उस रात मैं लगभग बिल्कुल नहीं सोई। घड़ी की सुइयाँ आगे बढ़ रही थीं और मैं छत को देखती हुई बस एक ही बात सोच रही थी—क्या सचमुच किसी इंसान को भूलना इतना मुश्किल होता है, या मैं ही छोड़ना नहीं चाह रही थी? हर बार जब मैं खुद से कहती कि अब बहुत हो गया, अब आगे बढ़ना चाहिए, उसी पल कोई छोटी-सी याद आकर मेरे सारे इरादे तोड़ देती। उसकी हँसना… उसका किसी बात को समझाते हुए अचानक हाथों से इशारे करना… Meeting के बीच किसी की बात ध्यान से सुनते हुए उसका थोड़ा-सा सिर झुका लेना। यादें कभी बड़े पलों की नहीं थीं, बस उन्हीं छोटी-छोटी बातों की थीं, जिन्हें शायद उसने कभी याद भी नहीं रखा होगा।
सुबह Alarm बजा तो लगा जैसे शरीर ने रात भर आराम नहीं, कोई लंबी लड़ाई लड़ी हो। आँखें भारी थीं, सिर दर्द कर रहा था और पैरों में वही जानी-पहचानी जकड़न थी। कुछ देर तक मैं बिस्तर के किनारे बैठी रही। कमरे में बिल्कुल सन्नाटा था। खिड़की से आती हल्की धूप कमरे के फ़र्श पर फैल रही थी, लेकिन मेरे भीतर जैसे कोई रोशनी पहुँच ही नहीं रही थी।
Office पहुँचकर मैंने खुद को काम में डुबो देने की कोशिश की। Laptop खोला, mails का जवाब दिया, meeting attend की, notes बनाए। बाहर से सब कुछ वैसा ही था जैसा हर दिन होता था, लेकिन भीतर एक अजीब-सी बेचैनी लगातार बढ़ रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे मेरा मन किसी बात को बहुत दिनों से रोककर बैठा है और अब वह किसी भी पल बाँध तोड़ देगा। दोपहर के बाद एक colleague ने मुस्कुराते हुए पूछा:
“Everything okay?”
मैंने भी मुस्कुरा कर जवाब दिया:
“हाँ… बस थोड़ी-सी नींद कम हुई है।”
झूठ बोलना कभी इतना आसान नहीं था। शाम तक आते-आते सिर का दर्द और बढ़ गया। Screen पर लिखे शब्द धुँधले लगने लगे। मैंने laptop बंद किया और कुछ मिनट आँखें मूँदकर बैठी रही। पता नहीं कब मेरी आँखों से दो आँसू निकलकर सीधे keyboard पर गिर पड़े। मैंने तुरंत इधर-उधर देखा कि किसी ने देखा तो नहीं? नहीं, सब अपने-अपने काम में व्यस्त थे—जैसे दुनिया हमेशा रहती है… जबकि किसी एक इंसान की दुनिया चुपचाप बिखर रही होती है।
उस दिन घर पहुँचते ही मैंने बैग एक तरफ़ रखा और सीधे फ़र्श पर बैठ गई। लाइट जलाने का भी मन नहीं हुआ। कमरे में अँधेरा धीरे-धीरे घिरता रहा और मैं उसी अँधेरे में घुटनों को सीने से लगाए बैठी रही। बहुत देर तक कोई आँसू नहीं आया, बस सीने में एक भारीपन था, जो साँस भी नहीं लेने दे रहा था। फिर जाने किस पल सब टूट गया। मैं ज़ोर-ज़ोर से नहीं रोई; पहले बस आँखों से आँसू बहते रहे, फिर साँसें तेज़ होने लगीं। ऐसा लगा जैसे सीने में दबा हुआ महीनों का दर्द एक साथ बाहर निकलना चाहता हो। मैंने दोनों हाथों से अपना चेहरा ढक लिया।
“बस…”
मैं खुद से कह रही थी,
“बस, Ananya…”
लेकिन मेरा शरीर मेरी बात सुन ही नहीं रहा था। मैं रोती रही, इतना रोई कि कब फ़र्श पर बैठते-बैठते वहीं टिक गई, मुझे खुद याद नहीं। कुछ देर बाद मेरी नज़र सामने पड़ी Diary पर गई। मैंने काँपते हाथों से उसे उठाया। आज लिखना भी मुश्किल लग रहा था, फिर भी मैंने पन्ना खोला। बहुत देर तक पेन कागज़ पर रुका रहा। आख़िरकार मैंने लिखा— “मैं हार गई, Sugandh.”
