी नहीं। उसकी सबसे खूबसूरत बात यह थी कि वह जिस इंसान से बात करता था, पूरी तरह उसी के साथ होता था। अगर वह किसी की बात सुन रहा होता तो सचमुच सुन रहा होता। अगर किसी की मदद कर रहा होता तो बिना एहसान जताए करता था। मैंने बहुत कम लोगों को इतना ध्यान से लोगों को notice करते देखा था। शायद इसी वजह से पहली बार मुझे लगा था कि किसी ने मुझे भी notice किया है। पहली बार किसी ने मेरी चुप्पी को सिर्फ़ चुप्पी नहीं समझा था।

और शायद यहीं से मेरी हार शुरू हुई।

मैंने उसे चाहने का फ़ैसला नहीं किया था। ऐसा कुछ होता भी नहीं। मैं तो बस उसके साथ रहना पसंद करने लगी थी। फिर उसका आसपास होना अच्छा लगने लगा। फिर उसका मुस्कुराना अच्छा लगने लगा। फिर उसकी आवाज़ सुनना दिन का सबसे पसंदीदा हिस्सा बन गया। और एक दिन अचानक मुझे एहसास हुआ कि मैं उससे प्यार करने लगी हूँ। इतना धीरे-धीरे हुआ था यह सब कि मुझे शुरुआत का दिन भी याद नहीं।

लेकिन प्यार के साथ-साथ एक और चीज़ लौट आई थी—डर।

मुझे Sugandh से नहीं, अपने दिल से डर लगने लगा था। एक बार पहले भी मैंने किसी को टूटकर चाहा था। इतना कि हर मंदिर में उसका नाम माँगा था। हर रात भगवान से यही पूछा था कि अगर वह मेरे लिए नहीं था, तो फिर मेरे दिल में उसके लिए इतनी जगह क्यों बना दी। जब वह नहीं मिला तो सबसे पहले मेरा भरोसा टूटा था। उसके बाद बहुत समय लगा खुद को समेटने में। बाहर से मैं सामान्य हो गई थी, लेकिन भीतर कहीं मैंने यह तय कर लिया था कि अब किसी को इतना अधिकार नहीं दूँगी कि उसके जाने के बाद मैं फिर से खुद को जोड़ती फिरूँ।

फिर Sugandh आया।

उसने कभी मुझे impress करने की कोशिश नहीं की। कभी बड़े वादे नहीं किए। कभी मुझे अपने करीब लाने की कोशिश नहीं की। वह बस वैसा ही था जैसा वह था। शायद यही वजह थी कि उसके साथ मुझे कभी किसी और जैसा बनने की ज़रूरत महसूस नहीं हुई। उसके सामने मैं अपने सबसे सच्चे रूप में होती थी। बिना सोचे बोल देती थी। बिना डरे हँस देती थी। बिना वजह मुस्कुरा देती थी। और यही बात मुझे सबसे ज़्यादा डराने लगी।

क्योंकि मुझे उसके दिल के बारे में कुछ नहीं पता था।

मुझे नहीं पता था कि वह मुझे किस नज़र से देखता है।

मैं उसके लिए क्या हूँ।

मैं उसके दिन का कितना हिस्सा हूँ।

या शायद… हूँ भी या नहीं।

उसकी अपनी दुनिया थी। उसके अपने दोस्त थे। लोग उसे पसंद करते थे। उसके आसपास हमेशा कोई-न-कोई होता था। और मैं? मैं कौन थी? एक colleague? एक दोस्त? या सिर्फ़ उन कई चेहरों में से एक चेहरा, जिनसे वह रोज़ मिलता था? लेकिन मेरा दिल यह मानने को तैयार ही नहीं था। जाने क्यों उसे लगता था कि Sugandh पर उसका कोई अधिकार है। मैं खुद को लाख समझाती कि मुझे ऐसा नहीं सोचना चाहिए, लेकिन जब भी किसी और के साथ उसे हँसते हुए देखती, दिल के किसी कोने में हल्की-सी जलन उठ ही जाती। फिर मैं खुद पर ही गुस्सा करती। आख़िर मेरा हक़ था ही क्या?

