Part 19

Diary बंद करने के बाद भी मेरा मन शांत नहीं होता था। मैंने खुद से वादा किया था कि मैं उससे कोई रिश्ता नहीं रखूँगी। मैंने उसे block भी कर दिया था। बाहर से देखने पर जैसे मैंने अपनी ज़िंदगी से उसे पूरी तरह निकाल दिया था। लेकिन सच यह था कि मेरा दिल उतना मज़बूत कभी था ही नहीं।

Therapy से भी मेरे अंदर की भावनाएँ बाहर नहीं आ पा रही थीं। लिखना ही हमेशा मेरा सहारा रहा था। कोई उसे पढ़े या न पढ़े, उससे कभी फ़र्क नहीं पड़ा। मैं बस अपने दिल का सारा बोझ पन्नों पर उतार देती थी, और धीरे-धीरे हल्का महसूस करने लगती थी।

लेकिन इस बार पता नहीं क्यों, यह तरीका भी काम नहीं कर रहा था। जितना लिखती, उतना ही लगता जैसे कुछ अब भी भीतर अटका हुआ है। शायद इसलिए क्योंकि इस बार तुम सिर्फ़ मेरे ख़यालों में नहीं थे, तुम मेरी रूह की किसी ऐसी गहराई तक उतर चुके थे, जिसकी मुझे खुद भी ख़बर नहीं थी।

कई रातों में, जब पूरे घर में सन्नाटा होता और नींद आँखों से कोसों दूर होती, मैं अपनी एक fake profile से उसका Instagram खोलकर बैठ जाती। मैं खुद से कहती कि बस दो मिनट… बस यह देख लूँ कि वह ठीक है। लेकिन वे दो मिनट जाने कब आधे घंटे में बदल जाते। उसकी profile पर कुछ नया न भी हो, तब भी मैं उसे देखती रहती। जैसे उसकी एक तस्वीर, उसका एक post, उसकी online मौजूदगी भर इस बात का सबूत हो कि वह इस दुनिया में है… और कहीं-न-कहीं अपनी ज़िंदगी जी रहा है।

एक दिन उसने status लगाया

“तू हवा की तरह आज़ाद… और मैं पहाड़ों की तरह ख़ामोश।”

मैं उस एक line पर जाने कितनी देर तक रुकी रही।

फिर एक और

“एक समंदर है जो मेरे काबू में है ,
और एक कतरा है जो मुझसे संभाला नहीं जाता”
एक उम्र है जो बितानी है उसके बगैर,
और एक लम्हा है जो मुझसे गुज़ारा नहीं जाता।”

पता नहीं वह किसके लिए लिखी गई थी। शायद किसी के लिए भी नहीं। शायद सिर्फ़ एक song की line थी। शायद उसे खुद भी याद न हो कि उसने यह status लगाया था।

लेकिन मेरा दिल कहाँ मानने वाला था।

मैंने उस एक line के जाने कितने मतलब निकाल लिए।

क्या वह भी किसी को याद कर रहा था?

क्या उसकी ख़ामोशी के पीछे भी कोई कहानी थी?

या फिर हमेशा की तरह मैं एक साधारण-सी बात में अपने लिए उम्मीद ढूँढ़ रही थी?

Phone बंद करने के बाद भी वह line मेरे भीतर देर तक गूँजती रही।

“तू हवा की तरह आज़ाद… और मैं पहाड़ों की तरह ख़ामोश।”

कतरा..
लम्हा
संभाला

क्या वो हम दोनों के बीच हुए एक लम्हे की बात कर रहा था ?
जब हम दोनों की आँखें मिली
मैं ज्यादा सोच रही हूं,
उसे ये पसंद आया होगा,
क्या पता कोई और हो जिसके लिए लिखी गई हो?