बस इतना। उसके बाद शब्द अपने-आप उतरते चले गए— “मैंने सोचा था कि मैं तुमसे दूर चली जाऊँगी तो तुम्हें भूल जाऊँगी। मैंने खुद को समझाया कि यह सिर्फ़ एक phase है। मैंने काम में खुद को डुबोया, लोगों के बीच रही, नई शुरुआत की, तुम्हें block किया, खुद को तुमसे दूर रखा… लेकिन जितना दूर गई, उतना ही तुम्हारे पास लौटती रही। मुझे नहीं पता तुम्हारे दिल में मेरे लिए क्या है। शायद कुछ भी नहीं। शायद कभी था ही नहीं। लेकिन मेरे दिल में जो है, उसे अब झुठलाने की ताक़त मुझमें नहीं बची।”
मैं लिखते-लिखते रुक गई। आँसू कागज़ पर गिर चुके थे और स्याही हल्की-सी फैल गई थी। मैंने Diary बंद कर दी और कुछ मिनट तक उसे सीने से लगाए बैठी रही। फिर धीरे से फोन उठाया। स्क्रीन जल उठी और मेरी उँगलियाँ बिना सोचे कॉन्टैक्ट्स में ‘Sugandh’ के नाम तक पहुँच गईं। नाम सामने था। मैं उसे एक मिनट, दो मिनट… शायद उससे भी ज़्यादा देखती रही। दिल इतनी तेज़ धड़क रहा था कि उसकी आवाज़ मुझे अपने कानों में सुनाई दे रही थी। मैंने एक बार फिर फोन नीचे रख दिया।
“नहीं… क्या कहोगी?”
खुद से पूछा, पर कोई जवाब नहीं था। मैंने फिर फोन उठाया, इस बार उँगली Call Butto के बिल्कुल ऊपर आकर रुक गई। एक गहरी साँस ली, आँखें बंद कीं, और बिना ज़्यादा सोचे मैंने कॉल कर दिया।
फोन की पहली Ring सुनते ही मेरा दिल जैसे गले तक आ गया। दूसरी Ring… मेरी हथेलियाँ पसीने से भीग चुकी थीं। तीसरी Ring… मैंने मन ही मन सोचा, मत उठाना… पर उसी पल दिल ने कहा, please उठा लेना… और चौथी रिंग शुरू होने से पहले ही दूसरी तरफ़ से कॉल Connect हो गया।
“Hello…”
दूसरी तरफ़ से उसकी वही परिचित आवाज़ आई। बस एक शब्द, और इतने दिनों से अपने भीतर रोककर रखा हुआ सब कुछ जैसे एक ही पल में टूट गया। मैंने होंठ खोले, लेकिन आवाज़ बाहर ही नहीं आई। सिर्फ़ साँसों की आवाज़ थी—तेज़, बेतरतीब, और उनके बीच दबे हुए मेरे आँसू।
“Hello?… Ananya?”
उसने दोबारा कहा। इस बार उसकी आवाज़ में हल्की-सी चिंता थी। मैंने बोलने की कोशिश की:
“S… Sugandh…”
बस इतना ही निकल पाया और उसके बाद मेरी आवाज़ रोने में खो गई। फोन के उस पार कुछ पल की ख़ामोशी रही। फिर उसने बहुत धीरे से पूछा:
“क्या हुआ?”