यही सवाल धीरे-धीरे मेरे भीतर इतना बड़ा होता गया कि मैंने उससे दूर जाने का फ़ैसला कर लिया। मुझे लगा, अगर मैं अभी नहीं रुकी, तो शायद कभी रुक नहीं पाऊँगी। अगर मैंने अपने दिल को एक कदम और बढ़ने दिया, तो वह इतनी दूर निकल जाएगा कि फिर वापस लौटना मेरे बस में नहीं रहेगा। मैंने सोचा था कि दूरी मुझे बचा लेगी। मैंने सोचा था कि उसे block कर देने से मेरी आदत भी धीरे-धीरे छूट जाएगी।

लेकिन कुछ आदतें phone block करने से नहीं छूटतीं।वे साँसों में बस जाती हैं। और जब साँस लो… तो वही याद आए।

पहले कुछ दिन नए office में ऐसे बीते जैसे मैं किसी और की ज़िंदगी जी रही हूँ। लोग मेरे आसपास थे, मुझसे बातें कर रहे थे, मुझे systems समझा रहे थे, meetings में introduce करवा रहे थे, लेकिन मेरा मन उन सबके बीच कहीं टिक ही नहीं पा रहा था। मैं सामने बैठे लोगों के नाम सुनती, अगले ही पल भूल जाती। कोई कुछ पूछता तो मैं मुस्कुराकर जवाब दे देती, लेकिन जवाब देने के बाद मुझे याद ही नहीं रहता कि मैंने कहा क्या था। ऐसा लग रहा था जैसे मेरा शरीर यहाँ बैठा हो और मेरा मन अब भी उस पुराने office की किसी desk पर चुपचाप बैठा Sugandh को काम करते हुए देख रहा हो।

धीरे-धीरे मुझे अपनी ही एक अजीब-सी आदत का एहसास होने लगा। हर बार जब office का main door खुलता, मेरी नज़र उसी तरफ़ उठ जाती। कोई अंदर आता और एक पल के लिए दिल उम्मीद करता कि शायद… फिर अगले ही पल मैं खुद पर हल्का-सा मुस्कुरा देती। यह जानते हुए भी कि Sugandh इस office में नहीं है, मेरी आँखें उसे ढूँढ़ना नहीं छोड़ रही थीं। दिमाग़ हर बार समझाता, “वह यहाँ नहीं है, Ananya।” लेकिन आदतें दिमाग़ की भाषा कहाँ समझती हैं। उन्हें तो बस वही रास्ता याद रहता है, जिस पर वे रोज़ चला करती थीं।

Lunch break मेरे दिन का सबसे मुश्किल हिस्सा बन गया था। पहले lunch का समय आते ही पूरी team canteen की तरफ़ निकल जाती थी। कोई किसी की plate से खाना उठा लेता, कोई किसी की बात का मज़ाक बना देता, कोई बिना वजह हँसने लगता। मुझे तब कभी एहसास ही नहीं हुआ था कि उन हँसी के बीच मेरा सबसे ज़्यादा ध्यान किस पर रहता है। Sugandh कभी बहुत ज़्यादा नहीं बोलता था, लेकिन जब भी बोलता था, पूरी बात सुनकर बोलता था। कई बार वह चुपचाप खाना खाता रहता और मैं चोरी-चोरी उसे देख लेती। उस समय यह सिर्फ़ एक आदत लगती थी। आज समझ आया कि वह आदत नहीं थी… वह मेरे दिन का सबसे सुकून भरा हिस्सा था।

यहाँ lunch table पर सब नए लोग थे। नई बातें थीं, नए jokes थे, नए references थे। मैं उनके बीच बैठी रहती, लेकिन मुझे हर थोड़ी देर बाद ऐसा लगता जैसे कोई कुर्सी खाली है। कोई है जो होना चाहिए था, लेकिन है नहीं। मैं कई बार खुद को डाँटती भी थी। “बस करो, Ananya। वह तुम्हारी ज़िंदगी का हिस्सा नहीं है। आगे बढ़ो।” लेकिन दिल शायद किसी बच्चे की तरह होता है। जितना उसे समझाओ, उतनी ही ज़िद करता है।