पूरे शरीर में दर्द की एक ऐसी लहर दौड़ी और मैं अगली सुबह तक आंसुओं में कैद उसी तरह बिस्तर में पड़ी रही

“Sugandh, क्या सच में…?
जो तुम Share करते थे, क्या उसे महसूस भी करते थे? या वो बस खूबसूरत शब्द थे, जिन्हें पढ़कर आगे बढ़ जाना आसान होता है? क्या तुम्हें सच में इतनी गहरी, वो उलझी हुई बातें, वो रूह तक उतर जाने वाले शब्द पसंद थे… या फिर वो सिर्फ़ तुम्हारे Status का हिस्सा थे? मैं अक्सर सोचती थी, जो इंसान ऐसी बातें साझा करता है, क्या उसके भीतर भी उतनी ही गहराई होती है, या फिर उन शब्दों का रिश्ता सिर्फ़ उसकी Screen तक ही सीमित होता है?”

मैंने आईने में खुद को देखा और सहजता मुस्कुरा दी। कैसी विडंबना थी। बाहर से देखने वाले को शायद सचमुच मैं ही आज़ाद लगती। नई company, नई शुरुआत, नई ज़िंदगी। लेकिन मेरे भीतर तो सब कुछ वहीं ठहरा हुआ था, जहाँ मैंने उसे आख़िरी बार देखा था। अगर इस कहानी में कोई पहाड़ था… तो शायद वह मैं थी। बाहर से बिल्कुल स्थिर, भीतर जाने कितने मौसम समेटे हुए। शायद वो खुद को समझता था?

दिन बीत रहे थे, लेकिन मेरे भीतर समय जैसे वहीं ठहर गया था। Calendar की तारीख़ें बदलती थीं, meetings बदलती थीं, projects बदलते थे, लोगों के चेहरे बदलते थे, लेकिन एक चीज़ नहीं बदल रही थी—हर दिन का अंत उसी जगह जाकर रुकता था, जहाँ से मैंने खुद को जबरदस्ती मोड़ लिया था।

धीरे-धीरे मुझे एहसास होने लगा कि मैं Sugandh को भूलने की कोशिश नहीं कर रही थी, मैं उसे हर दिन अपने भीतर ज़िंदा रख रही थी। हर रात diary का एक नया पन्ना भरता। कभी दो लाइनें लिखती, कभी चार पन्ने। कभी सिर्फ़ उसका नाम लिखकर देर तक उसे देखती रहती। कई बार लिखते-लिखते ऐसा लगता जैसे वह मेरे सामने बैठा है और मैं उससे बातें कर रही हूँ। फिर अचानक याद आता कि यह conversation सिर्फ़ मेरे हिस्से में हो रही है। वह तो इन ख़तों के बारे में जानता भी नहीं।

मैंने कई बार सोचा कि सारे ख़त फाड़ दूँ।

फिर लगा, अगर इन्हें भी फाड़ दिया तो मेरे पास बचेगा क्या?

शायद इंसान यादों को इसलिए नहीं संभालकर रखता कि वह अतीत में जीना चाहता है। कभी-कभी वह उन्हें इसलिए बचाकर रखता है क्योंकि उसे डर होता है कि कहीं वह उस इंसान को महसूस करना ही न भूल जाए।

एक शाम office से लौटते हुए बारिश शुरू हो गई। सड़क पर लोग भाग रहे थे। किसी ने bag सिर पर रख लिया था, कोई cab रोकने की कोशिश कर रहा था। मैं भी भीगती हुई parking तक पहुँची। बारिश की मिट्टी की खुशबू हमेशा से मुझे पहाड़ों की याद दिलाती थी। जाने क्यों उसी पल मुझे Sugandh की कही हुई एक बात याद आ गई। उसने एक बार मुस्कुराते हुए कहा था, “बारिश में पहाड़ सबसे ज़्यादा ख़ूबसूरत लगते हैं… क्योंकि उस वक़्त वे कुछ कहते नहीं, बस सुनते हैं।”

मैं गाड़ी में बैठी और बहुत देर तक engine start नहीं किया।मुझे याद नहीं था कि उसने यह बात किस दिन कही थी।लेकिन मुझे उसकी आवाज़ याद थी।उसकी आँखों का वह शांत-सा भाव याद था।उसके बोलते वक़्त हाथों का धीरे-धीरे हिलना याद था।