मैं जवाब देना चाहती थी कि कुछ नहीं हुआ, सब ठीक है, बस यूँ ही फोन कर दिया। लेकिन झूठ बोलने की ताक़त अब मुझमें बची ही नहीं थी। मेरे होंठ काँप रहे थे और आँसू लगातार गिर रहे थे। कई कोशिशों के बाद भी मैं सिर्फ़ एक ही बात कह पाई:
“I am… sorry…”
दूसरी तरफ़ फिर कुछ पल की चुप्पी रही। उसने मुझे बीच में नहीं टोका, न ही जल्दी-जल्दी सवाल पूछे; बस मेरी साँसें सुनता रहा, जैसे उसे समझ आ गया हो कि इस वक़्त शब्दों से ज़्यादा ज़रूरी मेरी ख़ामोशी है।
“Ananya… क्या हुआ है?”
उसने बहुत धीरे से मेरा नाम लिया। मैंने आँखें कसकर बंद कर लीं:
“मैं… मैं… नहीं कर पा रही…”
“क्या नहीं कर पा रही?”
उसकी आवाज़ पहले से भी धीमी थी, जैसे वह डर रहा हो कि कहीं ज़रा-सी तेज़ आवाज़ भी मुझे और न तोड़ दे। मैं रोते-रोते बोली:
“मैंने… बहुत कोशिश की… बहुत कोशिश की कि… तुम्हें भूल जाऊँ…”
मेरी बात पूरी होने से पहले ही मैं फिर रोने लगी। कई सेकंड बीत गए। फिर उसने धीरे से पूछा:
“तुम अभी कहाँ हो?”
“घर…”
“घर पर अकेली हो?”
मैंने सिर हिलाया, फिर याद आया कि वह मुझे देख नहीं सकता,
“हाँ…”
मेरी आवाज़ फुसफुसाहट से भी धीमी थी।
“Ananya… मेरी बात सुनो। क्या हम… कल मिल सकते हैं?”
यह कहते हुए भी मुझे डर लग रहा था कि अगर उसने हाँ कह दी, तो मैं उसके सामने खुद को कैसे संभालूँगी। लेकिन उसने बिना एक पल रुके कहा:
“कल क्यों? मैं अभी आ रहा हूँ।”
मैं बिल्कुल चुप हो गई,
“न… नहीं, रहने दो…”
“Ananya. Address वही है ना? मैं निकल रहा हूँ… बस, phone अपने पास रखना।”
Call कट गया।
मैं कई Minute तक फोन हाथ में लिए बैठी रही। स्क्रीन बुझ चुकी थी और कमरे में फिर वही ख़ामोशी लौट आई थी, लेकिन इस बार वह पहले जैसी नहीं थी; उस ख़ामोशी में इंतज़ार था। कुछ ही देर बाद डोरबेल बजी। दिल इतनी ज़ोर से धड़का कि लगा जैसे पूरे घर में उसकी आवाज़ सुनाई दे रही हो। मैं कुछ पल वहीं खड़ी रही। Doorbell दूसरी बार बजी। मैंने काँपते हाथों से दरवाज़े का हैंडल पकड़ा, एक गहरी साँस ली और दरवाज़ा खोल दिया।
सामने Sugandh खड़ा था। वही शांत चेहरा, वही आँखें… बस उनमें आज एक बेचैनी थी, जो मैंने पहले कभी नहीं देखी थी। कुछ पल तक हम दोनों सिर्फ़ एक-दूसरे को देखते रहे। इतने दिनों की दूरी उन कुछ सेकंड में हमारे बीच खड़ी थी। मैंने कुछ कहने के लिए होंठ खोले, लेकिन शब्द नहीं निकले और मेरी आँखों से फिर आँसू बहने लगे। Sugandh ने एक पल भी इंतज़ार नहीं किया। वह एक क़दम आगे बढ़ा और बहुत धीरे से मेरे कंधों पर हाथ रखा:
“Ananya…”
बस इतना सुनना था कि मैं पूरी तरह टूट गई। उसने जैसे ही मेरा नाम लिया, मेरे भीतर इतने दिनों से रोका हुआ सब कुछ एक साथ बिखर गया। मैंने बिना कुछ सोचे उसेकसकर पकड़ लिया—इतनी मजबूती से, जैसे अगर मैंने उसे छोड़ दिया तो वह फिर हमेशा के लिए चला जाएगा। मेरे हाथ उसकी पीठ पर काँप रहे थे। मैं कुछ कहना चाहती थी, लेकिन हर शब्द आँसुओं में घुल जाता। बस मेरी सिसकियाँ थीं और उसके कंधे पर गिरते हुए मेरे आँसू।