शाम को घर लौटना भी आसान नहीं रहा। पहले office से निकलते हुए दिन भर की थकान होती थी। अब थकान के साथ एक खालीपन भी घर आता था। घर पहुँचते ही सबसे पहले phone हाथ में आ जाता। मैं बिना सोचे Instagram खोलती, फिर तुरंत बंद कर देती। WhatsApp खोलती, फिर बिना किसी chat पर जाए वापस आ जाती। कई बार block list तक जाकर उसका नाम देखती और देर तक screen को देखती रहती। उँगली बस एक tap दूर होती, लेकिन हर बार मैं phone वापस रख देती। मैंने खुद से कहा था कि अगर यह फ़ैसला मैंने लिया है, तो उसे निभाऊँगी भी।

लेकिन कुछ फ़ैसले निभाने से ज़्यादा भीतर तोड़ते हैं।

एक रात जाने क्या सोचकर मैंने अपनी diary निकाली। बहुत दिनों से उसमें कुछ नहीं लिखा था। पन्ना खोला तो हाथ अपने-आप चलने लगे।

मुझे नहीं पसंद जो तुम अब बन रहे हो।
मुझे बहुत याद आता है जो तुम हुआ करते थे।
मेरी कही बातों को अब अनसुना करते हो।
पहले तो तुम आँखें पढ़ा करते थे।

समय मेरे लिए अब कहाँ ही है तुम्हारे पास।
लड़ते झगड़ते तो हम तब भी थे।
मगर मेरे नाराज़ होने पर तुम मुझे घंटों मनाया करते थे।
मुझे नहीं पसंद जो तुम अब बन रहे हो।
मुझे बहुत याद आता है जो तुम हुआ करते थे।

मैंने पन्ना बंद किया।

Diary वापस रख दी।

अगले दिन फिर लिखा।

उसके अगले दिन भी।

धीरे-धीरे वह diary ख़तों से भरने लगी। ऐसे ख़त जिन्हें भेजने का मेरा कभी इरादा नहीं था। मैं उन्हें इसलिए नहीं लिखती थी कि Sugandh पढ़े। मैं उन्हें इसलिए लिखती थी क्योंकि अगर नहीं लिखती, तो शायद मेरे भीतर जमी बातें मुझे सोने नहीं देतीं।

कुछ हफ़्तों बाद मुझे महसूस हुआ कि मैं सिर्फ़ उसे याद नहीं कर रही थी, मैं उसे जी रही थी। सुबह उठते ही पहला ख़याल वही होता। रास्ते में कोई उसकी जैसी चाल से चलता दिखाई देता तो दिल एक पल के लिए धड़कना भूल जाता। किसी की आवाज़ थोड़ी भी उससे मिलती-जुलती लगती तो मैं अनायास मुड़कर देखने लगती। एक दिन lift में किसी ने वही perfume लगाया हुआ था जो कभी-कभी Sugandh लगाया करता था। पूरा दिन उस ख़ुशबू ने मुझे चैन से काम नहीं करने दिया। मुझे पहली बार समझ आया कि यादें सिर्फ़ दिमाग़ में नहीं रहतीं, वे हमारी इंद्रियों में भी बस जाती हैं।

मैं खुद को समझाने की हर कोशिश कर रही थी। मैंने काम में डूबने की कोशिश की। Extra assignments लिए। देर तक office में रुकने लगी। Weekend पर online courses शुरू कर दिए। दोस्तों से ज़्यादा बात करने लगी। बाहर से देखने पर शायद मैं पहले से ज़्यादा busy हो गई थी। लेकिन सच यह था कि मैं जितना खुद से भाग रही थी, उतनी ही तेज़ी से अपने ही दिल की तरफ़ लौट रही थी।

एक शाम घर लौटकर मैं बिना light जलाए ही sofa पर बैठ गई। कमरे में अँधेरा धीरे-धीरे फैल रहा था। Phone बार-बार vibrate हो रहा था। Office के messages थे। Team की mails थीं। लेकिन मेरा मन किसी और इंतज़ार में बैठा था। उस इंतज़ार का, जिसके पूरे होने की कोई संभावना ही नहीं थी।