यादें भी कितनी अजीब होती हैं। पूरा दिन याद नहीं रहता, लेकिन किसी की आवाज़ का उतार-चढ़ाव सालों तक याद रहता है।

घर पहुँचकर मैंने भीगे कपड़े बदले और बिना light जलाए balcony में जाकर बैठ गई। सामने आसमान धुँधला था। बारिश अब भी हो रही थी। मैंने phone उठाया। जाने क्यों उँगलियाँ फिर उसी fake profile तक पहुँच गईं। अब यह आदत बन चुकी थी। मैं खुद से हर रात कहती आज नहीं देखूँगी। लेकिन रात होते-होते जैसे दिल मेरी सारी कसमें तोड़ देता।

उसने उस दिन कुछ post नहीं किया था।कोई story भी नहीं थी।फिर भी मैं उसकी profile पर देर तक रुकी रही।उसकी profile picture को देखती रही।उसका नाम पढ़ती रही।फिर phone बंद कर दिया।

कभी-कभी किसी इंसान की मौजूदगी सिर्फ़ उसके online होने भर से महसूस होने लगती है। और जब वह भी न मिले, तो एक अजीब-सी घबराहट दिल में उतर आती है।

उस रात मैं बहुत देर तक सो नहीं पाई।नींद आती भी तो किसी हल्की-सी आहट से टूट जाती।कभी लगता किसी ने मेरा नाम लिया।कभी लगता phone vibrate हुआ।कभी लगता दरवाज़े की घंटी बजी है।

लेकिन हर बार कमरा वैसा ही ख़ामोश मिलता।मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं किस चीज़ का इंतज़ार कर रही हूँ।उसके message का? उसके phone का?

या सिर्फ़ इस बात का कि किसी तरह यह दर्द थोड़ा कम हो जाए?

अगले कुछ दिनों में मेरे शरीर ने जैसे मेरा साथ देना कम कर दिया। सुबह उठते ही पैरों में वही जकड़न रहती।सिर भारी लगता। सीढ़ियाँ उतरते हुए ऐसा महसूस होता जैसे रात भर किसी ने उनमें अदृश्य वज़न बाँध दिया हो। Office में बैठते-बैठते कई बार मैं बिना वजह अपनी टाँगें सीधी करने लगती। Colleagues पूछते, “सब ठीक है?” और मैं हर बार मुस्कुराकर कह देती, “हाँ, बस शायद ज़्यादा देर बैठने की वजह से।”

लेकिन मुझे पता था…

यह सिर्फ़ ज़्यादा देर बैठने की वजह से नहीं था।

मैंने अपने शरीर को पहली बार इतनी बारीकी से सुनना शुरू किया। जब भी Sugandh की याद ज़्यादा आती, वही कसाव बढ़ जाता। जब काम में मन लग जाता, कुछ देर के लिए हल्का महसूस होता। फिर कोई छोटी-सी बात किसी की आवाज़ और मेरा पूरा शरीर फिर उसी दर्द को याद कर लेता।

उस दिन पहली बार मुझे अपने ही भीतर एक अजीब-सी लड़ाई दिखाई दी।

मेरा दिमाग़ आगे बढ़ जाना चाहता था।मेरा दिल वहीं ठहरा हुआ था।और मेरा शरीर…

वह दोनों की लड़ाई अपने भीतर ढो रहा था।

शाम को diary खोलते हुए मैंने लिखा—

“क्या ऐसा हो सकता है कि किसी को भूलने की कोशिश में इंसान खुद को भूलने लगे? मुझे अब तुम्हारी कमी सिर्फ़ दिल में नहीं महसूस होती, Sugandh। ऐसा लगता है जैसे मेरा पूरा शरीर तुम्हें याद कर रहा है। जैसे हर साँस तुम्हारे होने और न होने के बीच अटक गई है। मुझे समझ नहीं आता कि मैं तुम्हें याद कर रही हूँ… या अपने उस हिस्से को, जो तुम्हारे साथ रहकर पहली बार सचमुच ज़िंदा महसूस हुआ था।”

मैंने pen बंद किया।

Diary पर हाथ रखा।

और बहुत देर तक चुप बैठी रही।

अगले दिन मेरी Therapist के साथ appointment थी। मैंने अपने मन की सारी बातें, अपनी हर उलझन और पिछले कुछ दिनों से भीतर चल रही उथल-पुथल उनके सामने रख दी। उन्होंने मुझे बहुत ध्यान से सुना और फिर एक अलग नज़रिया दिया। उनका कहना था कि शायद जितनी उलझनें मेरे मन में हैं, उनमें से कई सिर्फ़ एक ईमानदार बातचीत से सुलझ सकती हैं।

“You should talk to him.”