Sugandh ने मुझे अपनी बाहों में भरकर अपने और करीब कर लिया और मुझे थामे यूँ ही खड़ा रहा। उसने एक बार भी यह नहीं कहा कि “मत रो” या “क्यों रो रही हो?” वह बस चुपचाप मेरे साथ खड़ा रहा। कभी-कभी किसी इंसान का सबसे बड़ा सहारा उसके शब्द नहीं, उसकी मौजूदगी होती है।
काफ़ी देर तक पूरे घर में सिर्फ़ मेरी रुलाई की आवाज़ गूँजती रही। जब मेरी साँसें थोड़ी-सी सामान्य हुईं, उसने बहुत धीरे से मेरे सिर पर हाथ फेरा। इतने दिनों में मैंने उसके बारे में जाने कितनी बार सोचा था, कितनी बार Imagine किया था कि अगर वह अचानक मेरे सामने आ गया तो मैं क्या कहूँगी। लेकिन इस वक़्त, जब वह सचमुच मेरे दरवाज़े पर खड़ा था, मेरे पास कहने के लिए एक भी शब्द नहीं था।
Sugandh की नज़र धीरे-धीरे मेरे चेहरे पर घूमी—सूजी हुई आँखें, बिखरे हुए बाल, आँसुओं से भीगा चेहरा और जाने कितनी रातों की अधूरी नींद। उसने कुछ नहीं पूछा, बस उतना ही देखा, जितना शायद किसी और ने महीनों में नहीं देखा था। मैंने होंठ खोले, लेकिन आवाज़ बाहर आने से पहले ही टूट गई। मैंने बिना सोचे उसके सीने से खुद को लगा लिया—इतनी कसकर, जैसे मैं उसे नहीं, खुद को संभाल रही हूँ।
पहले उसने मुझे गिरने से बचाने के लिए पकड़ा, फिर धीरे-धीरे उसकी बाँहें भी मेरे चारों तरफ़ कसती चली गईं। उसने मेरे सिर को अपने कंधे के पास और करीब कर लिया। मेरी सिसकियाँ रुकने का नाम नहीं ले रही थीं और मैं उसकी Shirt को मुट्ठी में भींचे लगातार रोती रही। इतने दिनों का दर्द, इतनी रातों की तन्हाई, इतने अधूरे ख़त, इतनी अनकही बातें… सब जैसे मेरे आँसुओं के साथ बह रहे थे।
Sugandh कुछ नहीं बोला। उसने सिर्फ़ अपना गाल हल्के से मेरे सिर से टिकाया और मेरी पीठ पर बहुत धीरे-धीरे हाथ फेरता रहा। उस स्पर्श में एक अजीब-सी नर्मी थी—न कोई जल्दबाज़ी, न कोई झिझक, न कोई सवाल। बस ऐसा एहसास था कि इतने दिनों बाद पहली बार मुझे लगा कि मेरा शरीर लड़ना छोड़ रहा है। मेरे पैरों का कसाव जैसे धीरे-धीरे ढीला पड़ने लगा और साँसें, जो महीनों से सीने में अटक जाती थीं, पहली बार पूरी भर पा रही थीं। मैंने उसकी शर्ट और कसकर पकड़ ली। डर था कि अगर मैंने उसे छोड़ दिया, तो कहीं यह पल भी सपना बनकर टूट न जाए।
शायद उसने मेरा डर महसूस कर लिया था, इसलिए उसने बिना कुछ कहे मुझे अपनी बाहों में थोड़ा और समेट लिया। हम दोनों में से किसी ने यह नहीं सोचा कि कितनी देर हो गई है। मेरी पलकों पर अब भी आँसू थे। Sugandh ने एक पल मेरी तरफ़ देखा, फिर बिना कुछ कहे अपना हाथ उठाया और अपनी उँगलियों के पोरों से मेरी आँखों के नीचे ठहरे आँसू बहुत सावधानी से पोंछ दिए… जैसे मैं काँच की बनी हूँ। उस स्पर्श ने मुझे फिर रुला दिया।
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