तभी पहली बार मुझे अपने पैरों में एक अजीब-सी जकड़न महसूस हुई।

पहले लगा शायद पूरे दिन बैठने की वजह से होगा। मैं उठी, थोड़ा चली, पानी पिया। लेकिन वह कसाव गया नहीं। अगले दिन फिर हुआ। उसके अगले दिन भी। धीरे-धीरे मुझे महसूस होने लगा कि जब भी Sugandh की याद ज़्यादा आती, मेरे पैरों में वही भारीपन उतर आता। जैसे शरीर किसी ऐसी बात को पकड़कर बैठा हो, जिसे मेरा दिमाग़ छोड़ देना चाहता था।

मैंने उसे नज़रअंदाज़ किया।

मैंने खुद से कहा—“यह सब तुम्हारे दिमाग़ का खेल है।”

लेकिन शायद मेरा शरीर मुझसे ज़्यादा सच जानता था।

अगले कुछ दिनों तक मैंने खुद को यही समझाया कि शायद मैं ज़रूरत से ज़्यादा सोच रही हूँ। नई company थी, नया environment था, ज़िम्मेदारियाँ भी पहले से अलग थीं। मैंने अपनी सारी बेचैनी का कारण यही मान लिया। लेकिन इंसान खुद से कितनी देर तक झूठ बोल सकता है? हर शाम जब मैं घर लौटती, पूरे दिन की थकान से ज़्यादा मुझे उस ख़ामोशी से डर लगता जो दरवाज़ा बंद करते ही पूरे घर में फैल जाती थी। पहले मुझे अकेले रहना अच्छा लगता था। अब वही अकेलापन मेरे सामने बैठकर मुझसे सवाल पूछता था, जिनका मेरे पास कोई जवाब नहीं था।

मैंने खुद को व्यस्त रखने की हर संभव कोशिश की। सुबह जल्दी उठने लगी। Office सबसे पहले पहुँचने लगी। Lunch भी कई बार अपनी desk पर ही कर लेती ताकि लोगों के बीच बैठकर मुस्कुराने का अभिनय न करना पड़े। शाम को घर आकर laptop खोल लेती, कोई course देखने लगती, कोई article पढ़ने लगती, लेकिन हर दस-पंद्रह मिनट बाद पता नहीं क्यों मेरी उँगलियाँ अपने-आप phone की तरफ़ बढ़ जातीं। Screen unlock होती, WhatsApp खुलता, फिर बिना कुछ किए बंद हो जाता। Instagram खुलता, फिर बंद। जैसे मैं किसी message का इंतज़ार नहीं कर रही थी… मैं किसी एहसास का इंतज़ार कर रही थी।

कभी-कभी मैं खुद पर हँस भी देती थी। कितनी अजीब बात थी। मैंने ही उसे block किया था, मैंने ही उससे दूरी बनाई थी, और अब उसी दूरी का सबसे ज़्यादा दर्द मुझे हो रहा था। उस वक़्त मुझे लगा था कि मैं सही कर रही हूँ। मुझे लगा था कि अगर मैं उससे दूर हो गई, तो धीरे-धीरे मेरा मन भी उससे दूर हो जाएगा। लेकिन शायद प्यार का हिसाब दूरी से नहीं होता। कुछ लोग हमारे पास रहकर भी अजनबी बने रहते हैं, और कुछ लोग दूर जाकर भी हमारी हर साँस में बस जाते हैं।

मुझे आज भी उसका आख़िरी दिन याद था। उसकी आवाज़, उसका चेहरा, उसकी आँखों का वह शांत-सा भाव। उस दिन भी उसने ऐसा कुछ नहीं कहा था जिससे मुझे लगता कि वह मुझे रोक लेगा। शायद इसलिए क्योंकि उसे रोकना था ही नहीं। उसने तो कभी मुझे पकड़ा ही नहीं था। मैं ही थी जिसने उसके छोटे-छोटे gestures में अपना पूरा संसार देख लिया था। कई बार मैं सोचती, क्या सचमुच उसने कभी मेरी तरफ़ उस नज़र से देखा भी था? या यह पूरी कहानी सिर्फ़ मेरे दिल ने लिखी थी?