मैंने उसी पल साफ़ मना कर दिया। मुझे लगा, अब कहने के लिए बचा ही क्या है। लेकिन उन्होंने भी यह बात आसानी से नहीं छोड़ी। अगले कई sessions तक वह मुझे यही समझाते रहे कि जब तक मैं उससे बात नहीं करूँगी, तब तक मेरा मन अपनी तरफ़ से जवाब गढ़ता रहेगा और हर Possibility को सच मानता रहेगा। कई दिनों तक उनकी बात टालने के बाद, आखिरकार मैंने फैसला किया कि…

अगर मैंने उससे बात नहीं की… तो शायद मैं कभी खुद से भी बात नहीं कर पाऊँगी।

यही ख़याल आने के बाद पहली बार मुझे अपने ही फ़ैसले से डर लगा।

Phone करना इतना मुश्किल होगा, मैंने कभी सोचा नहीं था।

कई दिनों तक उसका number सिर्फ़ मेरी screen पर खुलता और बंद हो जाता। मैं Contacts में उसका नाम देखती, कुछ देर उसे देखती रहती, फिर phone lock कर देती। कभी लगता आज call कर दूँ। फिर अगले ही पल खुद को रोक लेती। अगर उसने phone नहीं उठाया तो? अगर उठाकर भी उसकी आवाज़ पहले जैसी नहीं हुई तो? अगर उसने पूछ लिया कि इतने दिनों बाद क्यों याद किया, तो मैं क्या जवाब दूँगी? क्या मैं उसे यह कह पाऊँगी कि मैं उसे भूलने निकली थी और खुद को ही खो बैठी?

दिन बीतते गए।

मैं बाहर से बिल्कुल सामान्य दिखाई देती थी। Office में समय पर पहुँचती, meetings attend करती, deadlines पूरी करती, लोगों के साथ हँसती भी थी। लेकिन मुझे खुद महसूस होने लगा था कि वह हँसी अब मेरे चेहरे तक तो पहुँचती है, आँखों तक नहीं। कभी-कभी washroom में जाकर मैं कुछ मिनट आईने के सामने खड़ी रहती। खुद को देखती और सोचती, क्या सचमुच यही मैं हूँ? वही Ananya जो छोटी-छोटी बातों पर खिलखिलाकर हँस देती थी? या फिर कहीं रास्ते में मैंने खुद का कोई हिस्सा पीछे छोड़ दिया है?

एक दिन office में किसी ने पीछे से मेरा नाम पुकारा।

“Ananya…”

आवाज़ Sugandh जैसी नहीं थी।

लेकिन पता नहीं क्यों मेरा दिल उसी तरह धड़क उठा जैसे कभी उसके बुलाने पर धड़कता था। मैंने पलटकर देखा। सामने कोई और था। उसने एक file मेरी तरफ़ बढ़ाई और सामान्य-सी बात करके चला गया। लेकिन मैं कई मिनट तक वहीं खड़ी रही। उस एक पल ने मुझे समझा दिया कि मैं सिर्फ़ उसे याद नहीं कर रही थी। मेरा मन हर आवाज़, हर चेहरे, हर आहट में उसे ढूँढ़ने लगा था।

उस शाम घर लौटते हुए मैंने गाड़ी सड़क किनारे रोक दी।

बिना किसी वजह के आँखों से आँसू बहने लगे।ऐसा नहीं था कि उस दिन कुछ बुरा हुआ था।असल में कुछ भी नहीं हुआ था।और शायद यही सबसे ज़्यादा तकलीफ़ दे रहा था।ज़िंदगी चल रही थी।सब कुछ Normal था।