यही सोच मुझे सबसे ज़्यादा तोड़ती थी।

अगर सचमुच यह सब सिर्फ़ मेरी तरफ़ से था…

तो फिर मुझे इतना दर्द क्यों हो रहा था?

और अगर उसकी तरफ़ से भी कुछ था…

तो उसने कभी जताया क्यों नहीं?

इन दोनों सवालों के बीच मैं हर दिन झूलती रहती। किसी एक जवाब पर पहुँचने से पहले दूसरा सवाल सामने खड़ा हो जाता। शायद इसी का नाम uncertainty है। और मुझे हमेशा से uncertainty से डर लगता था। दुख से नहीं। इनकार से भी नहीं। लेकिन उस इंतज़ार से, जिसमें न हाँ होती है, न ना। जिसमें इंसान रोज़ अपने ही मन से पूछता रहता है कि क्या जो मैं महसूस कर रही हूँ, वह सच भी है या नहीं।

धीरे-धीरे मैंने महसूस किया कि मेरा शरीर भी इस चुप्पी में शामिल होने लगा है। सुबह उठते ही पैरों में वही भारीपन रहता। जैसे रात भर किसी ने उनमें वज़न बाँध दिया हो। Office में बैठते-बैठते कई बार body में कसाव महसूस होता। मैं उठकर थोड़ा चलती, पानी पीती, stretching करती, लेकिन कुछ देर बाद फिर वही एहसास लौट आता। पहले मुझे लगता था शायद posture की वजह से है। फिर मैंने chair बदलवाई। Shoes बदलकर देखे। Doctor के पास जाने का भी सोचा। लेकिन हर बार एक बात मेरे ध्यान में आती—यह तकलीफ़ सबसे ज़्यादा तब बढ़ जाती थी, जब मैं Sugandh के बारे में सोच रही होती।

एक दिन मैं meeting में बैठी थी। सामने presentation चल रही थी। सब लोग discussion कर रहे थे। अचानक speaker की आवाज़ में एक लहजा ऐसा आया जो मुझे एक पल के लिए Sugandh जैसा लगा। मैंने बिना सोचे सिर उठाकर सामने देखा। अगले ही पल एहसास हुआ कि वह कोई और है। मैं वापस screen की तरफ़ देखने लगी, लेकिन मेरी आँखें धुँधली हो चुकी थीं। पता नहीं कब मेरे भीतर इतना खालीपन जमा हो गया था कि किसी की आवाज़ भी मुझे उसके पास ले जाती थी।

उस रात diary का एक और पन्ना भर गया।

“आज मुझे पहली बार डर लगा कि कहीं मैं तुम्हें भूलना नहीं, खुद को खोना शुरू तो नहीं कर चुकी। तुमसे बात किए बिना इतने दिन हो गए हैं, लेकिन मेरे दिन अब भी तुम्हारे आसपास ही घूमते हैं। मैं खुद को समझाती हूँ कि तुम मेरी ज़िंदगी का हिस्सा नहीं हो, लेकिन मेरा मन हर रोज़ उसी जगह लौट जाता है जहाँ तुम बैठे होते थे। शायद इंसान किसी को भूलने की कोशिश करते-करते सबसे ज़्यादा उसी को याद करने लगता है।”

मैंने diary बंद की और उसे सीने से लगाकर कुछ देर यूँ ही बैठी रही।

उस रात बहुत देर तक नींद नहीं आई।मैंने करवट बदली।फिर दूसरी करवट।फिर तीसरी।लेकिन हर करवट के साथ एक ही चेहरा मेरे सामने आकर बैठ जाता।मैंने आँखें बंद कर लीं।

मन ही मन खुद से कहा—

“बस एक बार… बस एक बार उसे देख लूँ, फिर शायद सब ठीक हो जाएगा।”

लेकिन मुझे नहीं पता था कि कुछ चाहतें पूरी होने से पहले इंसान को अंदर तक तोड़ देती हैं।


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Author: Onesha

She is the funny one! Has flair for drama, loves to write when happy! You might hate her first story, but maybe you’ll like the next. She is the master of words, but believes actions speak louder than words. 1sha Rastogi, founder of 1shablog.com.

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