बस मेरे भीतर कुछ धीरे-धीरे टूट रहा था।घर पहुँचकर मैंने diary खोली।बहुत देर तक pen हाथ में पकड़े बैठी रही। लिखने के लिए शब्द नहीं मिल रहे थे। पहली बार लगा कि दर्द इतना ज़्यादा हो गया है कि भाषा उसके सामने छोटी पड़ गई है।

काफ़ी देर बाद मैंने सिर्फ़ एक line लिखी—

“आज पूरे दिन तुम्हें किसी और में ढूँढ़ती रही।”

मैंने pen रख दिया।उसके नीचे फिर लिखा

“और सबसे दुख की बात यह है कि मुझे पता था, तुम कहीं नहीं मिलोगे।”

उस रात फिर मैं अपनी fake profile से उसकी profile पर चली गई।कोई नई post नहीं थी।कोई नई story नहीं थी।फिर भी मैं जाने कितनी देर तक उसकी profile picture देखती रही।कभी उसका नाम पढ़ती।कभी bio।कभी पुरानी posts।कभी comments।ऐसा नहीं था कि मुझे वहाँ कुछ नया मिल जाता था।

लेकिन वहाँ जाकर मुझे लगता था कि मैं उससे पूरी तरह दूर नहीं हुई हूँ।उसी रात उसने देर से एक story डाली।कोई पहाड़ी रास्ता था।पीछे धीमा-सा music चल रहा था।बस कुछ ही seconds की story।मैंने उसे एक बार देखा।फिर दोबारा।फिर तीसरी बार।Story ख़त्म हो गई, लेकिन मैं उसी काली screen को देखती रही जहाँ कुछ पल पहले उसका नाम लिखा था।

मैंने phone सीने से लगाकर आँखें बंद कर लीं।

“तुम कैसे हो, Sugandh?”

यह सवाल मेरे होंठों तक आया, लेकिन हवा में ही खो गया।

धीरे-धीरे मुझे महसूस होने लगा कि मैं थकने लगी हूँ।

सिर्फ़ emotionally नहीं…शारीरिक रूप से भी।सुबह उठना मुश्किल होने लगा था।रात को नींद आती तो बीच-बीच में टूट जाती।

कई बार तीन बजे आँख खुल जाती और फिर सुबह होने तक मैं छत को देखती रहती। दिमाग़ चुप नहीं होता था। कोई पुरानी बात, कोई पुरानी हँसी, कोई पुराना message, कोई पुराना दिन… सब एक-एक करके सामने आ बैठते।

मैंने खुद को समझाने की बहुत कोशिश की कि यह सब temporary है।

लेकिन एक सुबह जब मैं बिस्तर से उठने लगी, तो पैरों में ऐसा भारीपन महसूस हुआ कि कुछ पल वापस बैठना पड़ा।मैंने दोनों हथेलियाँ पैरों पर रखीं।आँखें बंद कीं।गहरी साँस ली।और उसी पल जाने क्यों Sugandh का चेहरा सामने आ गया।

मैं घबरा गई।क्या सचमुच मेरा शरीर भी उसे याद करने लगा था?मैंने तुरंत यह ख़याल झटक दिया।

“नहीं… ऐसा नहीं हो सकता।”

लेकिन जितना मैं उसे झुठलाती, उतनी ही बार वही एहसास लौट आता।अब मुझे उससे डर लगने लगा था।

Sugandh से नहीं…अपने भीतर हो रहे बदलाव से।पहली बार मुझे लगा कि अगर मैंने इस दर्द को किसी के सामने शब्द नहीं दिए, तो शायद यह मुझे भीतर ही भीतर खा जाएगा।

लेकिन उन शब्दों का पहला हक़ किसका था…यह सवाल पूछने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी।उसका नाम मेरे भीतर पहले से मौजूद था।


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Author: Onesha

She is the funny one! Has flair for drama, loves to write when happy! You might hate her first story, but maybe you’ll like the next. She is the master of words, but believes actions speak louder than words. 1sha Rastogi, founder of 1shablog.com.

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